फलों की खेती बागवानी

किन्नू संतरा की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

किन्नू संतरा की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक
Written by Vijay Dhangar

किन्नू संतरा मुख्यतः पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के गंगानगर, हनुमानगढ़ जिले में उगाया जाता है। वहां की रेतीली मिट्टी व नहरी पानी इसकी खेती के लिए बहुत ही उपयुक्त है। अब किन्नू संतरे (orange farming) की खेती राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में पथरीली जमीन पर भी लहलहा रही है। कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़गढ़ के फार्म पर वर्ष 2008 में पथरीली जमीन पर किन्नू के पौधे लगाए गए। इन पर किन्नू की बंपर फसल आ रही है।

किन्नू संतरा की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

निंबू के फलों में संतरा अपने विशिष्ट स्वाद व रंग के कारण पूरे देश में काफी लोकप्रिय है। इसका फल गोल, मध्यम एवं चपटापन लिए हुए नारंगी रंग का होता है। फल का वजन 125 से 175 ग्राम तक होता है। पकने पर दाना रंगीला तथा रस की मात्रा 40 से 45% तक होती है।

किन्नू संतरा के लिए जलवायु

किन्नू संतरा के उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 10 से 40 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। सर्दियों में अच्छी सर्दी इसके लिए लाभदायक है। लेकिन 0 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान व पीला से पौधों व फलों को नुकसान पहुंचता है। शुष्क जलवायु जहां पर वर्षा 50-60 सेमि हो, उपयुक्त रहती हैं।

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मिट्टी

किन्नू संतरा  के लिए गहरी, भुरभुरी तथा अच्छे जल निकास वाली मिट्टी उपयुक्त होती है जिसका पी एच मान 7.0 से 8.0 के बीच होना चाहिए। लवणीय या क्षरीय मृदा इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है। मिट्टी कि विद्युत चालकता 0.5 mmhos/cm  से कम, कैलशियम कार्बोनेट की मात्रा 5% से कम तथा चुने की मात्रा 10% से कम होनी चाहिए। मृदा में सतह से 1.5 से 2 मीटर गहराई तक कठोर परत नहीं होनी चाहिए। पौधे विभिन्न प्रकार की मिट्टीयों जैसे लाल मिट्टी, लेटराइट, जलोढ़ व रेतीली दोमट मिट्टी में आसानी से ऊगा सकते हैं।

प्रवर्धन

व्यापारिक रूप से संतरे का प्रवर्धन शील्ड (टी-बडिंग) विधि द्वारा किया जाता है। इसके लिए मूलवृन्त को बीज द्वारा तैयार किया जाता है। मूलवृन्त करणा खट्टा, रफ लेमन व रंगपुर लाइम आदि का प्रयुक्त किया जाता है। इस मूलवृन्त पर किन्नू किस्म का बड़ चढ़ाया जाता है। पेंसिल की मोटाई के मूलव्रत पर 17 से 20 सेमी की ऊंचाई पर की जाती है। बडिंग का कार्य अगस्त-सितम्बर में करना चाहिए।

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पौधे लगाने की विधि

किन्नू संतरा के पौधे 6X 6 मीटर की दूरी पर लगाते हैं। रेखांकन करने के बाद जून के महीने में 1X1X1 मीटर आकार के गड्ढे खोदने चाहिए। प्रत्येक गड्डे में 10 किलो वर्मीकम्पोस्ट अथवा 25 किलो गोबर की खाद, 1 किलो सिंगल सुपरफास्फेट तथा 100 ग्राम मिथाइल पैराथियान चूर्ण को मिट्टी में मिलाकर भरना चाहिए।

सिंचाई

पौधरोपण के कुछ समय पश्चात प्रत्येक तीसरे चौथे दिन पानी देना चाहिए। सामान्यतयाः गर्मियों में 7 से 10 दिन के अंतराल पर व सर्दियों में 15- 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

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खाद एवं उर्वरक

पौधे की आयु (वर्ष)गोबर की खाद

(की.ग्रा./ पौधा)

यूरिया (की.ग्रा./ पौधा)सुपर फॉस्फेट (की.ग्रा./ पौधा)म्यूरेट  ऑफ पोटाश (की.ग्रा./ पौधा)
1 से 3 वर्ष10-300.250-0.700
4 से 7 वर्ष40-800.700-1.501.0- 2.00.300- 0.500
8 वर्ष के बाद1001.5- 2.02.0- 2.50.500- 1.0

 

गोबर की खाद को दिसंबर माह में, यूरिया की आधी मात्रा, सुपर फॉस्फेट व म्यूरेट  ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा को फुल आने से पहले फरवरी/मार्च माह में देना चाहिए। शेष यूरिया की मात्रा को अप्रैल/मई माह में देना चाहिए।

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सूक्ष्म तत्व

गौण तत्वों जैसे जिंक, कॉपर, मैग्नीज, लोहा आदि की कमी से पौधों में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। जिंक की कमी से पत्तियां छोटी रह जाती हैं। पत्तियों की नसों के बीच का रंग हल्का पड़ जाता है। फलों का गिरना वृद्धि ना होना आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं। मेगनीज की कमी के कारण पत्तियों के मध्य का रंग धीरे-धीरे हल्का पड़ जाता है।

पौधों में इन तत्वों की कमी के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए गौण तत्वों का छिड़काव पौधों पर अप्रैल-मई में करना चाहिए। इन तत्वों को अलग-अलग घोलने के बाद पानी में मिलाना चाहिए। इसके लिए जिंक सल्फेट 500 ग्राम, कॉपर सल्फेट 300 ग्राम, मेगनीज सल्फेट 200 ग्राम, मेग्नेशियम सल्फेट 200 ग्राम, बोरिक एसिड 100 ग्राम, फेरस सल्फेट 200 ग्राम, बुझा हुआ चुना 900 ग्राम व पानी 100 लीटर रखना चाहिए।

प्रमुख कीट एवं रोग:-

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अन्तरसस्य

प्रारंभ के तीन- चार वर्षों तक पौधों के बीच के स्थान में फसले, सब्जियाँ आदि ली जा सकती है। बाग में मक्का, ज्वार, कपास, बरसीम, भिंडी तथा कुष्माण्ड कुल की सब्जियों को नहीं उगाया जाना चाहिए। मूंग, उड़द, ग्वार, प्याज, चौलाई आदि की खेती की जा सकती है।

कटाई- छटाई

पौधों की प्रारंभिक अवस्था में इनको उचित आकार देने के लिए कटाई- छटाई किया जाता है। इस अवस्था में भूमि से 70- 90 सेमी की ऊंचाई तक मुख्य तने से कोई शाखा नहीं निकलने देनी चाहिए। बाद की अवस्था में जल प्ररोह, सुखी व मरी हुई, रोगग्रस्त तथा एक दूसरे से रगड़ खाती हुई शाखाओं को काटकर निकाल देना चाहिए।

उपज

फलों का टी.एस.एस./अम्लता अनुपात 12:1 से 14:1 होने तथा फलों का रंग पीला होने पर फलों को तोड़ा जाता है। फलों को स्केटियर की सहायता से तोड़ा जाता है। फल जनवरी में पकते हैं लेकिन चित्तौड़ जिले में फल दिसम्बर में तुड़ाई योग्य हो जाते हैं। पौधारोपण के 5 वर्ष पश्चात 80 किलो से 100 किलो प्रति पौधा उपज प्राप्त होती है।

प्रस्तुति:-

कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अधिकरण (आत्मा), चित्तौड़गढ़

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