जैविक खेती (Organic farming)

जैविक खेती एक वरदान Organic farming

Written by Bheru Lal Gaderi

जैविक खेती (Organic farming) खेती की एक ऐसी पद्धति है जिसमें रासायनिक कीटनाशकों खरपतवारनाशीयों एवं  उर्वरकों के उपयोग के स्थान पर जीवांश खाद (गोबर की खाद, कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट खाद, जीवाणु कल्चर, राइजोबियम, एएजेक्टोबेक्टर, एजोस्पाइरिलम, पीएसबी आदि) पोषक तत्व के स्रोत के रूप में एवं हानिकारक जीवो को नियंत्रित करने के लिए जैवनाशियों (बायोपेस्टिसाइड) जैसे एन.के.बी. ट्राईकोग्रामा, ट्राइकोडरमा, नीम धतूरा, गोमूत्र एवं बायो एजेंट आदि का उपयोग करना।

जिससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित होने से बचता है लागत घटने एवं उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ने से किसान को भी लाभ ज्यादा होता है।

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जैविक खेती के सिद्धांत:-

  • प्रकृति की धरोहर है।
  • प्रत्येक जीव के लिए मृदा ही स्त्रोत है।
  • हमें मृदा को पोषण देना है ना कि पौधे को जिसे हम उगाना चाहते हैं।
  • ऊर्जा प्राप्त करने वाली लागत में पूर्ण स्वतंत्रता।
  • परिस्थिति का पुनरुद्धार

जैविक खेती का उद्देश्य:-

इस प्रकार की खेती करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि रसायनों तथा रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न हो तथा इसके स्थान पर जैविक उत्पाद का उपयोग अधिक से अधिक हो। लेकिन वर्तमान में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए तुरंत उत्पादन में जैविक खेती का प्रारूप क्रियान्वित करने से प्राप्त किया जा सकता है जैसे: कार्बनिक खादों का उपयोग, जीवाणु खादों का प्रयोग, फसल अवशेषों का उचित प्रयोग द्वारा कीट व रोग नियंत्रण, फसल चक्र में दलहनी फसलों को अपनाना एवं मृदा संरक्षण क्रियाएं अपनाना इत्यादि।

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जैविक खेती की आवश्यकता:-

  • कृषि उत्पादन में टिकाऊपन के लिए।
  • मृदा की जैविक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए।
  • प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए।
  • वातावरण प्रदूषण को रोकने के लिए।
  • मानव स्वास्थ्य की रक्षा हेतु।
  • उत्पादन लागत को कम करने के लिए।

ऐसे अपनाए जैविक खेती:-

जैविक खेती को समझने एवं फसल की उत्पादकता बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से  दो घटको में बांट सकते है। पहला पोधो के लिए- खुराक अर्थात पोषक तत्व प्रबंध एवं दूसरा कीड़ो एवं रोगो से रक्षा अर्थात समेकित नाशीजीव प्रबंधन करना। सफल जैविक खेती जैविक खेती के लिए इन दोनों को विस्तार से जानना चाहिए।

जैविक विधि से पोषक तत्व प्रबंध:-

पौधों को अपना जीवन चक्र को पूर्ण करने के लिए 17 प्रकार के पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है इनमें कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन पौधों को पानी व हवा से मिल जाते हैं। जबकि लोहा, जस्ता, मैग्नीज, तांबा, बोरोन, मोलिब्डेनम एवं कोबाल्ट (सात तत्व) की आवश्यकता बहुत काम मात्रा में होती है। मिट्टी में कैल्शियम एवं मेग्नेशियम की प्रायः कमी नहीं पाई जाती है। इन तत्वों को बहुत छोटा भाग दानों में संग्रहित होता है। अतः यदि फसल अवशेष, कंपोस्ट, गोबर की खाद का नियमित उपयोग किया जाए तो पौधों के लिए इन तत्वो के साथ पोटाश की भी कमी नहीं हैं। क्योंकि मनुष्य के लिए उपयोगी दालों में पोटाश बहुत ही कम मात्रा में पाई जाती हैं।

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शेष तीन महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में गंधक की व्यवस्था जिप्सम का उपयोग कर की जा सकती है। इसी प्रकार प्रकृति में उपलब्ध रॉक फास्फेट खनिज एवं पी.एस.बी. व पी.एस.एम जीवाणु द्वारा फास्फोरस की व्यवस्था की जा सकती है। इसके लिए रॉक फास्फेट को खेत में डालें। बीज को बोने से पहले पी.एस.बी. पी.एस.एम. जीवाणु खाद से उपचारित करें। सबसे महत्वपूर्ण तत्व नत्रजन के पौधों के लिए पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता सुनिश्चित करना जैविक खेती का सबसे कठिन कार्य है। क्योंकि इस तत्व का जमीन में संचय नहीं किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार नत्रजन की मात्रा जमीन में कार्बन की मात्रा तापमान का पर निर्भर है। हमारे राजस्थान का औसत तापमान ज्यादा हैं। इस कारण जमीन का कार्बन जलकर कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनकर हवा में उड़ जाता है तथा जमीन में कार्बन की कमी बनी रहती हैं।

पौधों की नत्रजन की आवश्यकता की पूर्ति निम्नलिखित तरीको से की जानी चाहिए:-

  1. एक ही प्रकार की फसल हर साल नहीं उगाये। वर्ष में एक बार दाल वाली फसल अवश्य बोनी चाहिए। बाजरा, ज्वार, तिल, के बाद सर्दी में चना, मसूर, बोये। गेहूं, जौ, सरसों के बाद जो बरसात में मूंग, मोठ, उड़द, अरहर, मूंगफली बोनी चाहिए। ये गाठें यूरिया की छोटी-छोटी फैक्ट्रियों का काम करती है।
  2. फसलों के अवशेषों में आधा प्रतिशत तक नत्रजन होता है इसलिए इसका कंपोस्ट बनाकर उपयोग करें। इसके पोषक तत्वों के साथ भूमि में कार्बन की मात्रा बढ़ती है जो जमीन में कार्बन को रोकने के लिए आवश्यक है।
  3. पशुओं के पेशाब में गोबर से भी अधिक मात्रा में नत्रजन होती है इसका समुचित उपयोग करने के लिए पशु के बैठने के स्थान पर रॉकफॉस्फेट की थोड़ी मात्रा डालनी चाहिए। पशु के पेशाब में मिले हुए रॉकफॉस्फेट को सुपर कंपोस्ट बनाने में काम लेना चाहिए, इससे कंपोस्ट में नत्रजन की मात्रा में काफी बढ़ोतरी हो जाती है।
  4. उपलब्ध गोबर व कचरे से केंचुआ खाद (वर्मी कंपोस्ट) तैयार करनी चाहिए। वर्मी कंपोस्ट में पोषक तत्वों की मात्रा सामान्य कंपोस्ट के मुकाबले ज्यादा होते हैं।

  5. दलहनी फसलों के बीज को राइजोबियम जीवाणु खाद से उपचारित करके बुवाई करें। जड़ों में उपस्थित रहकर यह जीवाणु वातावरण नत्रजन को सीधे पौधों को उपलब्ध कराता है, साथ ही अगले मौसम में उगाई जाने वाली फसल के लिए भी जमीन में नत्रजन की उपलब्धता बढ़ाता है।
  6. बाजरा, ज्वार, गेहूं व जौ में एजेटोबेक्टर जीवाणु खाद से बीज का उपचार कर बुवाई करनी चाहिए। यह जमीन में स्वतंत्र रूप से रह कर हवा की नत्रजन को खाता रहता है और बढ़ता रहता है। कुछ समय बाद यह जीवाणु मर जाता है और इसके शरीर की नत्रजन कुछ समय बाद पौधों को मिल जाती है। इसी प्रकार धान की फसल में एजोला का उपयोग कर हवा की नत्रजन का उपयोग संभव है।
  7. ग्वार, ढेंचा, सनई की हरी खाद से जमीन में नत्रजन व कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है।
  8. नीम, अरंडी, करंज की खली खलियों का उपयोग भी नत्रजन की आपूर्ति के लिए किया जा सकता है। बुवाई के 1 माह पहले 10-12  टन खली को एक हेक्टेयर खेत में मिलाएं।
  9. ऊंट की खाद, मुर्गी की बीट, भेड़ बकरियों की मींगनी, खून की खाद, हड्डी की खाद आदि का उपयोग जमीन में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाता है। अतः इनका उपयोग भी फायदेमंद रहता है।

उपरोक्त सभी उपायों को समन्वित रूप से अपनाकर नत्रजन की आपूर्ति बनाए रखी जा सकती है।

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जैविक विधि से फसलों की सुरक्षा:-

पौधों के हानिकारक कीड़े बीमारियों एवं खरपतवार नाशीजीव की श्रेणी में आते हैं। इनका प्रकोप फसल को चौपट कर सकता है। उक्त नाशीजीवों की कमजोर अवस्था पर प्रभावी प्राकृतिक तरीकों का उपयोग कर इन के प्रकोप का स्तर न्यूनतम रखना चाहिए।

खरपतवार प्रबंध:-

खरपतवार फसल के दुश्मन है। यह फसल के हिस्से की खुराक- पानी एवं हवा खा जाते हैं।  इन पर कीड़े व रोग भी पलते हैं। इससे फसल की उपज बहुत कम हो जाती है। अतः ऐसे प्रयास करें कि खेत में खरपतवार नहीं उगे। इसके लिए साफ बीज की बुवाई करें। खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट डालें। खरपतवारों को बीज बनने से पहले ही उखाड़ कर नष्ट कर दें। इससे अगले साल कम खरपतवार उगेंगे। खड़ी फसल में खरपतवारों की शुरू के 20-30 दिन में ज्यादा पड़ती हैं।

कीट प्रबंधन:-

फसलों को हानि पहुंचाने वाले कीट मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं।

पहले प्रकार के कीट पौधों का रस चूस कर एवं वायरस का संक्रमण फैलाकर  नुकसान पहुंचाते हैं। इनमें मोयला, मौला या चेंपा, हरा, तेला, थ्रिप्स, लाल मकड़ी, सुंदर झंगा (पेंटेड बग) आदि प्रमुख कीड़े हैं।

इन हानिकारक कीड़ों के प्रकृति में अनेक दुश्मन मौजूद हैं- जैसे लेडीबर्ड बीटल, क्राइसोपा, व मकड़ी। क्राइसोपा अब प्रयोगशाला में तैयार किए जाने लगे हैं।

दूसरे प्रकार के कीड़ों में सूण्डियां (लट) प्रमुख हैं जो फसलों को काटकर एव कुतरकर हानि पहुंचाती हैं। प्रकृति में इन कीड़ों के दुश्मन भी मौजूद हैं इनमें ट्राइकोग्रामा,  मडवेस्ट, रोबर मक्खी, मेंटिस, पक्षी आदि शामिल हैं।

ट्राइकोड ग्रामा के द्वारा लटों के अंडों से निकलने से पहले ही नष्ट किया जा सकता है। अतः फसल के अनुसार इनका उपयोग किया जा सकता है।

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तीसरे प्रकार के कीड़े भूमि में रहते हैं यह फसल की जड़ों को काट कर खाते हैं। इनमें दीमक व सफेद लट प्रमुख है। कच्चा देसी खाद एवं फसल के बिना सड़े अवशेष खेत में डालने से दीमक का प्रकोप बढ़ता है। अतः अच्छी तरह से सड़ी हुई कंपोस्ट खेत में बुवाई से एक माह पहले मिला देवे। दीमक नमी से दूर भागती हैं। खेत में नमी की कमी नहीं रहे। दीमक के बिल को खोदकर रानी को नष्ट कर दे।

चौमासे की पहली भारी वर्षा के समय सफेद लट के प्रौढ़ (भृंग) जमीन से निकलते हैं। रात में यह कीड़े नीम, बेर,खेजड़ी को खाते हैं, साथ ही प्रकाश पर भी आते हैं। पेड़ों को खाते भ्रम को दूसरे दिन इकट्ठा कर मार दे। इसके अलावा प्रकाश पास द्वारा  भी भृंगो  को पकड़ कर मार दे। लट से बचने के लिए 1 हेक्टेयर भूमि में 12 टन नीम की खली मिलाए। जिससे सभी प्रकार के जमीन के कीड़ों से फसल बची रहती हैं।

प्रकृति में यदि दो दुश्मन की एवं मित्र कीट मौजूद हैं तो फसलों में किसी भी प्रकार की दवाओं के छिड़काव की जरूरत नहीं होती हैं। लेकिन मित्र कीटों की उपस्थिति के बावजूद कभी-कभी कीड़ों का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर से अधिक हो सकता है।

ऐसी स्थिति में सुंडियों के नियंत्रण के लिए बी. टी.  एन.पी.वी. आदि का प्रयोग प्रभावित होता है। नीम की पत्तियों का रस, नीम का तेल, नीम की खली एवं नीम के तेल में उपस्थित अजाडिरेक्टिन बहुत प्रभावी कीटनाशक का काम करता है. यह सभी प्रकार के कीड़ों का नियंत्रण करने में सक्षम हैं। इसके अतिरिक्त फेरोमोन ट्रेप, प्रकाश पाश  द्वारा भी प्रौढ़ कीटों को पकड़ कर नष्ट किया जा सकता है।

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बीमारियों का प्रबंध:-

जैविक तरीकों से बीमारियों की रोकथाम कीड़ों के बजाय कठिन होती हैं। अतः रोगों से बचने के लिए शुरू से सावधान रहना आवश्यक हैं।

  1. भूमि के जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए गर्मियों में गहरी जुताई करनी चाहिए।  इससे जमीन में छुपे जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
  2. एक ही फसल की बुवाई लगातार नहीं करनी चाहिए। इससे फसल में लगे कीटाणुओं को अगले मौसम में पोषक पौधे नहीं होने से भोजन नहीं मिलेगा और मर जाएंगे।
  3. रोग रोधी उन्नत किस्मों की बुवाई करनी चाहिए, क्योंकि इनमें रोगों से लड़ने की शक्ति होती हैं। बीज को गर्मी की तेज धूप में सुखाएं। इससे बीज में मौजूद जीवाणु मर जाते हैं।
  4. ट्राइकोडरमा मित्र फफूंद हैं। यह रोग फैलाने वाले फफूंद की बढ़वार रोक देती हैं। अतः  बीज को ट्राइकोडरमा (फफूंद) से उपचारित करके बोये।  इससे भूमि एवं बीज जनित रोगों से एक हद तक छुटकारा मिल सकता है।
  5. फसल में रोगी पौधों को देखते ही उखाड़कर कर नष्ट कर देना चाहिए। इसके दो फायदे होंगे पहला रोग का फैलाव नहीं होगा। दूसरा जमीन में जीवाणुओं की संख्या कम होगी। इससे अगले वर्ष फसल पर रोग का प्रकोप कम होगा।

इस प्रकार जैविक खेती में समेकित पोषक तत्व प्रबंध एवं समेकित नाशीजीव प्रबंध में प्रकृति में उपलब्ध जैविक घटकों को आवश्यकता के अनुसार उपयोग किया जाता है।

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प्रस्तुति:-:-

शंकर सोयल एवं दीनदयाल बेरवा,

राजस्थान कृषि महाविद्यालय उदयपुर

पप्पू खटीक तकनीकी सहायक,

के.वी.के. अंता, जिला- बारा, राजस्थान

About the author

Bheru Lal Gaderi

नमस्ते किसान भाइयों मेरा नाम भेरू लाल गाडरी है। इस वेबसाईट को बनाने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को खेती-किसानी, पशुपालन, विभिन्न कृषि योजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना है।