जैविक खेती (Organic farming)

जैविक खेती कैसे करें पूरी जानकारी | Organic Farming Tips

जैविक खेती
Written by Bheru Lal Gaderi

जैविक खेती एक लाभकारी कृषि पद्धति:-

भारतीय किसान हरित क्रांति की दस्तक से सैकड़ों साल पहले से ही जैविक खेती करते आए हैं। जिसे आमतौर पर जैव खेती भी कहा जाता है।

जैविक खेती

देश भर में कई आदिवासी समुदाय आज भी झूम खेती का तरीका अपनाते हैं जो जैविक खेती (Organic Farming) जैसा ही है। लगभग पिछले एक दशक से किसान समुदायों, नीति निर्धारकों और वैज्ञानिकों ने महसूस किया है, कि हरित क्रांति द्वारा कृषि रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने से स्थिति यहां तक आ गई है, जहां इसे सीमित एवं गैर- नवीकरणीय संसाधनों के सहारे चलाया जा रहा है।

इस प्रकार, हर कीमत पर जीवन के अस्तित्व की खातिर एक टिकाऊ और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। यह जैविक खेती के तरीकों को अपनाने से ही संभव है।

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जैविक खेती क्या है?

जैविक खेती फसल उत्पादन का एक तरीका है, जिसमें किसान मिट्टी को जीवंत रखते हुए खेती कर फसलों का उत्पादन करते हैं।

गाय, बकरी, भैंस आदि के गोबर, जलीय अपशिष्ट और फसलों के अवशेषों के उपयोग द्वारा मिट्टी का स्वास्थ्य बरकरार रखा जाता है, जिनमें कुछ लाभदायक सूक्ष्मजीव होते हैं।

जैव-उर्वरक फसलों को पोषक तत्व देने में मदद करते हैं। यह तरीका अत्यधिक टिकाऊ, प्रदूषण मुक्त और पर्यावरण हितैषी हैं।

जैविक खेती और प्रकृति संतुलन:-

जैविक खेती प्रकृति के खिलाफ नहीं बल्कि यह प्रकृति के साथ मिलकर अपने समस्त ज्ञान तकनीकों और उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हैं।

इसमें प्रकृति और खेती के बीच एक स्वस्थ संतुलन बनाते हुए पारंपरिक खेती को आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के साथ जोड़ते हुए खेती की जाती है।

जिसमे फसल एवं जानवर विकसित और फलते फूलते हैं। जैविक खेती में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, हार्मोन या  पोषक तत्वों का इस्तेमाल वर्जित है।

इसके बजाय, यह पौधे और मिट्टी की रक्षा के लिए जैविक खाद हरी खाद, बारी बारी से फसल उत्पादन, फसल अपशिष्ट,  मिश्रित फसलों के उत्पादन और जानवरों के खाद पर आधारित रहती हैं।

इस प्रकार जैविक खेती परिस्थितिकी खेती तंत्र के स्वास्थ्य को बढ़ावा देती हैं। जैव-विविधता की रक्षा करती हैं और मिट्टी में जैविक गतिविधि बढ़ाती है।

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जैविक खेती के फायदे:-

  1. जैविक खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती हैं।
  2. इस पद्धति से पर्यावरण प्रदूषण कम होता है।
  3. जैविक खेती में कम पानी की आवश्यकता होती हैं। जिससे पानी का संरक्षण होता है।
  4. इस खेती से भूमि की गुणवत्ता बनी रहती हैं।
  5. इस खेती का सीधा प्रभाव पशुओं पर भी पड़ता है, क्योंकि उनको मिलने वाले भोजन में रसायन की मात्रा नहीं होती है। जिससे उनके द्वारा दिए गए दूध की गुणवत्ता भी बेहतर होगी तथा पशुओं का स्वस्थ भी बेहतर होगा।
  6. मनुष्यों पर भी इसका सीधा दीर्घकालीन प्रभाव होता है। जिससे कई असाध्य बीमारियों से बचा जा सकता है और अपनी सेहत को तंदुरुस्त बनाया जा सकता है।
  7. फसल अवशेषों को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं होती है।
  8. उत्तम गुणवत्ता युक्त फसल की पैदावार का होना।
  9. जैविक खेती में कम लागत आती है और अधिक उत्पादन होता है।
  10. कृषि में सहायक सूक्ष्मजीव ना केवल सुरक्षित होंगे बल्कि उन में बढ़ोतरी होगी।

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जैविक खेती के सिद्धांत:-

जैविक खेती निम्नलिखित 4 सिद्धांतों पर आधारित है।

स्वास्थ्य:-

जैविक खेती की भूमिका परिस्थितिकी तंत्र एवं मिट्टी से लेकर लघु से लघु जीवन एवं मनुष्य तक के स्वास्थ्य को बनाए रखने और उनके संवर्धन की हैं।

इसलिए इसमें उन रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, जानवरों की दवाओं और खाद्य पोषक तत्व-वर्धक दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिसका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

परिस्थितिकी:-

परिस्थितिकीय संतुलन के लिए स्थानीय स्थितियों, परिस्थितिकी और संस्कृति के मुताबिक जैविक खेती की जानी चाहिए।

यह जीवंत परिस्थितिकीय प्रणालियों एवं चक्रों के साथ की जाए और उन्हें जारी रखने के लिए मदद मिले। इससे पर्यावरण की गुणवत्ता बढ़नी चाहिए और इस्तेमाल एवं पुन: इस्तेमाल  द्वारा संसाधनों का संरक्षण तथा सामग्री एवं ऊर्जा का कुशल प्रबंध होना चाहिए।

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निष्पक्षता:-

जैविक खेती द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को एक अच्छा जीवन स्तर और गरीबी मिटाने में योगदान मिलना चाहिए। इसका मुख्य उद्देश्य एक समुचित सामाजिक एवं पारिस्थितिकीय तरीके से प्राकृतिक और पर्यावरण संबंधी संसाधनों के इस्तेमाल के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की आपूर्ति करना है।

देखभाल:-

वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा, उनके कल्याण एवं पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी एक जिम्मेदार तरीके से जैविक खेती की जानी चाहिए।

जैविक-खेती में विकास एवं प्रौद्योगिकी संबंधी पसंद चुनने में एहतियात  बरतनी चाहिए। वैज्ञानिक ज्ञान के साथ व्यवहारिक अनुभव और पारम्परिक तरीके यह सुनिश्चित करने के लिए अपनाये जाये की जैविक खेती स्वास्थ्यवर्धक और परिस्थितीय रूप से मजबूत हो।

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जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाले तरीके:-

जैविक खेती में बेहतरीन नतीजे पाने के लिए एक व्यवस्थित तरीके से इसके आवश्यक भागों को विकसित किया जाना चाहिए।

  1. प्राकृतिक वास का विकास।
  2. कृषि निवेश की चीजों के उत्पादन के लिए खेत पर सुविधाएं।
  3. फसल उगाने का अनुक्रम एवं मेले की फसलों का नियोजन।
  4. तीन-चार साल की चक्रण योजना
  5. क्षेत्र, मिट्टी एवं जलवायु के अनुकूल फसलों का उत्पादन।
  6. खेत पर सुविधाओं और प्राकृतिक वास का विकास

ढांचागत सुविधाएं:-

खेत का 3-5% स्थान मवेशियों, केंचुए की खाद की क्यारियां, कंपोस्ट टैंक, सिंचाई का कुआं, जल पंपिंग की ढांचागत सुविधा आदि के लिए आरक्षित रखना चाहिए।

जिनके जरिए संसाधनों के असरदार इस्तेमाल से उत्पादन में वृद्धि होती हैं। इस स्थान में उपयोगी ढांचागत सुविधाओं पर छाया के लिए न्यूनतम 5-7 पेड़ लगाने चाहिए।

उपयुक्त स्थानों पर वर्षा जल के संरक्षण के लिए टैंक खुदवाना चाहिए। तरल खाद तैयार करने के लिए लगभग 200 लीटर की टैंक और वनस्पतियों के लिए कुछ टैंक या पीपे भी रखने चाहिए।

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प्राकृतिक वास एवं जैविक-विविधता:-

जीवो के विभिन्न रूपों के भरण पोषण के लिए एक उपयुक्त प्राकृतिक वास जैविक खेती का आवश्यक हिस्सा है। यह स्थानीय जलवायु के अनुकूल विभिन्न किस्मों के पेड़ और झाड़ियां लगाकर बनाया जा सकता है।

पेड़ एवं झाड़ियां मिट्टी की गहरी परतों से पोषक तत्व सतह पर लाना सुनिश्चित करती हैं। यह पक्षियों, जीव-भक्षियों एवं कीट-मित्रों को भी आकर्षित करते हैं और उन्हें भोजन एवं आश्रय देते है। पेड़ों की छाया के प्रभाव से होने वाले उत्पादन की कुछ कमियों की भरपाई कीटों की समस्याओं में कमी से हो जाती हैं।

मिट्टी को जैविक बनाना:-

रसायनों पर रोक:-

पौधों की कुछ जैविक प्रक्रियायें पोषक तत्व पाने में लगी रहती है। जैसे- नाइट्रोजन, जो उन्हें रसायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों से मिलता है। मगर इससे सूक्ष्मजीवों में कमी आती है।

इसलिए जैविक खेती में रसायनों से बचा जाता है और जैविक कंपोस्ट को बढ़ावा दिया जाता है। खाद इस्तेमाल और मिट्टी को उपजाऊ बनाना समुचित मात्रा में अच्छी तरह से गले जैविक पदार्थ, हरी खाद और पौधे के सूखे कचरे मवेशियों के गोबर की खाद और जैव उर्वरक जैसी चीजों के इस्तेमाल के जरिए मिट्टी के उपजाऊपन में सुधार लाया जा सकता है।

अच्छी तरह भरण-पोषण एवं स्वस्थ मिट्टी जिसमें मौजूद सूक्ष्म जीवाणु एवं सूक्षम वनस्पति फसलों की पोषण जरूरतों की पूर्ति करते हैं। इसलिए ज्यादा मात्रा में खाद के इस्तेमाल से परहेज किया जाना चाहिए।

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तरल जैविक खाद:-

मिट्टी में लघु सूक्ष्म एवं जीवन के अन्य रूपों की गतिविधि बनाए रखने के लिए तरल खाद डालना आवश्यक है बहुत सामान्य रूप से उपलब्ध जैविक सामग्रियों से कुछ तरल खाद तैयार करने के आसान तरीके निम्नलिखित हैं।

पंचगव्य:-

गाय के 5 किलोग्राम ताजा गोबर, 3 लीटर मूत्र, 2 लीटर दूध, 2 लीटर दही, 1 लीटर बटर ऑयल को मिलाएं और 7 दिन तक सड़ने दे।

प्रतिदिन दो बार मिश्रण को हिलाए।

उपयोग विधि:-

3 लीटर पंचगव्य को 100 लीटर पानी में डालकर उसे पतला करें और मिट्टी पर छिड़काव करें। मिट्टी पर छिड़कने के लिए प्रति एकड़ सिंचाई के लिए पानी के साथ 20 लीटर पंचगव्य की जरूरत पड़ती हैं।

अमृतपानी:-

गाय के 10 किलोग्राम गोबर, को पर में 500  ग्राम शहद मिलाएं और एक मलाईदार लेई बनाने के लिए घोटें। इसमें गाय का 250 ग्राम देसी घी मिलाएं और तेज गति से मिलाएं।

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उपयोग विधि:-

इसे 200 लीटर पानी में पतला करें। इस गोल का मिट्टी के 1 एकड़ क्षेत्र में या सिंचाई के पानी के साथ छिड़काव करें। 30 दिनों के बाद पौधों की बीच की पंक्तियों में सिंचाई के पानी के जरिए दूसरी खुराक छिड़कें।

जीवामृत:-

200 लीटर पानी में 10 किलोग्राम गाय का गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 2 किलोग्राम गुड़, 2 किलोग्राम किसी भी दाल का आटा और 1 किलो ग्राम वन मिट्टी मिलाए। इसे 3 से 5 दिन तक सड़ने दे। इस गोल को नियमित रूप से 1 दिन में 3 बार हीलाएं।

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उपयोग विधि:-

इसका सिंचाई के पानी के साथ 1 एकड़ जमीन पर इस्तेमाल करें।

पत्ते पतियों से ढकाना (मल्चिंग):-

खेती की इस तकनीक में फसल उगाने के दौरान सूखे पत्तों, तीनको और खेत के जैविक कूड़े करकट से खुली मिट्टी को ढका जाता है। इस तरीके से फसलों के बीच खुली पड़ी ऊपरी मिट्टी के बहाव की रोकथाम होती हैं।

इससे मिट्टी के उपजाऊपन और मिट्टी के प्रवेश की क्षमता का संवर्धन भी होता है। जिससे मृदा की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं एवं खरपतवारओं पर नियंत्रण रहता है।

Mulchin (मल्चिंग) से सूक्ष्म जीवाणु और केंचुओं की मात्रा में भी वृद्धि होती हैं, जो मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार के लिए जरूरी है। इससे प्रति एकड़ फसल की उपज बढ़ती है।

मल्चिंग के प्रकार:-

मल्चिंग के दो प्रकार होते हैं।

  1. अस्थाई मल्चिंग
  2. स्थाई मल्चिंग

अस्थाई मल्चिंग:–

इस प्रकार की मल्चिंग में मल्च में सूखे, हरे पत्ते और सब्जियों के कचरे को कम्पोस्ट में मिश्रित किया जाता है। जिसकी पतली परत मिट्टी पर चढ़ाई जाती है और उसे जोता जाता है।

फसल की रोपाई के बाद मिट्टी पर फिर मल्चिंग की जाती है ,इससे सूखे पत्ते और सब्जी का पदार्थ घल जाता है और मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं।

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स्थाई मल्चिंग:-

इसमें पूरी तरह से गले कंपोस्ट अर्थ कंपोस्टेड खेत के कचरे और खेत के ताजा कचरे एक साथ मिश्रित किए जाते हैं और पौधों के प्रतिरोपण से पहले उसको एक मोटी परत के रूप में मिट्टी पर छिड़काव किया जाता है।

इस तरीके में 1 साल में सिर्फ दो बार खेत के कचरे की ताजा परत जोड़ी जाती है और मिट्टी को पुनः खोदने की जरूरत नहीं पड़ती। इसको बनाए रखने के लिए मंच पर बार-बार पानी डाला जाता है।

जैव उर्वरक और सूक्ष्म जीवाणु समूह का इस्तेमाल:-

जैव-उर्वरकों में राइजोबियम, एजोटोबेक्टर, एजोस्पिरिल्लूम, फास्फेट सोलुबिलाइजिंग बैक्टेरिया (पी.एस.बी.) और सूडोमोनास होते है। जैव उर्वरकों  को बीजों, पौधों की सतहों या मिट्टी पर इस्तेमाल किया जाता है, ताकि पौधों में प्राथमिक पोषक तत्व की आपूर्ति बढ़ाकर उनके विकास को बढ़ावा दिया जाए।

हाल ही में स्थानीय जलवायु की स्थितियों के अधिक अनुकूल जैव उर्वरक विकसित किए गए हैं और वाणिज्यिक रूप से उपलब्ध कराए गए हैं।

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इस्तेमाल के तरीके:-

जैव उर्वरक तीन विभिन्न तरीकों से फसलों और पौधों पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

बीज उपचार:-

300-400 मि.ली. पानी में एजोटोबेक्टर/एजोस्पिरिलम और पीएसबी को 200-200   ग्राम घोलें और पूरी तरह मिश्रित करें। इस गोल को 10-12 की.ग्रा. बीज में डालें और उसे तब तक हाथ से मिश्रित करते रहें, जब तक की सभी बीजों पर समान रूप से परत ना चढ़ जाए।

उपचारित बीजों को छाया में सुखाए है और उनकी अति शीघ्र बुवाई करें।

पौधों की जड़ का उपचार:-

पानी की पर्याप्त मात्रा (5 से 10 लीटर 1 एकड़ में पौध के प्रति रोपण के लिए आवश्यक मात्रा पर आधारित) में एजोटोबेक्टर/एजोस्पिरिलम और पीएसबी को एक से 2 किग्रा घोले।

प्रतिरोपण से 20 से 30 मिनट पहले पौधों की जड़े इस गोल में डुब्बयें।  धान के मामले में खेत में एक पर्याप्त आकार की क्यारी 2 मीटर लंबी X 1 मीटर चौड़ी X 0.  15 मीटर ऊंची बनाएं।

उसमें 5 से.मी. तक पानी भरें और एजोस्पिरिलम और पीएसबी  2-2 किग्रा.   घोलें और उसे पूरी तरह मिश्रित करें। अब इस क्यारी में 8 से 12 घंटे तक (रात-भर) बाल पौधों की जड़े डुबायें और उसके बाद प्रतिरूपण करें।

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मिट्टी का उपचार:-

मिट्टी के उपचार के लिए प्रति एकड़ पौधों की संख्या के आधार पर एक एकड़ के लिए 2 से 4 किग्रा एजोटोबेक्टर/एजोस्पिरिलम और 2  से 4 किग्रा पीएसबी की जरूरत पड़ती हैं। अलग से 2 से 4 लीटर पानी में जैव उर्वरक मिश्रित करें और इस गोल का 50 से 100 किग्रा कंपोस्ट के दो अलग-अलग ढेरों पर छिड़काव करें।

अलग से इन ढेरों को मिश्रित करें और रात भर सेनाइ (इनक्यूबेशन) के लिए छोड़ दें। 12 घंटे बाद इन दोनों ढेरों को साथ में मिश्रित करें। अम्लीय मिट्टी के लिए इस मिश्रण में 25 ग्राम चुना मिलाएं।

जैविक खेती से जुड़े तरीके:-

जैविक-खेती में खेती के विभिन्न तरीके शामिल है, जिन में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

जैविक खेती का उद्देश्य न सिर्फ रसायन आधारित खेती से दूर रहना बल्कि जहर मुक्त खाद्य फैसले उगाना बेहतर एवं अधिक विभिन्न फसलों की उत्पादकता और छोटे किसानों के लिए खाद्य सुरक्षा पाना भी हैं।

बहुफसलीय पद्धति से उत्पादन और फसल बदल बदल कर लगाना (फसल चक्र) जैविक खेती प्रणालियों की दो प्रमुख विशेषताएं हैं।

क्योंकि यह स्वास्थ्यवर्धक मिट्टी के निर्माण के नियंत्रण और उत्पादकता में वृद्धि के तंत्र प्रदान करती हैं। छोटे किसानों के लिए बहुफसलीय पद्धति और फसल रोटेशन (फसल चक्र) के तरीकों से उत्पादन के इस्तेमाल का उद्देश्य फसल रोटेशन के प्रबंधन को समझने, रोटेशन से जुड़ी समस्याओं से दूर रहने और विभिन्न फसलों के उत्पादन के क्रम के इस्तेमाल के जरिए मिट्टी को बेहतर बनाना, कीट नियंत्रण और लाभदायक खेत का विकास है।

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बहु-फसलीय (मिश्रित खेती) पद्धति से उत्पादन:-

मिश्रित खेती जैविक खेती की एक प्रमुख विशेषता है, जिसमें एक ही खेत में एक साथ या समय बदल कर कई किस्म की फसलों की पैदावार ली जाती है।

मिश्रित खेती प्रकाश संश्लेषण को बढ़ावा देती हैं और पोषक तत्वों में प्रतिस्पर्धा नहीं होती, क्योंकि भिन्न-भिन्न पौधे मिट्टी की भिन्न-भिन्न गहराई से पोषक तत्व खींचते हैं।

फसल रोटेशन (फसल चक्र):-

फसल चक्र (फसल रोटेशन) जैविक खेती के तरीकों की आधारशिला है। मिट्टी को स्वस्थ रखने और प्राकृतिक सूक्ष्मजीव प्रणालियों के कार्य के लिए फसल रोटेशन बहुत जरूरी हैं।

फसल-रोटेशन एक ही खेत पर विभिन्न फसले उगाने की पद्धति हैं। किसानों को बेहतरीन नतीजों के लिए 3 से 4 सालों की रोटेशन योजना पर अमल करना चाहिए। पोषक तत्वों की उच्च-मांग आधारित फसलों का मेल किया जाना चाहिए।

अन्य तरीका कीड़ा मेजबान और गैर कीड़ा मेजबान फसलों का रोटेशन हैं, जिससे मिट्टी जनित बिमारियों, कीड़े-मकड़े,  खरपतवार पर नियंत्रण में मदद मिलती हैं।

दाल प्रजातिय- बहू फसलों की के साथ अनाज एवं सब्जियों की फसल का रोटेशन किया जाए। हरित खाद की फसलों का रोटेशन योजना में समुचित स्थान दिया जाना चाहिए।

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सारांश:-

पृथ्वी मानव व पर्यावरण के बीच मधुर परस्पर लाभदायी तथा दीर्घ आयु संबंधी की अवधारणा को आधार बनाकर आज की जैविक खेती की परिकल्पना की गई है। समय के बदलते स्वरूप के साथ जैविक खेती अपने प्रारंभिक काल के मुकाबले अब और अधिक जटिल हो गई हैं और अनेक नए आयाम अब इसके अंग हैं।

जैविक खेती का नीति निर्धारण प्रक्रिया में प्रवेश तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उत्कृष्ट उत्पाद के रूप में पहचान इसकी महत्ता का प्रतीक है। विगत दो दशकों में विश्व समुदाय में खाद्य गुणवत्ता सुनिश्चित करने के साथ-साथ पर्यावरण को स्वस्थ रखने हेतु भी जागरूकता बढ़ी हैं।

अनेक किसानों व संस्थाओं ने इस विद्या को भी समान रूप से उत्पादन क्षम पाया है। जैविक खेती प्रणेताओं का तो पूरा विश्वास है कि इस विद्या से ना केवल स्वास्थ्य वातावरण, उपयुक्त उत्पादकता तथा प्रदूषण मुक्त विकास की एक नई स्वपोषित  लंबी प्रक्रिया शुरू होगी।

शुरुआती हिचकिचाहट के बाद जैविक खेती अब विकास की मुख्यधारा से जुड़ रही हैं और भविष्य में आर्थिक, सामाजिक तथा पर्यावरण सुरक्षा के नए आयाम सुनिश्चित कर रही हैं।

हालांकि प्रारंभिक काल से अब तक जैविक खेती के अनेक रूप प्रचलित हुए हैं परंतु आधुनिक जैविक खेती अपने मूल रूप से बिल्कुल अलग हैं। स्वस्थ मानव, स्वस्थ मृदा तथा स्वस्थ खाद्य के साथ स्वस्थ वातावरण के प्रति संवेदनशीलता इसके प्रमुख बिंदु हैं।

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प्रस्तुति:-

मुकेश तोपवाल,

फसल सुरक्षा अधिकारी, कृषि विभाग

आरिफ, शोध छात्र

एवं एम एस नेगी

प्राध्यापक

सस्य विज्ञान गोविंद वल्ल्भ पंत कृषि महाविद्यालय

उत्तराखंड

 

About the author

Bheru Lal Gaderi

नमस्ते किसान भाइयों मेरा नाम भेरू लाल गाडरी है। इस वेबसाईट को बनाने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को खेती-किसानी, पशुपालन, विभिन्न कृषि योजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना है।