पशुपालन

बन्नी भैंस की शारीरिक विशेषताएं एवं पहचान

बन्नी भैंस की शारीरिक विशेषताएं एवं पहचान
Written by Vijay Dhangar

भारतीय अर्थव्यवस्था में भैंस पालन की मुख्य भूमिका है। इसका प्रयोग दुग्ध उत्पादन एंव खेती के कार्यों में होता है। और डेरी व्यवसाय के लिहाज से भी भैंस पालन उत्तम माना जाता है। भारत में भैंसों की कई नस्लें पाई जाती है जिनमे से बन्नी भैंस भारत की प्रमुख भैंस नस्लों में से एक है। इसका उत्पत्ति स्थान गुजरात के कच्छ जिले का बन्नी (banni) क्षेत्र है।

बन्नी भैंस की शारीरिक पहचान

ये भैंसे काले रंग में पायी जाती है। कहीं कहीं इन पशुओं को भूरे या फिर ताम्बे के रंग में भी देखा जा सकता है। इनकी त्वचा पतली और मुलायम होती है। लम्बा माथा, कसकर मुड़े हुए सींग, गले के नीचे का लटकता हुआ झालरदार गलकम्बल इस नस्ल की प्रमुख शारीरिक विशेषता है। मध्यम से लेकर बड़े आकार के ये पशु अत्यधिक बालों से घिरे रहते हैं। इस भैंस की आँखें काली और चमकदार होती हैं।

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विशेषताएं

ये नस्ल कुच्छ के स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं और सुखा, कम पानी, उच्च तापमान और कम नमी वाले क्षेत्रों में भी रह सकते हैं। पानी की कमी की स्थिति में जीवित रहने, सूखे के स्थिति में लम्बी दूरी तय करने, उच्च दूध उत्पादकता और रोग प्रतिरोध की अच्छी क्षमता इस भैंस के ख़ास गुण है।

खासियत

स्थानीय स्तर पर ज्यादातर आदिवासी चरवाहे द्वारा बन्नी भैंस का पालन किया जाता है। बन्नी भैंस को बांध कर चारा देने की जरूरत नहीं होती। इसे रातभर स्थानीय चरागाह पर चरने के लिए छोड़ा जाता है और सुबह गांवों में दूध निकालने के लिए लाया जाता है। भैंस पालन की इस पारंपरिक प्रणाली को दिन के गर्मी तनाव और उच्च तापमान से बचने के लिए अपनाया जाता है।

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वजन

एक व्यसक भैंस का वजन 525-625 किलो होता है।

दूध उत्पादन

इसका ब्यात अंतराल लगभग 12 महीने होता है। बन्नी भैंसों के थन अच्छी तरह विकसित होते हैं। यह एक अच्छी दूध उत्पादक नस्ल भी है जो प्रतिदिन 9 -10 लीटर दूध देती है। इसके दूध में वसा 6%  तक  होता है।

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