जैविक खेती (Organic farming)

जैविक खेती करने वाले सफल किसान की कहानी

जैविक खेती
Written by Bheru Lal Gaderi

मेरा नाम भगवान राव सालुंके गांव बड़वी तहसील महेश्वर जिला खरगोन का रहने वाला हूं, आज मैं आपको बताने वाला हूं कि मैंने जैविक खेती कब और क्यों चालू की। मैं पिछले 10 सालों से खेती कर रहा हूं मेरे पास 6 बीघा जमीन है और उसमें मैं 10 सालों से सब्जियां लेता हूं जिसमें शिमला टमाटर मिर्च और बेल वाली सब्जियां जितनी भी है मैं सभी प्रकार की सब्जियां करता हूं शुरू में जब सब्जी खेती करने लगा तो अच्छा उत्पादन मिला और रेट भी अच्छे मिलने लगे इस तरह से 4 साल तक तो मैंने अच्छा पैसा कमाए।

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केमिकल के उपयोग से बिगड़ी खेती:-

सब्जियों में पर मैंने फिर देखा कि सब्जियों में दिन-ब-दिन खाद की मांग जमीन की बढ़ती गई और जो केमिकल दवाई आती है उसका भी ज्यादा उपयोग खेत में होने लगा जब ज्यादा उपयोग होने लगा तो जमीन भी हार्ड मतलब कड़क होती गई और बीमारियां बढ़ती गई हर बीमारी के लिए तीसरे या चौथे रोज कुछ ना कुछ दवाई डालनी पड़ती थी यह मजबूरी हो गई थी।

मिर्च की खेती आया घटा:-

फिर एक बार यूं हुआ कि मैंने 2 एकड़ में शिमला मिर्च और हरी मिर्च लगाई थी जिसमें मुझे दवाई और खाद का खर्च था करीबन 16000 के आसपास मेरा खर्च हो गया जो कोई कंपनी वाला आता था बड़ी बड़ी ऊंची ऊंची दवाइयां बता कर जाता था। उसको स्प्रे करने के बावजूद भी बीमारी कंट्रोल नहीं हुई और जो खेत में मजदूर काम कर रहे थे उनको भी कुछ ना कुछ समस्या होने लगी किसी को बुखार आ रहा है किसी को सर्दी जुखाम हो रहा है किसी को उल्टियां हो रही है।

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जैविक खेती से मिला रास्ता:-

इस कारण को देखते हुए मैंने सोचा क्यों ना ऐसा उपाय हो कि एक ही दवाई से सारी बीमारियां दूर हो जाए और खर्च भी ज्यादा ना लगे तो मेरे पास विकल्प आया की जैविक खेती में यह सब संभव है, तो फिर मैं सोचा कि क्यों ना मैं इसकी शुरुआत करूं और मैंने शुरुआत करी सबसे पहले मैंने एक गर्मियों में मूंग की फसल की तो मैं क्या देखता हूं कि मूंग आसपास के जो केमिकल वाले थे उनमें सफेद मक्खी का अटैक होने से वह सब पीले पढ़कर खराब हो गए हैं।

जैविक कीटनाशक का प्रयोग:-

मैंने घर पर 5 पत्ती का काढ़ा बनाया था और जो ब्रह्मास्त्र ने नीमस्त्र बनाया था वह स्प्रे करने से मेरे हैं ना तो सफेद मक्खी थी और ना कोई बीमारी थी बस एक से दो स्प्रे में मेरे मूंगा तैयार हो गए एक बीघा से मेरे करीबन 2 कुंटल मूंग हो गए तब जैविक को कोई पहचानता नहीं था बहुत कम लोग जैविक को जानते थे फिर मैंने सोचा कि क्यों ना मार्केट रेट पर ही लोगों को खिलाया जाए।

मूंग की दाल फिर उस दाल को मैंने हाथ की घंटी से घर पर तैयार की और वही दाल फिर लोगों को मैंने अलग अलग दी, जो लोगों ने मेरे को उसका बताया कि भैया आपके यहां की जो दाल है। शायद ही हमने पिछले 5 सालों में कभी खाई हो, जो पहले स्वाद था उस दाल जैसी आज खाने को मिले।

फिर मैंने मन बना लिया कि अब जैविक खेती ही करूंगा फिर मैंने जैविक खेती स्टार्ट कर दी और उसी साल मैंने जैविक से कपास, सोयाबीन, मक्का की फसल तैयार की उत्पादन तो फसल का कम था, पर बाकी जो खर्च था मार्केट का वह खर्च बच गया और उसके जो क्वालिटी थी वह केमिकल से बहुत अच्छी थी।

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जैविक किसान ने की मदद:-

जैविक खेती में एक हमारे मित्र ,है नरेंद्र सिंह राठौड़ लबरावदा धार के पास जो गांव है वहां से हैं उन्होंने मुझे जैविक खेती करने में बहुत सहायता की हम लोगों की चर्चा केवल फोन पर ही होती थी 2 साल तक तो हम मिले नहीं उसके बाद ही हमारा मिलना हुआ उन्होंने मुझे बताया कि जैविक खेती में किस समय क्या करना चाहिए।

उनके कहे अनुसार में जैविक खेती करने लगा और जो बताते गए वह चीजें डालता गया मैं 2 साल के भीतर ही मेरे को देखने को मिला कि मेरी जमीन पहले से बहुत ज्यादा मुलायम वह उपजाऊ होने लगी है।

उसमें केंचुए की मात्रा भी बढ़ने लगी है। जिस खेत को हल ने के लिए पहले 3 घंटे लगते थे वह खेत आप 2 घंटे में ट्रैक्टर से हकाई होने लगी।

जैविक खेती मुख्य समस्या:-

जैविक खेती में सबसे ज्यादा समस्या आई की हमारा जो उत्पाद था उसे बेचने में, क्यों कि उसमें सब्जियां जो है वे देखने में अच्छी नहीं दिखती थी। फिर हमें पता चला कि इंदौर में जैविक सब्जियों की बहुत डिमांड है, तो मैंने सब्जियां इंदौर में बेचने की सोची तो वहां से एक कृषि विश्वविद्यालय का लड़का है मेरे पास आया और मेरी सब्जियां ले जाने लगा।

रेट मेरा 40 रुपये किलो था, जो वह मान गया और सब्जियां ले जाने लगा तो मैंने कम से कम उसको 4 महीने सब्जियां दी। इसके बाद वह किसी कारणवश अपने घर चला गया तो मेरी सब्जियां रह गई थी। जो मैंने मंडी में वापस भेजना चालू की फिर उस लड़के ने दूसरे व्यक्ति को भेजा। इंदौर से उनका नाम है, कृष्णा जी- जो सब्जियां इंदौर में सप्लाई करते थे। उनसे कुछ परिवार जुड़े हुए हुए थे जिनको जैविक सब्जियां खाना पसंद था।

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जैविक खेती का करवाया रजिस्ट्रेशन:-

इस बीच मुझे पता चला कि जो जैविक खेती करते हैं, उनका रजिस्ट्रेशन भी होता है, तो मैंने भोपाल जाकर मेरा रजिस्ट्रेशन करवाया जहां मुझे साल का 2600 लगते हैं।

आज मैं खुद की जमीन से 6 बीघा है और 4 बीघा जमीन ठेके के लेकर उस पर भी जैविक खेती कर रहा हूं तो लोग मुझे पागल कहने लगे कि यह कैसा व्यक्ति है कि दूसरे की जमीन पर भी जैविक खेती कर रहा है। इसको तो जैविक खेती में बहुत नुकसान होगा। लेकिन मैंने निश्चय कर लिया था कि चाहे जो हो मुझे जैविक खेती ही करना है।

पिछले दो-तीन सालों में मैंने सब तरह की फसलें ले चुका हु। जैसे- कपास, मक्का, सोयाबीन, गेहूं, चना, तुवर, मूंग, दाल आदिहु।

फिर एक दिन जितने भी जैविक किसान है, हम इकट्ठे हुए एक मीटिंग में तो हमारे बीच चर्चा हुई कि कौन सी फसल ऐसी है, जो जैविक खेती में नहीं ले सकते तो बहुत सारे किसानों का कहना था कि केला, गन्ना, पपीता यह फसलें आप जैविक में नहीं कर सकते। इसमें सबसे ज्यादा रसायन लगता है तो फिर मेरे मन में आया की क्यों ना यही फसलें लगाई जाए।

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शुरू की केला, गन्ना और पपीता की जैविक खेती :-

मैंने 2 एकड़ में केला और पपीता लगाया और 2 एकड़ में गन्ना लगाया तो आसपास के जो लोग थे, वह भी मुझे कहने लगे कि यार तूने यह केला और पपीता और गन्ना क्यों लगा क्योंकि जैविक में तो होगा नहीं तेरे से मैंने कहा अब जो भी होगा देखा जाएगा।

फिर मैंने गन्ने की फसल और केले पपीता की फसल में जैविक चीजें चालू की। जिसमें दो जगह जीवामृत और पंचदेव केंचुआ खाद इन सारी चीजों का उपयोग किया। केले की फसल में मैंने तीन से चार ही जैविक खाद चलाई क्योंकि पहले से ही जमीन दो-तीन साल हो चुके थे जमीन बहुत मुलायम हो गई थी और केले की ग्रोथ अच्छी हो रही थी

केले की हाइट 10 से 12 फुट 6 महीने में हो गई थी और उसमें 7 से 8महीने में केले निकलना चालू हो गए थे। मैंने देखा कि केले का साइज भी बहुत बढ़िया है और कलर भी अच्छा तो मैंने फिर केवल उसमें पानी चलने दिया। पानी के अलावा कुछ नहीं दिया 12 महीने में मेरी पहली कटिंग आ गई और पहली कटिंग में मेरा केला 2 टन निकला।

गन्ने का जूस बनाकर बेचा:-

इसके बाद बारी थी गन्ने की, तो गन्ने में थोड़ा सा ग्रोथ कम हुआ और उत्पादन भी कम रहा। तो फिर मैंने सोचा कि इस गन्ने का क्या किया जाए क्योंकि जेविक में तो कोई गन्ना लेगा नहीं। क्यों ना मैं कुछ ऐसा रास्ता निकालू कि, जिससे पैसे भी अच्छे बन जाए और जैविक का प्रचार-प्रसार भी अच्छे से हो जाए। मैंने गन्ने का रस निकालने की मशीन इंदौर से लेकर आया और जूस का काम चालू किया।

जो लोग रासायनिक वाला 10 रुपये में बेच रहे थे मैंने भी वही रस 10 रुपये में जैविक वाला भी बेचा और जैविक के बैनर लगाएं धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बढ़ती गई और मेरा 1 दिन में कम से कम 2000 रुपये तक का जूस बिकने लगा।

मैंने पूरे गर्मी के सीजन में 1 एकड़ का गन्ने का जूस निकाल कर बेच दिया। जिससे मेरा मुनाफा अच्छा हुआ और मैंने उसके साथ-साथ मेरा कार्ड छपवा कर लोगों में बढ़ता गया। जिससे मेरी पहचान अच्छी बन गई और सभी लोग मुझे जैविक नाम से पहचानने लगे आज मेरे पास केले की फसल 2 बीघा में खड़ी है और जो मेरे साथ केमिकल वाले लोगों ने लगाई थी, वह फसल केले की खत्म हो चुकी।

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जैविक गुड की 100 रुपये किलो की रेट से बेचा:-

बाकी जो गन्ना बचा था। इस साल में ने जैविक गुड निकाल लिया। जिसकी बुकिंग आज से 2 महीने पहले मैंने 100 रुपये किलो के हिसाब से कर ली थी।

आज मैंने सारा गुड बेच लिया और पैसे भी कमा लिए। आज अपने क्षेत्र में बहुत ज्यादा मेरी चर्चा हो रही है, कि इस भाई का गुड 100 रुपये किलो में बिका। मैं आज जैविक खेती से बहुत ही संतुष्ट हूं, क्योंकि इसमे 2 से 3 साल थोड़ा सा समय निकालना पड़ेगा इसके बाद आप की जमीन बहुत उपजाऊ हो जाएगी पर आपको मार्केट से कुछ भी लाना नहीं पड़ेगा।

आज मेरे पास 1 बीघा का मटर और 1 बीघा का प्याज और हल्दी अदरक और सब्जियां लगी हुई है और इसके साथ-साथ आलू है। बिना किसी दवाई खाद का तैयार है, जिसमें मैं 8 से 15 रोज में एक बार स्प्रे करता हूं, जैसे सड़ी हुई छाछ, नीम का काढ़ा, नीम की निंबोली का काढ़ा और आज मेरे घर और परिवार वाले भी बहुत खुश है, कि इसने सभी किसान भाइयों से भी यही कहना चाहता हूं कि ईमानदारी से जैविक खेती करें और महा धरती को जहर से बचाए और अपना परिवार और समाज को सुरक्षित रखें।

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जय हिंद…….

जैविक प्राकृतिक किसान भगवान राव शालूके

गांव बड़वी, जिला खरगोन

मोबाइल नंबर +91 91317 68319

इनकी दुकान महेश्वर धामनोद रोड पर हैं।

About the author

Bheru Lal Gaderi

नमस्ते किसान भाइयों मेरा नाम भेरू लाल गाडरी है। इस वेबसाईट को बनाने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को खेती-किसानी, पशुपालन, विभिन्न कृषि योजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना है।