औषधीय फसलें (Medicinal crops) बागवानी

औषधीय पादप की खेती राजस्थान में

राजस्थानी औषधीय पादप
Written by Bheru Lal Gaderi

राजस्थानी औषधीय पादप (Medicinal plant) – आयुर्वेद को भारत में पांचवें वेद की संज्ञा प्रदान की गई है। प्राचीन काल से ही हमारे भारतवर्ष में हर रोग का निदान पूर्णत आयुर्वेद पर आधारित है।

हमारी प्रकृति में पाए जाने वाला हर पादप अपने आप में कोई न कोई विशिष्ट गुण रखता है, जो कि मानव के लिए किसी न किसी तरह उपयोगी होता है।

राजस्थान राज्य और औषधीय पादप उत्पादन में एक विशिष्ट स्थान रखता है, क्योंकि कई औषधीय पादप केवल राजस्थान की जलवायु में ही होते हैं। राजस्थान में पुराने समय से लोगों ने कई रोगों का निदान इन्ही औषधीय पादपों की सहायता से करते आ रहे हैं।

यह औषधीय पादप मानव के लिए हमेशा से ही लाभदायक सिद्ध होते आ रहे हैं।

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राजस्थान में पाए जाने वाले औषधीय पादप निम्नलिखित हैं:-

कंटकारी:-

इस पादप को राजस्थान में लोग सामान्य बोलचाल की भाषा में रेंगनी, भोरेगनी, काटेरी आदि नामों से जानते हैं। यह पादप बंजर सुखी भूमि पर ज्यादातर पाया जाता है। यह पादप वानस्पतिक रूप से सोलेनेसी कुल से संबंध रखता है।

औषधीय पादप

पहचान:-

कंटकारी पौधा देखने में हरा व कटीला होता है। इसकी पत्तियां पूर्ण रूप से काटों वाली होती हैं। पत्तियां खंडित रूप से धारदार होती हैं।

इसमें जामुनी रंग के फूल आते हैं और इसका फल कच्चे अवस्था में हरे रंग का पकने के बाद पीले रंग और कभी-कभी सफेद रंग का हो जाता है। इसके फल लगभग 1 इंच व्यास वाले गोलाकार होते हैं।

औषधीय गुण:-

आयुर्वेदिक चिकित्सा में इस पादप की फल और पत्तियां आदि अधिकतर उपयोग की जाती है। इसका उपयोग बुखार, कफ,  वात एवं अनेक रोगों के निवारण में किया जाता है।

इसमें कपवात शामक, कासहर, शोथहर, रक्तशोधक, वातशामक, ह्रदय रोगनाशक, रक्तभार शामक, बीज शुक्र शोधन, आदि गुण पाए जाते हैं। यह चिकित्सा में बहुत ही उपयोगी औषधीय पादप है।

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ग्वारपाठा:-

ग्वारपाठा को सामान्यत: घृतकुमारी, एलोवेरा और कारंगदल आदि नामों से जाना जाता है। इस पादप का उत्पत्ति स्थान अफ्रीका देश को माना जाता है।

औषधीय पादप

यह पादप प्राचीन काल से ही एक औषधीय पौधे के रूप में प्रसिद्ध है। कई ग्रंथों पुराणों में एवं लेखों में इस औषधीय पादप के गुणों के बारे में जानकारी प्राप्त होती हैं। यह पादप तना रहित गूदेदार पत्तियों वाला होता है, जो कि देखने में पूरा हरे रंग का होता है।

यह मुख्यतः मरुस्थलीय पादप है। क्योंकि यह बिल्कुल कम पानी की आवश्यकता रखता है, साथ ही यह विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। इसका प्रवर्धन वानस्पतिक तरीके से होता है।

यहां तक कि इसे वृद्धि के लिए कोई विशेष माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है। इसे आराम से कहीं भी उगाया जा सकता है। इसमें ग्रीष्म ऋतु में फूल आते हैं।

उपयोग:-

इसका उपयोग अधिकतर सौंदर्य प्रसाधन में किया जाता है, क्योंकि इसके रस में त्वचा को मुलायम एवं कोमल बनाए रखने वाले कई गुण पाए जाते हैं।

एलोवेरा पादप मधुमेह रोगियों के लिए बहुत ही सिद्ध दवा माना जाता है, क्योंकि यह मानव रक्त में पाए जाने वाले लिपिड के स्तर को कम करता है। जिससे कि मधुमेह रोग का नियंत्रण होता है।

ये गुण पादप में  मन्नास, लिक्टिन और एन्थ्राक्युईनोनेज पाए जाने वाले यौगिकों के कारण होते हैं, साथ ही यह रक्तशुद्धि एवं एड्स रोगों से बचाव का कार्य करता है।

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हडजोड:-

हडजोड को अस्थि श्रृंखला के नाम से भी जाना जाता है। यह एक मरुस्थली लता पादप हैं, जिनका तना खंडयुक्त होता है। इसमें पत्तियां छोटी-छोटी दिल के आकार की होती हैं. जो कि चोटर तने पर पाई जाती है।

हडजोड

इसके फल मटर जैसे होते हैं। इसमें वर्षा ऋतु में फूल एवं सर्दी में फल आते हैं। भारत के दक्षिणी भाग में एवं श्रीलंका में सब्जी के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

इसका प्रयोग प्राचीन काल से टूटी हड्डियों को जोड़ने के लिए किया जाता है। इसमें वातनाशक और कफनाशक के गुण पाए जाते हैं। जिसके कारण इसका उपयोग बवासीर, कृमिरोग, वातरक्त आदि रोगों में किया जाता है।

मुख्य रूप से इसका तना उपयोगी है, क्योंकि इसमें पोटेशियम फॉस्फोरस एवं कैल्शियम कार्बोनेट पाए जाते हैं।

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अश्वगंधा:-

अश्वगंधा एक नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है। इसका नाम अश्वगंधा इस पौधे की पत्तियों में से आने वाले घोड़े के मूत्र के समान गंध के कारण रखा गया है।

अश्वगंधा

इसके उपयोग का वर्णन हर ग्रंथ, हर आयुर्वेद की किताब में मिल जाता है। यह बहुत ही गुणकारी औषधीय पादप होने के कारण हमेशा इसकी मांग बनी रहती है।

इसका पादप झड़ीनुमा होता है, जो कि सदाबहार गुणों वाला होता है। इसमें गोलाकार मटर के समान फल आता है, जो पकने के बाद लाल हो जाता है।

इसका उपयोग अनेक बीमारियों के निदान में किया जाता है। इसकी जड़े शक्ति प्रदान करने वाली एवं कई बीमारियों की दवाइयों के रूप में उपयोगी हैं।

अश्वगंधा का उपयोग हड्डियों के दर्द, त्वचा संबंधी बीमारियों, जनन संबंधी बीमारियों, तंत्रिका विकारों में एवं रक्तचाप रोगों को रोकने के लिए किया जाता है।

भारत में इसकी खेती महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पंजाब, गुजरात एवं राजस्थान में की जाती है। विश्व में भारत, अफ्रीका, मिश्र एवं स्पेन इसके प्रमुख उत्पादक देश हैं।

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सत्यानाशी:-

सत्यानाशी एक झाड़ीनुमा जंगली पादप जो कि ज्यादातर खेतों में खरपतवार के रूप में पाया जाता है। यह देखने में एक कटीला पौधा होता है, जिस पर पीले रंग के फूल खिलते हैं।

औषधीय पादप

यह पादप अब अधिकतर बारानी खाली पड़ी भूमि में होता है। इस पादप की झाड़ी तोड़ने पर इसमें दूध के समान तरल पदार्थ निकलता है। इसके बीज सरसों के समान होते हैं।

पुराने समय से ही इस पादप का उपयोग अनेक रोगों के निदान में किया जाता है। इसकी डाली से निकले रस का उपयोग घाव को ठीक करने में, इसके बीजों के तेल का उपयोग पीलिया रोग के इलाज में किया जाता है।

दमा एवं कुष्ठ रोग के इलाज में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

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गूगल:-

यह एक प्राकृतिक रूप से उगने वाला जंगली पादप हैं, जो कि अधिकतर गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र एवं बंगाल में पाया जाता है। मेवाड़ एवं मारवाड़ राजस्थान में इसके प्रमुख उगने के स्थान हैं।

औषधीय पादप

यह-एक झाड़ीनुमा औषधि पादप हैं, जिसमें बहुत सारे रंग की टेढ़ी मेढ़ी डालियां पाई जाती है। जिनके ऊपर से छलका उतरता है।

यह एक पतझड़ स्वभाव का पादप हैं, ईस पौधे पर बेर के समान गोल फल आता है। इस पौधे में से गोंद निकल जाता है, जिसे गूगल कहा जाता है।

इसके लिए यह पादप गूगल के नाम से जाना जाता है। गूगल एक महत्वपूर्ण औषधि पादप हैं, जिसका उपयोग नेत्र रोग, शिरा रोग एवं दिल के संबंधित रोगों के निवारण में किया जाता है।

यह कैंसर रोगियों के लिए भी बहुत गुणदायक हैं। यह कभी-कभी कीटाणुओं को मारने में भी प्रयोग किया जाता है। इसमें कर्मीनाशक के गुण भी पाए जाते हैं।

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निष्कर्ष:-

राजस्थान पूर्णत: इन औषधीय पादपों के उत्पादन के लिए उपयुक्त परिस्थितियां रखता है। यह पादप किसान को अतिरिक्त आय प्रदान कर सकते हैं, अतः भविष्य में इन औषधीय पादप से आय हेतु विभिन्न रोजगार के साधन उपलब्ध हो सकते हैं।

प्रस्तुति:-

अनुपमा, विद्या वाचस्पति, उद्यान विभाग,

दशरथ सिंह चुंडावत, कृषि स्नातक,

सरिता, विद्या वाचस्पति, शस्य विज्ञान,

डॉ एस के मूड, सह आचार्य, कृषि महाविद्यालय,

मंडोर, जोधपुर

About the author

Bheru Lal Gaderi

नमस्ते किसान भाइयों मेरा नाम भेरू लाल गाडरी है। इस वेबसाईट को बनाने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को खेती-किसानी, पशुपालन, विभिन्न कृषि योजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना है।