फलों की खेती बागवानी

अनार की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अनार की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक
Written by Vijay Dhangar

अनार अर्ध शुष्क जलवायु के लिए महत्वपूर्ण फल है। देश में मुख्यत: महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में अनार (pomegranate farming) की खेती की जा रही है। लेकिन राजस्थान के कुल 6 जिलों में राष्ट्रीय बागवानी मिशन की पहल पर इसकी खेती पर जोर दिया जा रहा है। मेवाड़ अंचल में विशेषकर भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, राजसमंद आदि जिलों की जलवायु इसकी खेती के लिए अनुकूल है। फलस्वरुप किसानों ने अनार की खेती की तरफ रुझान किया है, लेकिन इसकी खेती का प्रारंभ प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से नहीं किया तो, यह अलाभदायक हो सकती है।

अनार की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

जलवायु

शुष्क एवं अर्ध शुष्क जलवायु अनार उत्पादन के लिए बहुत ही उपयुक्त होती है। पौधों में सुखा सहन करने की क्षमता होती हैं। परंतु फल विकास के  नमी आवश्यक है। अनार के पौधों में पाला सहन करने की क्षमता होती है। फलों के विकास में रात के समय ठण्डक तथा दिन में गर्म जलवायु काफी सहायक होती है। ऐसी परिस्थितियों में दानों का रंग लाल तथा स्वाद मीठा होता है। वातावरण एवं मृदा में अत्यधिक उतार-चढ़ाव में फलों में फटने की समस्या बढ़ जाती है तथा उनकी गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

भूमि

अनार सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है परंतु अच्छी पैदावार के लिए जल निकासयुक्त बलुई मिट्टी जिसका पीएच मान 7 से 8 के बीच होता है, उपयुक्त होती है। इसके पौधों में लवण व क्षारीयता सहन करने की क्षमता होती है।

इसकी खेती के लिए कुछ वैज्ञानिक पहलु दिए जा रहे हैं, जिसे अपनाकर किसान भरपूर आय प्राप्त कर सकता है।

Read also:- मशरूम की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनिक

अनार का नया बगीचा लगाना:-

  1. इसकी खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टीयुक्त भूमि उपयुक्त होती है।
  2. अनार की खेती कतार से कतार 5 मीटर, पौधे से पौधे 3.0 मीटर की दूरी पर, 1.0 मीटर गहरे खड्डे तैयार करें।
  3. गड्ढे में पौध लगाने के 1 माह पूर्व तैयार करें। गड्ढे को भरने के 1 दिन पूर्व गड्ढे के नीचे एक साइड की दीवारों पर 0 मि.ली. की दर से क्लोरोपायरीफॉस 4 से 5 लीटर घोल का छिड़काव करें।
  4. 100 ग्राम प्रति गड्डे के हिसाब से 00 प्रतिशत क्लोरीन पाउडर (ब्लीचिंग पाउडर) का भुरकाव करें।
  5. गड्ढे को बालू मिट्टी, दोमट मिट्टी व चिकनी मिट्टी के बराबर अनुपात में भरे।
  6. प्रत्येक गड्डे के ऊपरी भाग में (30 से 50 से.मी.) निम्न मिश्रण मिट्टी में मिलाकर भरे।
  • गोबर की खाद : 10 कि.ग्रा.
  • वर्मी कंपोस्ट : 0 कि.ग्रा.
  • नीम केक : 5 कि.ग्रा.
  • ट्राइकोडर्मा पाउडर : 25 ग्राम
  • फास्फेट सोल्युबलाइजिंग बैक्टीरिया (पी.एस.बी.) : 25 ग्राम
  • स्यूडोमोनास फ्लोरेंस : 25 ग्राम
  • एजेक्टोबेक्टर फार्मूलेशन : 25 ग्राम
  • एजोस्पिरिलम फार्मूलेशन : 25 ग्राम
  1. अनार के पौधे को लगाने से पूर्व नर्सरी में पौधे पर कॉपर आक्सीक्लोराइड 5 ग्राम/ लीटर व स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 0.25 ग्राम/लीटर के हिसाब से छिड़काव करें।
  2. अनार के बगीचे में वायुरोधी वृक्ष के रूप में सरु(कजूरीना), ग्रेविल्या, रोबस्टा (सिल्वर ओक) लगावे।

Read aslo:- सरंक्षित खेती – ग्रीन हाउस में सब्ज़ियों की खेती

उन्नत किस्मों का चयन

उन्नत प्रजातियों के फल खाने में बहुत स्वादिष्ट होते हैं तथा इनकी उन्नत किस्में ढोलका, गणेश, जोधपुर रेड (जोधपुर लाल) मस्कट, कंधारी, पेपर शेल आदि हैं।

भगवा

इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं। फल आकार में बड़े एवं लाल रंग के होते हैं। दाने लाल, रसदार और मीठे एवं खाने में स्वादिष्ट होते हैं। औसत उपज 20- 25 किलो फल प्रति पेड़ हैं। फल 180 से 190 दिन में तैयार होते हैं।

जालौर सीडलैस

इसके फल बड़े (200 ग्राम प्रति फल) बहुत ही आकर्षक, छिलके का रंग गुलाबी से लाल होता है। बीज अत्यंत ही मुलायम व रसीले होते हैं। फल का रस लाल व गुलाबी रंग का होता है।

सिंदूरी

फल मध्यम आकार के नरम बीजों युक्त सिंदूरी रंग के फलों वाली, राजस्थान की जलवायु में अधिक उत्पादन देने वाली अनार की श्रेष्ठ किस्म है। इसके फलों के रस में सुगंध युक्त मिठास होती हैं।

गणेश

इस किस्म के पौधे सदाबहार एवं मध्यम ऊंचाई के होते हैं। फल आकार में बड़े एवं पीले लाल रंग के होते हैं। दाने हल्के गुलाबी, रसदार और मीठे एवं खाने में स्वादिष्ट होते हैं। औसत उपज 40-100 फल प्रति पेड़ है।

जोधपुर लोकल

यह किस्म राजस्थान में लोकप्रिय हैं। फलों का आकार माध्यम से बड़ा, छिलका कड़ा, बीज हल्का गुलाबी व रसदार होता है।

मृदुला

यह एक अच्छी उपज देने वाली संकर किस्म है, जो गणेश तथा रूसी किस्मों के सहयोग से प्राप्त हुई है। इसके फल का आकार मध्यम, रंग लाल तथा दाने गहरे लाल रंग के होते हैं। फल 140 से 150 दिन में तैयार होते हैं।

धोलका

यह किस्म गुजरात में काफी प्रचलित है। इसके फलों का आकार बड़ा, रस अम्लीय एवं उपज मध्यम होती है।

जी 137

यह किस्म गणेश से चयन करके निकाली गई हैं। इसमें गुदा गहरे गुलाबी रंग का एवं फलों का आकार औसत होता है।

Read also:- उत्तक संवर्धन जैवप्रौद्योगिकी का कृषि विकास में योगदान

अनार के पौधे लगाने के पश्चात पहले 2 वर्ष तक देखभाल

  1. अनार के पौधे लगाने की 1 माह पश्चात् स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 5 ग्राम/ लीटर एवं कॉपर आक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम/लीटर की दर से छिड़काव करें। ब्रोनोपल 0.5 प्रति लीटर की दर से बदल-बदलकर छिड़काव करें।
  2. छिड़काव एक माह के अंतराल पर करें परंतु जहां ब्लाइट का अधिक प्रकोप हो या वर्षा ऋतु में छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर करें। वर्षा के समाप्त होने के पश्चात स्प्रे अवश्य करें।
  3. पत्ती धब्बा रोग के नियंत्रण हेतु (मेंकोजेब 63 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. + कार्बेन्डाजिम १२ प्रतिशत डब्ल्यू.पी.) ग्राम प्रति लीटर या क्लोरो थेलोलिन 75 डब्ल्यू.पी.(2ग्राम/लीटर) या हेक्सकोनेसोल 5 ई.सी. (0 मि.ली.) के हिसाब से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  4. रस चूसक कीड़ों के नियंत्रण हेतु थायोमेथॉक्जम 25 डब्ल्यू जी 3 ग्राम/लीटर या एसिटामिपिड 20 एस. पी. 3 ग्राम/लीटर या इमेडाक्लोरोप्रिड 8 एस.एल. की दर से छिड़काव करें। आवश्यकता अनुसार छिड़काव दोहराएं।

  5. माइट नियंत्रण हेतु फेंजाकिन १० ई.सी. 2 मि.ली./लीटर या डाइकोफोम  ५० डब्ल्यू.पी. 1 ग्राम लीटर या 5 ई.सी. 25 मि.ली./लीटर या घुलनशील गंधक ८०  डब्ल्यू.पी. 3 ग्राम प्रति लीटर का बदल-बदल कर छिड़काव करें।
  6. पत्ती खाने वाले कीट के लिए मेलाथियान 50% ई.सी. 2 मि.ली./ लीटर के हिसाब से छिड़काव करें।
  7. अनार की कटाई हेतु तीन तनों को रखते हैं एवं उसी अनुसार उसकी शाखाएं व केनोपी विकसित करते हैं।
  8. ब्लाइट रोग से ग्रसित शाखाओं को समय-समय पर कटाई-छंटाई करते रहना चाहिए।
  9. अधिक रोगों से ग्रसित पौधों को उखाड कर जला देवे और उनके स्थान पर स्वस्थ पौधे लगा देना चाहिए।
  10. बगीचे को साफ सुथरा, खरपतवार रहित रखना चाहिए।
  11. पहले वर्ष निर्धारित उर्वरक एक महीने के अंतराल पर घुलनशील उर्वरक के रूप में देवें। गोबर की खाद बेसल डोज के रूप में एवं एन.पी.के. उर्वरक तीन बराबर भागों में पौध वृद्धि के दौरान देते रहना चाहिए।
  12. अनार का फलन किसी भी अवस्था में 2 वर्ष पूर्व नहीं लेनी चाहिए ताकि पौध की वृद्धि व विकास ठीक प्रकार से हो सके।

Read also:- कृषि विज्ञान केंद्र – किसानों के लिए क्या काम करते हैं ?

अन्तरसस्य

आरम्भ में 3 वर्षों तक बैग में सब्जियां, दाल वाली फसलें लीजा सकती हैं।

प्रवर्धन

अनार के पौधे में कलम (कटिंग) एवं गुट्टी सेपौधे तैयार किए जा सकते हैं। कलम से पौधे तैयार करने के लिए 1 वर्ष पुरानी शाखाओं से प्राप्त 9- 10 इंच लंबी कलमों को 1000 पीपीएम आईबीए अथवा सेरेडेक्स बी या रूटेक्स (जड़ विकसित करने वाले हार्मोन) से उपचारित करके पौधशाला में लगाते हैं। कलम लगाने के लिए जनवरी-फरवरी अथवा जून-जुलाई का समय अधिक उपयुक्त होता है।

गुट्टी द्वारा भी अनार के पौधे तैयार किए जाते हैं। 1 वर्ष पुरानी शाखा से लगभग 2.5- 5.0 सेमी लंबाई में छाल हटा देते हैं। इसके पश्चात उपरी भाग पर 10,000 पीपीएम I.B.A. हार्मोन लगा देते हैं। इसके पश्चात गीले मांस से लपेटकर 100 गेज मोटी पॉलीथिन से ढक कर बांध देते हैं। लगभग 30 से 40 दिन पश्चात ऐसी जड़ विकास होने पर इसको मातृ पेड़ से काटकर नर्सरी में लगा देते हैं।

Read also:- धनिया में लेंगिया रोग (स्टेंम गोल) लक्षण एवं उपचार

खाद एवं उर्वरक

अनार के पौधों को निम्न तालिका के अनुसार खाद एवं उर्वरक देवें-

पेड़ की आयु वर्ष मेंमात्रा किलोग्राम प्रति पौधा
गोबर की खादयूरियासुपर फास्फेटपोटाश
1 वर्ष8- 100.1000.2500.050
2 वर्ष16- 200.2000.5000.050
3 वर्ष24- 300.3000.5000.050
4 वर्ष32- 400.4001.000.150
5 वर्ष और उसके बाद40-500.5001.250.150

मृग भर के लिए गोबर की खाद, सुपर फास्फेट, म्यूरेट आफ पोटाश की पूरी मात्रा व यूरिया की आधी मात्रा को जून माह में तथा शेष यूरिया को सितंबर माह में देना चाहिए।

आंबे बाहर के लिए गोबर की खाद, सुपर फास्फेट, म्यूरेट ऑफ़ पोटाश की पूरी मात्रा व यूरिया की आधी मात्रा को दिसम्बर-जनवरी में तथा शेष यूरिया को अप्रैल माह में देना चाहिए। पौधों को सूक्ष्म पोषक तत्व को भी देना चाहिए

अनार के बगीचे की देखभाल (2 वर्ष बाद)

जिस क्षेत्र में बैक्टीरियल ब्लाइट का अधिक प्रकोप हो वहां केवल हस्त बहार को ही लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में कोई भी एक बाहर सुविधानुसार ले सकते हैं।

एक वर्ष में केवल एक ही फसल लेनी चाहिए।

Read also:- ग्लेडियोलस की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अनार में फल आने का समय

अनार में मौसम के साथ तीन बार फूल लगते हैं, जिसे बाहर के नाम से जाना जाता है।

अंबे बहार

अंबे बहार में फूल फरवरी-मार्च में आते हैं, तथा फल जुलाई-अगस्त में आ जाते हैं।

 मृग बहार

मृग बहार में फूल जून-जुलाई में आते हैं, तथा फल अक्टूबर-नवंबर में आते हैं।

हस्ते बहार

हस्ते बहार में फूल सितंबर-अक्टूबर में आते हैं तथा फल जनवरी-फरवरी में लगते हैं।

व्यवसायिक रूप से पूरे वर्ष में केवल एक ही बात लेना चाहिए राजस्थान में मृग बहार सबसे उपयुक्त समय है।

मृग बहार के लिए मार्च-अप्रैल में सिंचाई रोककर खेतों में हल्की जुताई कर देवें एवं मई के मध्य थलों में खाद उर्वरक डालकर हल्की सिंचाई कर दे। तीन दिन बाद फिर एक गहरी सिंचाई करें तथा इसके बाद वर्षा आने तक 2-3 हल्की सिंचाई करें जिससे जून से पौधों की बढ़वार होने लगेगी। वर्षा ऋतु में फुल आकर अक्टूबर-नवंबर में फसल तैयार हो जाएगी।

Read also:- अमरूद की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

बहार नियंत्रण

तीनों बहारों में से कोई एक इच्छित बहार का उत्पादन लेने हेतु किए जाने वाले प्रबंधकको ‘बहार उपचार’ कहा जाता है। जिसका जल उपलब्धता, बाजार भाव, गुणता इत्यादि के अनुरूप चयन किया जाता है।

मृग बहार लेने के लिए पौधों में मार्च-अप्रैल में सिंचाई बन्द कर दी जाती है तथा मई माह में थालों की खुदाई कर खाद एवं उर्वरक दिए जाते हैं तथा हल्की सिंचाई की जाती है। जिससे जून-जुलाई में फूल आते हैं। फल के विकास के समय आवश्यकतानुसार लगातार सिंचाई करते रहना चाहिए।

अम्बे बहार लेने के लिए पौधों को दिसंबर माह में पानी बंद कर देना (तान देना) चाहिए जनवरी। जनवरी माह के दूसरे सप्ताह में खाद और उर्वरक देने के पश्चात् सिंचाई करनी चाहिए। जिसके फलस्वरूप फरवरी-मार्च में फूल आते हैं।

बहारफूल आनाफलों की तुड़ाईनोट
अंबे बहारजनवरी-फरवरी

 

जुलाई अगस्तअधिक फूल व फल, फलों का रंग कम लाल
मृग बहारजून-जुलाई

 

दिसम्बर- जनवरीकीट व बीमारी का ज्यादा प्रकोप
हस्त बहारसितंबर-अक्टुम्बर

 

फरवरी-अप्रैलकम कीट व बीमारी का प्रकोप, फलों की गुणवत्ता अच्छी, कम फूल व फल

रसायन द्वारा पतियों को गिराना

30 से 40 दिन मिट्टी की स्थिति के अनुसार पानी बंद रखा जाता है। पौधों में जब तनाव (stress) के लक्षण दिखाई देवें तब इथरल 2 मिली/लीटर के हिसाब से छिड़काव करके पत्तियों को गिराया जाता है। इसके पश्चात हल्की प्रूनिंग की जा सकती हैं। प्रूनिंग के पश्चात् एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए तथा खाद व उर्वरक देकर सिंचाई करनी चाहिए। इस प्रकार से पौधों पर भरपूर फूल आएंगे।

Read also:- बेर के कलमी पौधे कैसे तैयार करें?

अनार में रेस्ट पीरियड (अफलन समय)

  1. चार महीने का रेस्ट पीरियड या अफलन समय अच्छी पौध वृद्धि, पौधों का विकास एवं रोगों के प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक हैं।
  2. यदि रेस्ट पीरियड वर्षा ऋतु में आता है तो बोर्डों मिक्सर 1% या स्ट्रेप्टो साक्लीन 5 ग्राम/लीटर + कॉपर आक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम/ लीटर या ब्रोनोपल 5 ग्राम/लीटर + केप्टान 3 ग्राम/लीटर की दर से छिड़काव करें।
  3. किसी भी तरह का खाद व उर्वरक का प्रयोग ना करें।
  4. जीवन रक्षा सिंचाई करें।
  5. अवांछित शाखाएं नियमित रूप से हटाए।

कटाई छटाई एवं बहार नियंत्रण

  1. जिस बग़ीचे में बैक्टीरियल ब्लाइट का प्रभाव अधिक देखा जावें, वहां तुड़ाई के पश्चात विशेष कटाई- छटाई करें। रोगग्रसित समस्त शाखाओं को काट दे।
  2. रोग ग्रसित शाखाओं को ग्रसित रोग से 2 इंच नीचे से काटे, उसके बाद कटे हुए भाग पर ऑयल बेस्ट पेस्ट या चौबटिया पेस्ट लगावे। बेस्ट पेन्ट 500 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड+ 0 लीटर आलस का तेल मिलकर बनायें। चौबटिया पेस्ट 1 कि.ग्रा। रेड लेड +1 किग्रा कॉपर कार्बोनेट +1.25 लीटर अलसी का तेल मिलाकर बनाया जाता है।
  3. कटाई-छंटाई के तुरंत पश्चात बोर्डेक्स मिश्रण का छिड़काव करें।
  4. रेस्ट पीरियड के पश्चात पेड़ की पत्तियां गिराने के लिए इथ्रील 39% एस.सी. 2 से 5 मिलीलीटर/थाले में डालें।
  5. पत्ती गिरने के पश्चात हल्की कटाई- छटाई कर 1% का छिड़काव करें।
  6. गिरी हुई पत्तियों को जला देवे।
  7. 100-150 ग्राम/पौधा ब्लीचिंग पाउडर 25 की.ग्रा. ब्लीचिंग पाउडर 1000 लीटर पानी में घोलकर 0 हेक्टेयर में छिड़काव करें।

Read also:- किन्नू के पौधे में कीट व्याधि प्रबंधन

पोषक तत्व प्रबंधन

  1. पत्तियों के गिरने के 1 सप्ताह पश्चात गोबर का खाद एवं एन.पी.के. नियमानुसार देवें।
  2. नत्रजन एवं पोटाश को 3 बराबर भागों में दें, पहली बहार नियंत्रण के पहली सिंचाई पश्चात दूसरी व तीसरी, 3 व 4 सप्ताह के अंतराल पर फास्फोरस की पूरी मात्रा पहली सिंचाई के समय दें। उर्वरक के पौधे को पौधों के मुख्य तत्वों के चारों तरफ 35 से 40 सेमी दूरी पर 8 से 10 सेमी गहरी खाई बना कर दे, उसके पश्चात सिंचाई कर दे।
  3. नत्रजन काली मिट्टी में यूरिया के रूप में फास्फोरस सिंगल सुपर फास्फेट तथा पोटाश म्यूरेट ऑफ़ पोटाश के रूप में दें। एक तिहाई उर्वरक जैविक रूप में, एक तिहाई उर्वरक अजैविक रूप में तथा शेष पूर्व उर्वरक फर्टिगेशन के साथ दें।
  4. सूक्ष्म तत्वों के रूप में 25 ग्राम प्रति पौधा गोबर की खाद में मिलाकर दें। वर्मी कंपोस्ट 1 किग्रा नीम केक दर 500 ग्राम व फोरेट 20 ग्राम प्रति पौधा दे।
  5. जब फूल आना शुरू हो तो 15 फर्टिगेशन एन.पी.के. 12:61:00 किग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन के हिसाब से 1 दिन छोड़ कर दें। इस प्रकार देने से 46 ग्राम नत्रजन व 98.92 ग्राम फॉस्फोरस प्रति पौधा उपलब्ध होता है।
  6. जब फल बनने लग जाए तो 15 फर्टिगेशन एन.पी.के. 19:19:19 दर 8 किग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन के हिसाब से 1 दिन छोड़ कर दें। इस प्रकार देने से 80 ग्राम पोषक तत्व एन.पी.के. बराबर मात्रा में प्रति पौधा उपलब्ध हो जाएंगे।
  7. जब 100 प्रतिशत फल सेट हो जावे तो 15 फर्टिगेशन एन.पी.के. 0:52:34 दर 5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन के हिसाब से 1 माह तक दें। इस प्रकार 26.35 ग्राम फास्फोरस और 17.23 ग्राम पोटाश प्रति पौधा उपलब्ध हो जावेगा।
  8. तुड़ाई के एक माह पूर्व 2 फर्टिगेशन कैल्शियम नाइट्रेट 5 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रति सिंचाई के साथ 15 दिन के अंतराल पर दें।

सिंचाई

अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक फल उत्पादन के लिए गर्मी के मौसम में 7- 10 दिन के अंतराल पर तथा सर्दी के मौसम में15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल विकास के समय वातावरण तथा मृदा में नमी का असंतुलन रहता है तो फल फट जाते हैं। इसके लिए फल विकास के समय भूमि तथा वातावरण में निरंतर पर्याप्त नमी बनाए रखनी चाहिए।

Read also:- अमरूद की फसल में कीट एवं व्याधि प्रबंधन

ध्यान रखने योग्य बातें

  1. अगर वर्षा आने के पूर्व छिड़काव हो एवं वर्षा होने पर स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या ब्रोनोपन (5 ग्राम/लीटर) का छिड़काव +कॉपर आक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम/लीटर का छिड़काव अवश्य करें।
  2. यदि ऊपर बताए गए छिड़काव करने के पश्चात यदि फंगल धब्बा पाए जाते हैं, तो मैंकोजेब 63% डब्ल्यू.पी.+कार्बेन्डाजिम 12% डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/ लीटर या क्लोरोथेलोनिन डब्ल्यू.पी. (5 ग्राम प्रति लीटर) या नो हेक्साकोनेजोल 5 ई.सी. या डाइफेनाकोलेजोल 25 ई.सी./मिली/लीटर का छिड़काव करें। यदि आवश्यक हो तो 15 दिन के पश्चात् पुनः छिड़काव दोहराए।
  3. विल्ट (मुरझान) रोग के लक्षण दिखते ही बगीचे में प्रत्येक पौधे में क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. (5 मिली/लीटर से 4.0 कार्बेंडाजिम डब्ल्यू.पी. 2 मिली/लीटर) या प्रोपिकोनेजोल 25 ई.सी. (2 मिली./लीटर) 5-8 लीटर घोल का ड्रेन्च करें। रोगग्रसित पौधे के चारों तरफ स्वस्थ पौधे में भी ड्रेन्च करें।
  4. तना छेदक के नियंत्रण हेतु 10 लीटर घोल (जिसमें 40 किग्रा लाल मिट्टी+ 5 ग्राम लिण्डेन+ क्लोरोपायरीफॉस 25 ई.सी.+ कॉपर आक्सीक्लोराइड 25 ग्राम) बनाकर जमीन से 1-2 फीट ऊंचाई तक लगावे।
  5. तना छेदक मिश्रण हेतु दो से तीन मिली डी.डी. वि.जी. तनें में इंजेक्शन के द्वारा डालें।
  6. निमेटोड नियंत्रण हेतु फोरेट 10जी 10 से 20 ग्राम प्रति पौधा या कार्बोफ्यूरान 3जी 20 से 40 ग्राम प्रतिपौधा थाला में डालकर मिट्टी में मिलावें।

रोग एवं कीट नियंत्रण

पति व फल धब्बा रोग

इसकी रोकथाम के लिए धब्बे दिखाई पड़ते ही मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत फफूंद नाशक दवा का 15 से 20 दिन के अंतराल में तीन से चार बार छिड़काव करना चाहिए।

फल सड़न रोग

इस रोग से फल सड़ने लगते हैं अतः रोग के लक्षण होने पर स्ट्रेप्टोसाइक्लीन 1 ग्राम 5 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। कार्बेंडाजिम फफूंदनाशी के 0.1% (1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में) घोल के 2 से 3 छिड़काव 15 दिनों के अंतर पर करने चाहिए।

Read also:-करौंदा की खेती आम के आम गुठली के दाम

दीमक

इससे बचाव के लिए पौधरोपण के समय गड्ढों में भरावन मिश्रण में 50 ग्राम मिथाइल पैराथियान 2प्रतिशत चूर्ण मिलाना चाहिए। हमें प्रत्येक सिंचाई के साथ 50% ई.सी. कीटनाशी की 3 मिलीलीटर प्रति देते रहना चाहिए।

अनार की  तितली

यह अनार के फलों का सबसे हानिकारक कीट हैं। इसके नियंत्रण के लिए वर्षा ऋतु में फल विकास के समय 0.2% प्रोफेनोफॉस 40% ई.सी. दवा के घोल का 15-20 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव लाभदायक पाया गया है।

तना छेदक

तना छेदक कीट से बचाव के लिए 0.3 प्रतिशत डाईक्लोरोफॉस घोल से भीगी हुई रुई को कीट के प्रवेश द्वार में ठूसकर गीली मिट्टी का लेप कर देते हैं। उचित बाग प्रबंधन तथा आवश्यक काट-छाट करके भी कीड़ों की रोकथाम की जा सकती है।

सूत्रकृमि

सूत्रकृमि ग्रसित पौधों की जड़ों को खोदकर उसमें 50 ग्राम फोरेट- 10जी अच्छी तरह मिट्टी में मिलाकर सिंचाई करना लाभदायक होता है।

Read also:-अंगूर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मिलीबग, मोयला, थ्रिप्स

इन कीटों की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोरप्रिड 17.8 एस.एल. 0.5 मि.ली. या डायमेथोएट कीटनाशी का 2 मि.ली. दवा आधा मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

तुड़ाई एवं उपज

फुल आने के लगभग 4-5 माह बाद फल पक कर तैयार हो जाते हैं। कच्चे फल हरे रंग के होते हैं। जब फलों के छिलकों का रंग पीला या लाल तथा दानों का रंग गुलाबी या लाल होने लगे तब उन्हें स्केटियर की सहायता से तोड़ना चाहिए। रंग परिवर्तन के अतिरिक्त पके फलों की सतह चमकीली हो जाती है एवं फल का ऊपर से दबाने पर कड़क की आवाज आती है। प्रारंभिक अवस्था में अनार के पेड़ों से 20 से 25 फल ही प्राप्त होते हैं, लेकिन एक अच्छी देखरेख के पूर्ण विकसित पौधे से 70-100 फल प्राप्त किए जा सकते हैं।

पैकिंग

तुड़ाई के बाद फलों के आकार के अनुसार ग्रेडिंग करें व इसके बाद फलों को टोकरियों में पैक करे। टोकरी के नीचे व ऊपर ढकने के लिए सूखी घास काम में ली जा सकती है। इस तरह से पैकिंग किए गए फल को लंबी दूरी तक भेजा जा सकता है।

Read also:-आम की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अनार का भण्डारण

अनार के फल को लंबे समय तक अच्छी तरह भंडारित करके रखा जा सकता है। इसके फल 0 से 4.5 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तथा 80-85% सापेक्षित आर्द्रता में 6 से 7 महीने तक ना ही सिकुड़ते हैं और ना ही खराब होते हैं। फलों को अधिक मात्रा में भंडारण परतों में 16 से 18 किलो के क्रेटस में 0 से 0.45 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान व 80% आर्द्रता पर किया जाता है।

प्रस्तुति

शंकर लाल कांटवा,

भेरू लाल डांगी,

डॉ. प्रदीप पगारिया,

कृषि विज्ञान केंद्र, दांता,

बाड़मेर (राज.)

Read also:-किन्नू संतरा की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

About the author

Vijay Dhangar