फसलें रबी फसलें

चना की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Written by Vijay Dhangar

चना की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक:-

चना दलहनी फसलों में अपना प्रमुख स्थान रखता हैं। दलहनी फसलों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल का 27 एवं पैदावार का कुल 33% हिस्सा चने (gram Farming) से प्राप्त होता हैं। दलहनी फसले प्रोटीन का प्रमुख स्त्रोत हैं। दलहनी फसलों में प्रोटीन के साथ प्रचुर मात्रा के साथ-साथ अमीनो अम्ल भी पाए जाते हैं। कुल उत्पादन का 24% भाग उपज देकर देश में प्रथम स्थान पर हैं। दलहनी फसले भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाती हैं।

चना की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

इसके अलावा दलहनी फसलों की जड़ों में पायी जाने वाली गाठों के द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण भी होता हैं, जिससे भूमि में उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती हैं। एक हेक्टेयर दलहनी फसल औसतन 15-25 किलो नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर करती हैं। इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर फसलोत्पादन की वृद्धि में सहायक सिद्ध होती हैं। वर्तमान में एकीकृत पौध पोषण पर विशेष बल दिया जा रहा हैं।

किसान ऐसी तकनीकी अपनाये जिससे कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ का इस प्रकार से समावेश किया जाये की भूमि पौधों को संतुलित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध हो सके व भूमि की भौतिक दशा सुधार सके। फसल चक्र में अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलों में उगाने से मृदा में नाइट्रोजन व जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा बनी रहती हैं।

चना एक दलहनी व औषधीय गुण वाली फसल हैं। इसका उपयोग खून प्यूरिफिकेशन में होता हैं। चने में 21.1% प्रोटीन 61.1% कार्बोहाइड्रेट 6.5% वसा एवं प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, लोहा एवं नियासिन पाये जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के बाद चना उत्पादन करने में राजस्थान का नाम आता हैं। इसके प्रमुख जिले गंगानगर, अलवर, कोटा, जयपुर व सवाईमाधोपुर हैं। सबसे ज्यादा चने का उत्पादन गंगानगर जिले में होता हैं। राज्य का आधे से ज्यादा चना इन्ही जिलों में उत्पन्न किया जाता हैं।

Read also:- ब्राह्मी की उन्नत खेती एवं औषधीय महत्व

भूमि व तैयारी:-

चने के लिए लवण व क्षार रहित अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती हैं। इसकी खेती  हल्की व भारी दोनों प्रकार की भूमि में की जा सकती हैं। चने की फसल अधिकतर बारानी क्षेत्र में की जा सकती हैं।

चने की फसल अधिकतर बारानी क्षेत्र में ली जाती हैं। माध्यम व भारी मिट्टी के खेतों में गर्मी में एक-दो जुताई करें। मानसून के अंत में व बुवाई से पहले अधिक गहरी जुताई न करें।

Read also:- आलू की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

उन्नत किस्में:-

सी.235, आर.एस.जी.44, दोहद यलो, जी.एन.बी.663(वरदान), जी.एन.जी.-469 (सम्राट) आर.एस.जी. -2 (किरण), बी.जी.-209, पंत जी-114, आई.सी.वि.-32, आई.सी.सी.वी.-10(प्रगति), बी.जी.-256, फुले जी.-5, काक-2, जवाहर-16,130,315, जवाहर गुलाबी चना-1, जे.जी.के.-1, विजय, विशाल, वैभव आदि।

उर्वरक प्रयोग:-

मिट्टी परीक्षण की सिफारिश अनुसार उर्वरक प्रयोग करें। असिंचित क्षेत्रों में 10 किलो नत्रजन और 25 किलो फास्फोरस तथा सिंचित क्षेत्र अथवा अच्छी नमी हो वह बुवाई से पूर्व 20 किलो नत्रजन व 40 किलो फास्फोरस प्रति हेक्टेयर 12-14 से.मी. की गहराई पर आखिरी जुताई के समय खेत में ऊर कर देवे।

Read also:- सौंफ की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

बीज उपचार:-

  • जड़ गलन व उखटा रोग की रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 0.45 ग्राम+थाइरम एक ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज को उपचारित करें।
  • दीमक का पकोप हो वहां 100 किलो बीज में 400 मि.ली. लीटर क्लोरोपायरिफोस 20 इ.सी. मिलाकर बीज को उपचारित करें।
  • वायरवर्म से प्रभावित क्षेत्रों में बीज को 10 मि.ली. क्यूनालफॉस 25 इ.सी. प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर उपचारित करने के बाद बोये।
  • बीजों का राइजोबिया कल्चर एवं पी.एस.बी. कल्चर से उपचार करने के बाद ही बोये। एक हेक्टेयर क्षेत्र के बीजों को उपचारित करने हेतु तीन पैकेट कल्चर पर्याप्त हैं। बीज उपचार करने हेतु आवश्यकतानुसार पानी गर्म करके गुड़ घोले। इस गुड़ पानी के घोल को ठंडा करने के बाद कल्चर को इसमें भली प्रकार मिलाये। तत्प्श्चात इस कल्चर मिले घोल से बीजों को उपचारित करें एवं छाया में सुखाने के बाद शीघ्र बुवाई करें।
  • सर्वप्रथम कवकनाशी, फिर कीटनाशी तथा इसके पश्चात् राइजोबिया कल्चर से बीजोपचार करें।

भूमि उपचार:-

दीमक व कटवर्म के प्रकोप से बचाव हेतु क्यूनालफॉस 1.5% या मैलाथियान 4% चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से आखिरी जुताई के समय खेत में मिलाये।

Read also:- मसूर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

बुवाई:-

प्रति हेक्टेयर40-60 किलो बीज बोये। कतार से कतार की दुरी 30-45 सेंटीमीटर रखें। सिंचित क्षेत्र में 5-7 सेंटीमीटर गहरी व बारानी क्षेत्र में नमी को देखते हुए 4-10 सेंटीमीटर तक बुवाई कर सकते हैं।

असिंचित क्षेत्रों में चने की बुवाई अक्टुम्बर के प्रथम सप्ताह तक कर देवें। सिंचित क्षेत्रों में बुवाई 30 अक्टुम्बर तक करें। बुवाई का उचित समय अक्टुम्बर का द्वितीय पखवाड़ा हैं।

जिन खेतों में विल्ट का प्रकोप अधिक होता हैं वहां गहरी व देरी से बुवाई करना लाभप्रद रहता हैं। धान/ज्वार उगाये जाने वाले क्षेत्रों में दिसम्बर तक चने की बुवाई कर सकते हैं।

सिंचाई:-

प्रथम सिंचाई आवश्यकता अनुसार बुवाई के 75-80 दिन बाद फूल आने से पहले तथा दूसरी फलियों में दाना बनते समय की जानी चाहिए। यदि जाड़े की वर्षा हो जाये तो दूसरी सिंचाई न करें। फूल आते समय सिंचाई न करें अन्यथा लाभ के बजाय हानि हो जाती हैं। स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर समय व पानी की बचत हो जाती हैं। साथ ही, फसल पर कुप्रभाव नहीं पड़ता हैं।

Read also:- सोनामुखी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

निराई-गुड़ाई:-

प्रथम निराई-गुड़ाई के 25-35 दिन पर तथा आवश्यकता पड़ने पर दूसरी निराई-गुड़ाई करना मुश्किल हो वहां पर सिंचित फसल में खरपतवार नियंत्रण हेतु पलेवा के बाद आधा किलो फ्लूक्लोरीलीन प्रति हेक्टेयर की दर से 750 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव कर भूमि में मिलाये, तत्प्श्चात चने की बुवाई करें।

चना का पाले से बचाव:-

दिसम्बर से फरवरी तक पला पड़ने की संभावना रहती हैं। अतः इस समय आवश्यकता हो तो बचाव हेतु 100 लीटर पानी में एक लीटर तेजाब मिलाकर एक हेक्टेयर में स्प्रेयर द्वारा पौधों पर अच्छी तरह से छिड़काव करें एवं संभावित पाला पड़ने की अवधि में इस छिड़काव को दस दिन के अंतर पर दोहराते रहना चाहिये। पाला पड़ने की संभावना हो तब एक हल्की सिंचाई कर दे तथा पाला पड़ने की आशंका वाली रात्रि को खेत में धुँआ करें।

Read also:- ईसबगोल की जैविक खेती एवं उत्पादन तकनीक

चना में फसल संरक्षण:-

  • चने की फसल की कीट व रोगों से सुरक्षा आवश्यक होती हैं। चने की फसल में झुलसा, श्वेत तना गलन, उकटा प्रमुख रोग हैं, जो फसल को प्रभावित करते हैं तथा कटवर्म, दीमक, वायर, वर्म, फली छेदक कीट फसल को हानि पहुंचाते हैं।
  • अतः पौध संरक्षण का उपाय किसान भाई फसल बौने के समय स एकीकृत जीवनाशी प्रबंधन शुरू कर दें, तो कम लागत में कीट रोगों का नियंत्रण हो जाता है। चने की फसल को कीट, रोग व खरपतवार आदि से होने वाली को आर्थिक परिसीमा से निचे रखने में सक्षम अधिकाधिक विधियों का सामंजस्यपूर्ण उपयोग एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (आई.पी.एम.) हैं।
  • इसमें पर्यावरण के अनुकूल कृषण, यांत्रिक, जैविक एवं आवश्यक होने पर रासायनिक पौध सरंक्षण क्रियाओं का परस्पर उपयोग किया जाता हैं।

चना की कटाई एवं उपज:-

चने की कटाई का उचित समय फरवरी-मार्च हैं। इस समय चने को हसिये की सहायता से काटना चाहिए। चने की उपज असिंचित अवस्था में 8-10 क्विंटल तथा सिंचित अवस्था में 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाती हैं।

Read also:- जौ की उन्नत खेती और उत्पादन तकनीक

About the author

Vijay Dhangar