औषधीय फसलें (Medicinal crops) बागवानी

आंवला की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Written by Bheru Lal Gaderi

आंवला(Gooseberry) के फल में मुख्यतः मीठा, कड़वा, चटपटा, कसैला तथा खट्टा पांच स्वाद पाए जाते हैं। आंवला यूआरबीएसी कुल का फल वृक्ष है।

आंवला

जिसका अंग्रेजी में नाम इंडियन गूजबेरी, इम्बली है। इसके अतिरिक्त आंवले को भारत में विभिन्न नामों से जाना जाता है। जिसका विवरण सारणी एक में दर्शाया गया है।

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सारणी 1. भारत में आंवला के विभिन्न नाम

धात्रीनेल्लीआंवली
टामलकामेलानेल्ली (तमिल)अम्बाला (गुजराती)
आदिफल (संस्कृत)आमालक्कामुआमला
आंवलाउसीरिकी (तेलगु)अमलाकी (बंगाली)
आमलिकाअमालकनेल्ली
आंवला (हिंदी)बेट्टाडेनिली (कन्नड़) 

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मृदा:-

आंवले की अच्छी पैदावार के लिए हल्की और मध्यम भारी मृदा की आवश्यकता होती हैं। यह ध्यान रहे कि इसकी खेती के लिए शुद्ध रेतीली मृदा से बचा जाए तथा इसके पेड़ शुष्क क्षेत्र के लिए बहुत अनुकूल है।

इसे हल्की क्षारीय मृदा में भी उगाया जा सकता है।

जलवायु:-

आंवला का वितरण दक्षिणी पश्चिमी एशिया, भारत, श्रीलंका, मलेशिया और चीन में होता है। साथ ही यह एक उष्णकटिबंधीय फल का पौधा है।

इसकी वृद्धि के लिए 630 से 800 मिलीलीटर की वार्षिक वर्षा लाभदायक होती हैं। छोटे अर्थात तरुण पौधे को 3 वर्ष की आयु तक मई से जून के दौरान गर्मी से तथा सर्दी के महीनों में पाले से सुरक्षित रखना चाहिए तथा परिपक्व पौधे प्रशीत तापमान के साथ साथ 46 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक तापमान को सहन कर सकता है।

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आंवला की उन्नत किस्में:-

आंवला की अनेक किस्में पाई जाती हैं। जिसमें कुछ अच्छी व उपयोग किस्में मानी जाती हैं, जो इस प्रकार हैं- बनारसी, चकैया ,  एन. ए.-4 (कृष्णा),  एन. ए.-5  (कंचन),एन. ए.-6,  एन. ए.-7 आशाजनक किस्म,  एन. ए.-10, बी.एस.आर.-1  (भवानी सागर)।

खाद एवं उर्वरक:-

रोपण से पहले प्रत्येक गड्ढे में 15 किलोग्राम गोबर की खाद तथा 500 ग्राम फास्फोरस का प्रयोग किया जाता है।10 वर्ष की अवधि तक प्रत्येक वृक्ष पर प्रत्येक वर्ष सितंबर या अक्टूबर माह के दौरान 30 ग्राम नाइट्रोजन का प्रयोग करना लाभदायक होता है।

सारणी-2

खाद एवं उर्वरक  का प्रयोग

क्र.सं.

सामग्रीप्रति एकड़

प्रति हैक.

1.पौधों की संख्या (कलमें)200500
2.गोबर (टन में)410
3.उर्वरककी.ग्रा.प्रति हैक.
नाइट्रोजन90225
फास्फोरस120300
पोटाश48120

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कृषि तकनीक:-

रोपाई:-

4.5 मीटर  X 4. 5 मीटर की दूरी पर मई-जून माह में एक घन मीटर के गड्ढे खोदे जाते हैं। इन गड्ढों को 15 से 20 दिन के लिए धूप लगने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है।

प्रत्येक गड्ढे में कलम बांध कर पौधे के रोपण से पहले सतह की मृदा के साथ 15 किलोग्राम फॉर्मयार्ड (गोबर) खाद और 500 ग्राम फास्फोरस के मिश्रण को भरा जाता है।

परागण तथा अधिकतम पैदावार प्राप्त करने के उद्देश्य से कम से कम 3 किस्मों का रोपण 2:2:1 के अनुपात में किया जाता है। उदाहरण के लिए बेहतर परिणाम के लिए 1 एकड़ में एन. ए.-7  की 80 कलमें, कृष्णा की 80 कलमें तथा कंचन की 40 कलमों का रोपण किया जाए।

सिंचाई:-

तरुण पौधों को जब तक यह अच्छी तरह जम नहीं जाते तब तक गर्मी के मौसम के दौरान 15 दिन के अंतराल में पानी देने की जरूरत पड़ती है। मानसून की बारिश के बाद अक्टूबर से दिसंबर के दौरान ड्रिप सिंचाई द्वारा प्रति वृक्ष प्रतिदिन लगभग 25 से 30 लीटर पानी दिया जाता है।

सिर्फ चार-पांच अच्छी बनावट वाली शाखाओं को छोड़ा जाता है,  जो मिट्टी के स्तर से लगभग 75 सेंटीमीटर पर चारों कोनों में हो,  अन्य मृत, रोगग्रस्त, कमजोर आड़ी तिरछी शाखाओं और चूसक को दिसम्बर के अंत में छांट दिया जाता है।

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मल्चिंग:-

गर्मी के मौसम के दौरान फसल पर धान की भूसी या गेहूं की भूसी की पलवार को तने से 15 से 20 सेंटीमीटर तक पेड़ के मूल तक बिछाया जाता है।

इंटर क्रॉपिंग:-

अन्तःवर्ती फसलें- जैसे मूंग, उड़द, लोबिया तथा चना को 8 वर्षों तक उगाया जा सकता है।

पौध सुरक्षा:-

मुख्य कीट:-

छाल खाने वाली ईल्ली (इंडरबेल्ला टेट्रोनस)

मुख्य रोग:-

रतुआ (रावेनेलिया एम्बलिसी)

नियंत्रण:-

  • छेदों में 0.05% एंडोसल्फान या 0.03% मोनोक्रोटोफॉस को डालकर बंद कर देने वाली प्रक्रिया को पेड़ों को छाल, खाने वाली ईल्ली में सुरक्षित रखने में प्रभावशाली पाया गया है।
  • सितंबर के आरंभ में पहली बार इंडोफिल एम. 45, 0.3% की दर से दो बार छिड़काव तथा पहले प्रयोग के 15 दिन बाद दूसरी बार प्रयोग करने से रतुआ रोग को फैलने पर नियंत्रण किया जा सकता है।

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कटाई प्रसंस्करण एवं उपज:-

  1. आंवले के पेड़ पर रोपण के 2 वर्ष बाद फल लगते हैं।
  2. फलों को फरवरी के दौरान उस समय तोड़ा जा सकता है, जब यह फीके हरेपन से लेकर हल्के हरे हो जाते हैं।
  3. पके हुए फल ठोस होते हैं और हल्के हाथ से तोड़ने पर नहीं टूटते हैं अतः ताकत लगाकर तोड़ना पड़ता है।
  4. फलों को लंबे बांस के डंडे पर हुक लगा कर भी तोड़ा जा सकता है।
  5. 10 वर्ष की आयु वाले पके हुए पेड़ से 50 से 70 किलोग्राम फल की पैदावार प्राप्त की जा सकती हैं।
  6. फल का औसत वजन लगभग 60 से 70 ग्राम होता है और एक किलोग्राम में लगभग 15 से 20 फल आते हैं।
  7. एक सुव्यवस्थित पेड़ से 70 वर्ष की आयु तक पैदावार प्राप्त की जा सकती हैं।

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आंवला के पुराने एवं अनुउत्पादक बगीचों का जीर्णोद्धार:-

आंवला किसी भी प्रकार की जमीन एवं जलवायु में उगाए जाने वाला पोषक तत्वों से भरपूर एक औषधीय फल 30 से 50 साल पुराने आंवला के पेड़ों की पैदावार काफी कम होने लगती हैं।

उनकी वृद्धि एवं ऊंचाई अधिक होती हैं। यह आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं होते हैं। ऐसे पुराने आंवला वृक्षों से अधिक उत्पादन लेने के लिए उन कारणों द्वार करने की आवश्यकता होती हैं जो निम्नलिखित हैं:-

  1. आंवला के वृक्षों को जमीन से 2.5 से 3.0 मीटर ऊंचाई से दिसंबर या जनवरी माह में काट देना चाहिए। कटे हुए हिस्से को गाय का गोबर और मिट्टी एवं पानी से लेप देते हैं, जिससे फफूंदी युक्त रोग के संक्रमण से बचा जा सके।
  2. इसके बाद नए शूट्स (कल्ले) निकलते हैं, जिनमें से चार से छह स्वस्थ कल्लों या शाखाओं को उचित स्थान पर बचा कर रखते हैं, बाकी शाखाएं जो कि अवांछित होती हैं उन्हें पुनः काट देते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि शाखाएं चारों तरफ वाली हो ना कि सिर्फ ऊपर की तरफ वाली हो।
  3. जून या जुलाई में किसी अच्छी प्रजाति से चयनित शाखाओं (कल्लों) पर बडिंग कर देना चाहिए। इस समय में रोग एवं कीट से बचाव आवश्यक करना चाहिए।
  4. बडिंग के 3 साल बाद पौधा एक पेड़ के रूप में जम जाएगा और फूल व फल देने लगेगा।
  5. कटिंग के एक साल बाद कम फल 9 किलोग्राम प्रति पेड़ आएंगे, लेकिन दूसरे साल से फल उत्पादन बढ़ने (110 किलोग्राम प्रति पेड़) लगता है।
  6. आंवला की छंटाई के बाद सिंचाई 7 से 10 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। जिससे नए कल्ले जल्दी निकलते हैं। थाले बनाकर सिंचाई करना चाहिए। टपका विधि से सिचाई करना लाभदायक है।

  7. भिंडी, गोभी, धनिया, हल्दी, सब्जियां, ग्लेडियोलस फूल वाले पौधों को अंतरवृति फसल के रूप में लगा सकते हैं। खारी भूमि में ढेंचा खेती करके मिट्टी को सुधारा भी जा सकता है।
  8. धान का पुआल, गन्ने की पिराई के बाद बच्चे भाग आदि को बेसिन में बिछा दें। जिससे नमी सरंक्षण भी होगा। कार्बनिक पदार्थ भी बढ़ेगा। काली प्लास्टिक शीट भी फायदेमंद है।
  9. जीर्णोद्धार के समय 50 किलोग्राम प्रति पेड़ सड़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए। पेड़ों की कटाई के 1 महीने बाद 500 ग्राम नाइट्रोजन उर्वरक, 500 ग्राम फॉस्फोरस,व 1 किलोग्राम दिया जाये। उर्वरक को मिट्टी में मिला देना चाहिए। खारी जमीन में 100 ग्राम बोरेक्स, जिंक सल्फेट व कॉपर सल्फेट देना चाहिए।
  10. इसके अतिरिक्त बोरॉन, जिंक, कॉपर (0.%),  को हाइड्रेट चूना के साथ सितंबर में छिड़काव करना चाहिए। इससे फलों का झड़ना रुकता है, व फूलों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
  11. आंवला में मुख्य रूप से शूट गाल मेकर, छाल खाने वाला कैटरपिलर, मिलीबग, उकठा, स्टोन भेदक आदि कीटों का प्रकोप होता है।
  12. शूट गाल मेकर ग्रसित टहनी को काट देना चाहिए। 0.5% मोनोक्रोटोफॉस अक्टूबर माह में छिड़कना चाहिए।
  13. छाल खाने वाले कैटरपिलर से बचने हेतु 0.25% डाईक्लोरोबॉस से भीगी हुई रुई छिद्र पर लगाएं और मिट्टी से लेप देते हैं।
  14. मिलीबग को 0.05% मोनोक्रोटोफॉस का छिड़काव कर नुकसान से बचा जा सकता है। 0.2% कार्बोरेल अथवा 0.04% मोनोक्रोटोफॉस का छिड़काव करने से स्टोन भेदक कीट मर जाता है।

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आंवला की तुड़ाई, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन:-

  1. आंवले को स्थानीय रूप से निर्मित बांस के लट्ठे में लगी जाली के माध्यम से तोड़ा जाता है।
  2. फल प्रातः समय तोड़ा जाना चाहिए व जमीन पर नहीं गिरना चाहिए अन्यथा फल खराब हो सकता है।
  3. जमीन से 1 मीटर की ऊंचाई पर जाली या चदर भी बांधी जा सकती हैं, जिससे फल जमीन में ना गिरे तथा खराब होने से बच सके।
  4. आंवले को कमरे के तापमान पर 6 से 9 दिन तक रखा जा सकता है, जबकि 5 से 6 सेल्सियस तापक्रम पर आंवले को 2 महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  5. आंवले का प्रयोग मुरब्बा, अचार, चटनी एवं पेय पदार्थों, टॉफी  एवं मिठाई के रूप में किया जा सकता है।

औषधीय उपयोग:-

  • आयुर्वेद में आंवला एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल है।
  • यह फल विटामिन सी का एक प्रचुर स्रोत है। प्रति 100 ग्राम फलों में 500 एमजी)।

आंवला से तैयार होने उत्पाद निम्नलिखित हैं:-

च्यवनप्राश, रसायन, मधुमेघा चूर्ण, आंवला आधारित टॉनिक तथा गोलियां,

भारत भूमि प्राचीन काल से ही विश्व में अपनी सांस्कृतिक धरोहर और उपजाऊ भूमि के लिए प्रसिद्ध रही है।

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साभार:-

किसान भारती

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Bheru Lal Gaderi

नमस्ते किसान भाइयों मेरा नाम भेरू लाल गाडरी है। इस वेबसाईट को बनाने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को खेती-किसानी, पशुपालन, विभिन्न कृषि योजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना है।