जैविक खेती (Organic farming)

खेती में बायोपेस्टिसाइड का उपयोग एवं महत्व

बायोपेस्टिसाइड
Written by Bheru Lal Gaderi

बायोपेस्टिसाइड आज की आवश्यकता

नमस्ते किसान भाइयों इस लेख में फसलों में लगने वाली विभिन्न बीमारियों एवं रोगों का उपचार एवं नियंत्रण बायोपेस्टिसाइड (Bio pesticide) कैसे किया जा सकता है, उनके उपयोग एवं महत्व के बारे में जानकारी दी गई है।

बायोपेस्टिसाइड

समन्वित कीट नियंत्रण के महत्वपूर्ण करने योग्य कार्य:-

  • फसल कटाई के बाद व गर्मियों में गहरी जुताई करें।
  • अनुकूल फसल चक्र अपनाए।
  • जैविक संगठनों (बायोएजेंट्स) से बीजोपचार करें।
  • रोग एवं कीट प्रतिरोधी किस्म का चुनाव करें।
  • यांत्रिक विधि द्वारा लटो एवं कीटों को पकड़ कर नष्ट करें।
  • पौधों के रोग एवं कीट ग्रसित भाग को नष्ट करें।
  • फसल को खरपतवारों से मुक्त रखें।
  • फसल-के अवशेषों को नष्ट करें।
  • फसल में विभागीय सिफारिश अनुसार प्रकाशपाश, फेरमें ट्रेप लगाएं। ट्रेप में फंसे वयस्क तितलियों को प्रतिदिन नष्ट करें।
  • फसलों में मित्र कीट एवं परजीवी कीटों को छोड़े।
  • कीटों की संख्या अधिक से अधिक होने पर कीटनाशकों का प्रयोग करें।
  • नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग करें।
  • आवश्यकता पर आधारित, न्याय संगत तथा सुरक्षित कीटनाशकों का छिड़काव करें।
  • किसी भी कीट के नियंत्रण हेतु एक से अधिक कीटनाशकों का छिड़काव करें अर्थात प्रत्येक छिड़काव में अलग-अलग कीटनाशक प्रयोग में ले।
  • ले किसी भी कीटनाशक का उपयोग दोबारा ना करें। ऐसे किसी ही कीटनाशक का छिड़काव न करे जो फसल की वानस्पतिक वृद्धि करता हैं।
  • जहां तक संभव हो सिंथेटिक पायरेथ्राइड्स का छिड़काव/भुरकाव हेतु सही उपकरण ही काम में लेवे।

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बायोपेस्टिसाइड का उपयोग, इसके लाभ का विवरण निम्नानुसार हैं।

ट्राइकोडर्मा:-

ट्राइकोडर्मा एक मित्र फफूंद हैं जो फसलों में जड़गलन, उखटा, तनागलन एवं कॉलर रॉट आदि रोग पैदा करने वाले परजीवी फफूंद की वृद्धि रोककर उन्हें धीरे-धीरे नष्ट करता हैं। इससे फसलों के बीजों को उपचारित करने पर उक्त बीमारियों से फसल को बचाया जा सकता है।

ट्राइकोडर्मा

यह प्रदूषण रहित तथा पशु एवं मनुष्य के लिए सुरक्षित जैविक फफूंदनाशक यह कम खर्चीला तथा लाभकारी हैं। जहां पर रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा रासायनिक नियंत्रण अप्रभावी हो जावे, ऐसे में ट्राइकोडर्मा द्वारा जैविक उपचार करना संभव होता हैं।

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ब्रोमोडायलिन:-

चूहे खेतों में खड़ी फसल को काटकर व पकी फसल के दानों को काटकर नुकसान करते हैं। चूहों की रोकथाम ब्रोमोडायलिन (0.005%) डेढ़ किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग कर फसलों को चूहों से बचाया जा सकता है।

लाइट ट्रैप बायोपेस्टिसाइड:-

प्रौढ़ भृंग एवं एवं मोथ प्रकाश की ओर आकर्षित होकर लाइट ट्रेप के नीचे बंधे बैग में एकत्रित हो जाते हैं, जिन्हें नष्ट कर दिया जाता है। लाइट ट्रेप के नीचे चौड़े पात्र में केरोसिन युक्त पानी भरकर रखें, जिससे प्रकाशपाश की ओर आकर्षित होकर गिरने वाले भृंग एवं मोथ मर जाते हैं।

लाइट ट्रैप

यह एक सरल एवं सुगम विधि है, जिसमें पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए नु कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है। यह ध्यान रखें कि हानिकारक कीटों के साथ मित्र आकर्षित होकर नष्ट होने लगे तो प्रकाशपाश बंद कर देना चाहिए। इस विधि से भृंगों एवं मोथ को नष्ट करने के साथ-साथ सघनता का आकलन कर अन्य नियंत्रण उपाय अपनाए जा सकते हैं।

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फेरोमोन ट्रेप एवं ल्योर बायोपेस्टिसाइड:-

मादा कीट के जननांग से निकलने वाली गंध के समान बनाई गई कृतिम गंध रसायनों को फेरोमोन कहते हैं। नर कीड़ों को आकर्षित करने के लिए इन फेरोमोन रसायनों को रबड़ के टुकड़ों में लगाया जाता है यह सुंडी के नर वयस्कों को आकर्षित करने के काम आते हैं। ट्रेप के नीचे बनी थैली में एकत्रित हुए नर वयस्कों को प्रतिदिन नष्ट कर जमीन में गाड़ दिया जाता है।

बायोपेस्टिसाइड

यह विधि पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए लगाए गये ल्योर से संबंधित नर वयस्कों को आकर्षित करता है इस विधि से न केवल हानिकारक कीटों को समाप्त किया जा सकता है वरन प्रतिदिन उनकी उपस्थिति का आंकलन कर सघनता की जांच से किट के प्रकोप का ई.टी.एल. स्तर जांचा जा सकता है।

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एन.पी.वी. (न्यूक्लियर पॉली हाइड्रोसिस वायरस) बायोपेस्टिसाइड:-

एक प्रकार का विषाणु है जो कि जाति विशेष के हानिकारक कीटों का सफलतापूर्वक नियंत्रण करता है। यह पूर्णतया सुरक्षित जैविक कारक है। जिसका वातावरण पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है एवं अन्य परजीवी परभक्षी, पक्षी एवं मानव जाति पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता है। यह विषाणु मुख्यतया प्रोटीन के बने होते हैं जिनमें डी.एन.ए. की संरचना होती है।

बायोपेस्टिसाइड

जबकि हानिकारक कीट की लट विषाणु को खाती है तो यह इसकी आहार नली में चला जाता है जहां उदर के मध्य भाग में क्षारीय माध्यम में इसका प्रोटीन का आवरण नष्ट हो जाता है एवं वायरस की संरचनाएं मुक्त हो जाती है जो विभिन्न अंगों की कोशिकाओं में पहुंचकर बहुत तेजी से गुणन करती है। शुरू में लट खाना कम कर देती है एवं 4 से 8 दिन में मर जाती है।

मरी हुई लटे प्रायः लटकी हुई पाई जाती है। इन लटों का रंग हल्का पीला होता है। एवं फूली होती है जिनमें से जरा सा हिलाने पर द्रव बाहर निकलता है। इस प्रकार एन.पी.वी. लटों को नष्ट करता है। एन.पी.वी. का छिड़काव सायंकाल के समय करना चाहिए। क्योंकि दिन में सूर्य के प्रकाश में पराबैंगनी किरणों के द्वारा इसका तेजी से विखंडन होता है।

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अजाडीरेक्टिन:-

अजाडीरेक्टिन

कीट नियंत्रण के लिए नीम से बने कीटनाशक का प्रयोग करके पर्यावरण को प्रदूषण से बचाया जा सकता है। नीम के तेल में पाए जाने वाले अजाडीरेक्टिन तत्व का विभिन्न सांद्रता में फसलों पर प्रयोग अन्य सिन्थ्रेटिक पौध- संरक्षण रसायनों के विकल्प के रूप में प्रयोग कर फसलों में लगने वाले कीटों से बचा जा सकता है। यह विष रहित होने के साथ-साथ सभी हानिकारक कीटों के प्रति नियंत्रक है।

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ट्राइकोग्रामा:-

ट्राइकोग्रामा परजीवी एक छोटा सा कीट है जो मक्का फसल में तना छेदक आदि के कीटों के अण्डों में अपने अंडे देकर अपना जीवन चक्र पूरा करता है। आकार में यह इतना छोटा होता है कि एक आलपिन के सिरे पर 8 से 10 वयस्क ट्राइकोग्रामा एक साथ बैठ सकते हैं।

ट्राइकोग्रामा

इस कीट का जीवन चक्र अंडे की अवस्था से प्यूपा की अवस्था तक अपने परपोषी जीव के अंडे में पूरा होता है एवं वयस्क अवस्था में बाहर निकल कर अपना जीवन चक्र प्रारंभ करने हेतु अंडों की तलाश शुरू कर देता है इसलिए इसे अण्ड परजीवी कहते हैं।

गर्मी के मौसम में इसका जीवन चक्र 8 से 10 दिन में और सर्दी में 9 से 12 दिन में पूर्ण होता है। खेत में ट्राईकोकार्ड्स इसकी वयस्क से निकलने की तिथि से 1 दिन पूर्व ही लगाने चाहिए वरना परभक्षियों द्वारा इन का भक्षण करने की संभावना रहती है।

लगाने से पूर्व ट्राईकोकार्ड्स की स्ट्रिप को अलग कर देना चाहिए। ट्राइकोग्रामा 1 अण्ड परजीवी होने के कारण हानिकारक परपोषी जीव के अंडों में अपना जीवन चक्र पूरा करता है। अतः पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए हानिकारक कीटों के अंडों को नष्ट कर देता है।

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बी.टी. (बेसिलस थुरेन्जेन्सिस):-

बेसिलस थुरेन्जेन्सिस का प्रयोग लेपिडोप्टेरा कीटों (लटों) के नियंत्रण के लिए किया जाता है। यह एन.पी.वी. कि भांति पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए हानिकारक लटों को नष्ट करता है।

प्रस्तुति:-

रतन लाल शर्मा, दिनेश स्वामी, सुरेश कुमार डोटासरा, पवन कुमार चौधरी, रौनक शर्मा

श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर 303329

 

About the author

Bheru Lal Gaderi

नमस्ते किसान भाइयों मेरा नाम भेरू लाल गाडरी है। इस वेबसाईट को बनाने का हमारा मुख्य उद्देश्य किसान भाइयों को खेती-किसानी, पशुपालन, विभिन्न कृषि योजनाओं आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना है।