फलों की खेती बागवानी

पपीता की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

पपीता की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक
Written by Vijay Dhangar

पपीता सबसे कम समय में फल देने वाला पेड़ है। इसलिए कोई भी इसे लगाना पसंद करता है। पपीता न केवल सरलता से उगाया जा सकने वाला फल है, बल्कि सबसे जल्दी फल देने वाला पेड़ है। यह स्वास्थ्यवर्धक फल के रूप में काफी लोकप्रिय हैं। इसमें कई पाचक  एन्जाइम पाए जाते हैं तथा इसके तजा फलों के सेवन से पेट सम्बन्धी रोग को भी दूर किया जा सकता है। इसे अमृत घट भी कहा जाता है।

पपीता की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

जलवायु एवं भूमि

यह उष्ण जलवायु का पौधा हैं। पपीते की अच्‍छी खेती गर्म नमी युक्‍त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस से 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है, न्‍यूनतम 5 डिग्री सेल्सियस से कम नही होना चाहिए। इसके लिए लू तथा पला हानिकारक होता है। जल निकास युक्त दोमट मिट्टी पपीते की खेती उत्‍तम होती है, भमि की गहराई 45 सेमि. होनी आवश्यक हैं।

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पपीता की उन्नत किस्मे

कुंर्ग‍हनीड्यू

पौधे कम ऊंचाई के होते हं जिन पर बहुत काम ऊंचाई पर फल लगने शुरू हो जाते हैं। पोधो में नर और मादा दोनों फूल आते हैं। फल बड़े आकार के गुद्दा मोटा व मीठा होता हैं।

रेड लेडी ताइवान

लोकप्रिय उभयलिंगी किस्म है। फल मध्यम आकार के 1.5 से 2 किग्रा भार युक्त जिनका गुदा मोटा व आकर्षक लाल रंग लिए होता है। यह किस्म जल्दी पकने वाली अधिक उत्पादक (70 से 80 किग्रा फल प्रति पौधा) के साथ रिंग स्पॉट वायरस से प्रति सहनशील है।

अन्य किस्मे

मेजस्‍टी एवं पूसा जाइंट, वाशिंगटन, सोलो, कोयम्‍बटूर, हनीड्यू, पूसा ड्वार्फ, पूसा डेलीसियस, सिलोन, पूसा नन्‍हा आदि प्रमुख किस्मे है।

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भूमि की तैयारी

खेत की अच्छी तरह जुताई कर समतल बनाना चाहिए तथा भूमि का हल्‍का ढाल उत्‍तम है।

पपीता का प्रवर्धन

नर्सरी में पौधे तैयार करना

पपीता का प्रवर्धन बीज द्वारा होता है। पौधे तैयार करने के लिए पौधशाला की अच्छी तरह खुदाई करके, खाद मिला कर उठी हुई क्यारिया तैयार कर लेनी चाहिए। बीजों को 2 सेमी की दूरी पर 10 सेमी की कतारों में लगभग 1 से 1.5 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए। जब पौधे पांच से सात से बड़े हो जाएं तो इन्हे पॉलिथीन की थैलियों में बदल देना चाहिए। जब पौधे 15 से 20 सेमी के हो जाए तो खेत में निश्चित स्थान पर लगा देना चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्र की पौध तैयार करने के लिए लगभग 100 ग्राम बीज पर्याप्त होते हैं।

पॉलीथिन की थैली में पौधे तैयार करना

20 सेमी. चौडे मुंह वाली, 25 सेमी. लम्‍बी तथा 150 सेमी. छेद वाले पालीथिन थैलियां लेवें इन थैलियों में गोबर की खाद, मिट्टी एवं रेत का समिश्रण करना चाहिए, थैली का उपरी 1 सेमी. भाग नही भरना चाहिए, प्रति थैली 2 से 3 बीज होना चाहिए, मिट्टी में हमेशा र्प्‍याप्‍त नमी रखना चाहिए, जब पौधे 15 से 20 सेमी. उंचे हो जावें तब थैलियों के नीचे से धारदार ब्‍लेड द्वारा सावधानी पूर्वक काट कर पहले तैयार किये गये गढ्ढों में लगाना चाहिए।

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पपीता लगाने का समय

पौधे पहले से तैयार किये गढ्ढे में जून, जुलाई में लगाना चाहिए, जंहा सिंचाई का समूचित प्रबंध हो वंहा सितम्‍बर से अक्‍टूबर तथा फरवरी से मार्च तक पपीते के पौधे लगाये जा सकते है।

पौधे लगाने की विधि

खेत में 2×2 मीटर की दूरी पर 45x45x45 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदे। प्रत्येक गड्ढे में 200 ग्राम सुपर फास्फेट, 10 कीग्रा गोबर की सड़ी खाद व 50 ग्राम मिथाइल पैराथियान चूर्ण मिलाकर भर देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

पपीते के पौधों में 10 से 15 किलो गोबर की खाद, 100 ग्राम यूरिया, 400 ग्राम सुपर फास्फेट व 150 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति पौधे के हिसाब से देना चाहिए। यूरिया की 25 ग्राम मात्रा पौध लगाने के 2 माह बाद, 25 ग्राम पौध लगाने के 4 माह बाद तथा 50 ग्राम फूल आने से पूर्व देवे। सुपर फास्फेट की 200 ग्राम मात्रा गड्डा भरते समय तथा 200 ग्राम मात्रा पौधरोपण के 5 से 6 माह बाद देवें। पोटाश को गड्डा भरते समय देवें। देसी खाद की मात्रा जून-जुलाई/ फरवरी-मार्च में देनी चाहिए।

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सिंचाई एवं देखभाल

पपीते की जड़ें भूमि में गहरी नहीं जाती हैं अतः थोड़े थोड़े समय के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए लेकिन इस बात का विशेष ध्यान देते रहे की पेड़ के तने के पास पानी भरा नहीं रहे वरना जड़ और तने के सड़ने की संभावना रहती हैं। गर्मियों में गलभग 7 दिन तथा ठण्‍ड में 10 से 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना चाहिए। खेत में जलनिकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए तथा तने के चारो और थोड़ी मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए ताकि तने के सीधे सम्पर्क में नहीं आये। बून्द-बून्द सिंचाई पद्धति अपनाने से फल उपज व गुणवत्ता में सुधार होता हैं। पाले की चेतावनी पर तुरंत सिंचाई करें, इससे बचाने के लिए खेत के उत्‍तरी पश्चिम में हवा रोधक वृक्ष लगाना चाहिए। तीसरी सिंचाई के बाद निंदाई गुडाई करें। जडों तथा तने को नुकसान न हो।

नर पौधों को अलग करना :-

पपीते के पौधे 90 से 100 दिन के अन्‍दर फूलने लगते है तथा नर फूल छोटे-छोटे गुच्‍छों में लम्‍बे डंढल युक्‍त होते है। नर पौधों पर पुष्‍प 1 से 1.3 मी. के लम्‍बे तने पर झूलते हुए तथा छोटे होते है। प्रति 100 मादा पौधों के लिए 5 से 10 नर पौधे छोड कर शेष नर पौधों को उखाड देना चाहिए। मादा पुष्‍प पीले रंग के 2.5 से.मी. लम्‍बे तथा तने के नजदीक होते है।

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पौध संरक्षण कीट प्रबंधन

हरा तेला एवं सफेद मक्खी

पपीते के पौधों पर मुख्यतः हरा तेला  एवं सफेद मक्खी का आक्रमण होता है। यह कीट पत्तियों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाता है। नियंत्रण हेतु मिथाइल डेमेटोन  25 ईसी एक मिलीलीटर प्रति लीटर या डाइमिथोएट 30 ईसी एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

लाल मकड़ी

यह फलों एवं पत्तियों पर आक्रमण करती है। नहीं तो पीली पड़ जाती है। रोकथाम हेतु ओमाईट या इथियोन 2 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

मूल ग्रंथि सूत्रकृमि)

इसके आक्रमण से जड़ों पर गांठे पड़ जाती है तथा पौधा कमजोर और पीला पड़ जाता है और फल भी छोटे व कम लगते हैं। नियंत्रण हेतु पौध तैयार करते समय कार्बोफ्यूरान 3 जी 8 से 10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से देवें तथा पौधे लगाते समय 3 ग्राम कार्बोफ्यूरान 3 जी प्रति पौधे की हिसाब से प्रयोग करें।

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व्याधि प्रबंध

तना या पद विगलन रोग (स्टेम या फुट रॉट)

इस रोग के प्रभाव से भूमि की सतह से तनो में सडन आरंभ होती है जो धीरे- धीरे बढ़कर पुरे तने को घेर लेती है। रोगग्रस्त भाग गहरा भूरा व काला हो जाता है। रोगी पेड़ों के पत्ते व फल पिले पढ़कर गिरने लगते हैं। रोग के प्रभाव से पेड़ों की छाल फट जाती है वह शहद के छत्तेनुमा दिखाई देते हैं। ऐसे पेड़ गिर जाते हैं। तना सड़न उत्पन्न करने वाले कारक से ही नर्सरी में पत्तियों की पौध में आर्द्रगलन रोग होता है।

नियंत्रण

  1. बाग में पानी का निकास अच्छा होना चाहिए। पेड़ लगाते समय व उसके बाद में भी तने पर किसी प्रकार की चोट नहीं लगनी चाहिए।
  2. रोग दिखते ही रोगग्रस्त भाग को पूरी तरह से हटाकर कॉपर ऑक्सिक्लोराइड 0.3% का लेप या छिड़काव कर देवें। बोर्डो मिश्रण (5:5:50) तने के चारों ओर भूमि में डालने व तने पर छिड़काव करने से रोग का प्रसार घट जाता है। वर्षा ऋतु में इन क्रियाओं को कम से कम 3 बार प्रयोग में लाना चाहिए।
  3. पौधों पर रोग का प्रभाव अधिक हो जाने की अवस्था में पेड़ को जड़ सहित निकाल कर नष्ट कर देना आवश्यक हैं। उसी गड्ढे में फिर से दूसरा पेड़ कुछ समय तक नहीं लगाना चाहिए।
  4. नर्सरी में पौधे को रोग से बचाने के लिए मिट्टी को 3 ग्राम ताम्रयुक्त कवकनाशी प्रति लीटर पानी के घोल से तर कर दे और बीजों को थाइरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज उपचारित कर बोये।

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पर्ण कुंचन व मोजेक (लीफ कर्ल व मोजेक)

यह विषाणु जनित रोग हैं। पर्णकुंचन रोग से पत्तियां आकार में छोटी, कुंचित, विकृत व सिकुड़न लिए मोटी शिराओं वाली हो जाती है। वे स्पष्ट रूप से उल्टे प्याले के रूप में नीचे की तरफ एवं भीतर की ओर मुड़ जाती है। पर्णवृन्त टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। इन पौधों पर फल और फूल नहीं लगते हैं। पौधों की वृद्धि रुक जाती है और पत्तियां गिर जाती है।

मोजेक रोग से नई पत्तियों पर चितकबरापन व सिकुड़न सबसे पहले दिखाई पड़ता है। ऐसी पत्तियां आकार में छोटी, विकृत और लता तंतु जैसी हो जाती है। डंठल छोटे रह जाते हैं। और पौधों की वृद्धि रुक जाती हैं। पौधे के सिर पर नई पत्तियों के मुट्ठीनुमा गुच्छे के अतिरिक्त पुरानी पत्तियां गिर जाती है। फल छोटे विकृत व मोजेक जैसे धब्बे वाले होते हैं।

नियंत्रण

पर्णकुंचन रोगग्रस्त पेड़ कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकते हैं और मोजेक संक्रमित पौधे भी आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं होते हैं। तथा साथ ही उनमे रोग प्रति वर्ष बढ़ता जाता है। अतः रोगी पेड़ों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए जिससे रोग का फैलाव रुक सके।

पपीता की कोई भी किस्म रोगरोधी नहीं होती है। रोग का फैलाव कीटों से होता हैं। अतः कीटनाशी डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. एक मिलीलीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी के हिसाब से घोलकर 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें। इन दवाओं का प्रयोग फल लगने से पहले ही करना चाहिए। फल लगने के बाद मेलाथियान 50 ई.सी. 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़कना चाहिए। पपीते के बाग के आसपास कद्दू, लौकी, ककड़ी, बैंगन, मिर्च, टमाटर और आलू नहीं उगाए।

पपीता की तुड़ाई एवं उपज

जब पपीता फल हल्का या पीलापन लेने लगे और उसमें सफेद दूध आना बंद हो जाए तो समझना चाहिए कि फल पक गया है अतः तुड़ाई कर लेनी चाहिए। फलों को पक्षियों से बचाने के लिए इनके चारों पुराना टाट बांधा जा सकता है। पपीते से प्रति पौधा 40 से 50 किलोग्राम उपज प्राप्त होती है। प्रति पौधा औसतन 200 ग्राम पेपेन प्राप्त किया जा सकता है।

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