फलों की खेती बागवानी

बेर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

बेर
Written by Vijay Dhangar

बेर (Ber) के फलों का प्रयोग ताजे फलों के रूप में, सुखाकर छुआरों के रूप में शरबत, जेल, मुरब्बा, कैंडी, चटनी एवं अचार बनाकर किया जाता है। इसके अतिरिक्त बेर के पौधे का लाख के कीड़ों को पालने में और इसके पत्तों का प्रयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है। इसकी लकड़ी जलाने के उपयोग में भी ली जाती है।

बेर

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जलवायु:-

यह विभिन्न प्रकार की जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है। मुसला जड़ होने के कारण अन्य फलों की तुलना में इसको बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है। फल देने के बाद इसके पौधे में गर्मियों में सुषुप्तावस्था में चले जाते हैं और पत्ते झड़ जाते हैं। इसलिए पौधे प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता रखते हैं।

 भूमि:-

इसकी खेती क्षारीय तथा लवणीय भूमि में भी कर सकते हैं किंतु बलुई दोमट भूमि जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है।

उन्नत किस्में:-

फसल

उन्नत किस्मेंफल पकने का समय

अगेती

गोला, थार सेविका व थार भुवराजजनवरी का प्रथम सप्ताह
मध्यमसेब, मुण्डिया, कैथली

जनवरी का अंतिम सप्ताह

पछेतीउमरान

फरवरी अंतिम सप्ताह से मार्च प्रथम सप्ताह

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अन्य किस्म- गोमाकीर्ति:-

केंद्रीय शुष्क फल अनुसंधान संस्थान के तत्वाधान में वेजलपुर (गोधरा) से विकसित नवीन किस्म है। वही इस केंद्र से थार, सेविका व थार भुवराज किस्में विकसित की गई है।

प्रवर्धन:-

बेर का प्रवर्तन कलिकायन द्वारा किया जाता है। जिसके लिए मूल वृंत बीज द्वारा नर्सरी में तैयार किए जाते हैं। 25×15 सेंटीमीटर की पॉलिथीन की थैलियों (300 गेज) में 1:1:1 के अनुपात में चिकनी मिट्टी, बलुई मिट्टी और गोबर की खाद का मिश्रण भर देते हैं। इसके बाद देशी बेर से निकाले गए बीजों की बुवाई इन तैयार थैलियों में मार्च के प्रथम सप्ताह या द्वितीय सप्ताह में कर देते हैं।

पौधे लगाने की विधि:-

मई जून माह में 1x1x1 मीटर आकार के गड्ढे 6 से 8 मीटर की दूरी पर खोद लेते हैं फिर इन गड्ढों को खुला छोड़ देते हैं बाद में निम्नलिखित खाद व उर्वरक प्रति गड्डा देते हैं।

खाद उर्वरक एवं दवा को खोदी हुई मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिला देते हैं और फिर इस मिट्टी को गड्ढे में भर देते हैं। कलिकायित पौधों को थालों के बीच लगाने के बाद सिंचाई कर देते हैं। इसकी रोपाई का उपयुक्त समय वर्षा ऋतु है।

अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद

20-25 kg

सुपर फास्फेट

1 kg

क्यूनॉलफॉस 1.5% या मिथाइल पैराथियान 2% चूर्ण

100 Graam

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बेर में खाद एवं उर्वरक:-

खाद एवं उर्वरक निम्न दर्शायी गयी तालिका के अनुसार डालें:-

पेड़ों की

आयु वर्ष

में

उर्वरक की मात्रा किलोग्राम प्रति पेड़

गोबर की खादयूरियासुपर फास्फेट

  म्यूरेट आफ

 पोटाश

1.

100.220.35

0.08

2.

200.440.70

0.16

3.

201.101.40

0.20

4.

251.201.75

0.25

5 वर्ष और उसके बाद

301.201.75

0.25

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बुवाई से पूर्व बीजों को कैप्टॉन 2 ग्राम प्रति किलो की दर से बीजोपचार कर बोना चाहिए। 7 से 10 दिन में बीजों का अंकुरण हो जाता है और लगभग 3 से 4 महीने में देशी पौधे कलिकायन (बडिंग) के योग्य हो जाते हैं।

फूल आने से पूर्व जून से अगस्त में उन्नत के पौधों से अच्छी कलिकाओं को चुनकर तैयार किए गए मूलवृंतों पर कलिकाएं (टी बडिंग) अथवा आई बडिंग की विधि द्वारा लगा देते हैं। इस प्रकार 30 से 40 दिन बाद पौधा खेत में स्थानांतरण के योग्य हो जाता है। देसी बोरड़ी (जिजिफस रोटेन्डीफोलिया) मूलवृन्त अति उपयोगी पाया गया है।

यूरिया की आधी मात्रा और सुपर फास्फेट एवं म्यूरेट आफ पोटाश की पूरी मात्रा जुलाई एवं बाकी बची हुई यूरिया की आधी मात्रा नवंबर माह में देनी चाहिए। खाद व उर्वरक देने के तुरंत बाद सिंचाई कर देनी चाहिए।

बेर में सिंचाई एवं अन्तरसस्य:-

बेर के पौधों में कम पानी की आवश्यकता होती है। साधारण तौर पर फूल आने से पूर्व फल बनने की अवस्था पर 15 से 20 दिन अंतराल पर दो-तीन बार सिंचाई करना लाभप्रद होता है। मार्च-अप्रैल में पौधों को पानी देना फल परिपक्वता में देरी करता है। आरंभ के 3 वर्षों तक बाग में सब्जियां जैसे ग्वार, चोला, मिर्च, बैंगन आदि ली जा सकती है।

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कटाई- छटाई:-

प्रारंभिक 2 या 3 साल तक पौधे को सशक्त रूप और उचित आकार देने के लिए पौधे के मुख्य तने पर पांच से छह प्राथमिक शाखाएं हर दिशा में रहने देते हैं। पहली शाखा को जमीन की सतह से 30 से.मी. ऊपर रखते हैं। इसके बाद प्रत्येक शाखा के बीच में करीब 15 से 30 सेमी की दूरी रखते हैं। बेर में प्रति वर्ष कतई-छटाई करना चाहिए क्योंकि इसकी पत्तियों के कक्ष से जो नए प्ररोह निकलते हैं उन्हीं पर फूल एवं फल लगते हैं। गर्मी प्रारंभ होने पर पौधे सुषुप्तावस्था में प्रवेश कर जाते हैं तब इनकी कटाई- छटाई 15 अप्रैल से करनी चाहिए। जिससे ज्यादा नए प्ररोह निकले और उन पर अधिक फल लगे। कटाई- छटाई करते समय अनचाही रोगग्रस्त सुखी टहनियों और आपस में रगड़ खाती हुई टहनियों को हटा देना चाहिए।

बेर में पौध संरक्षण:-

कीट प्रबंधन:-

फल मक्खी:-

यह बेर का सबसे बड़ा हानिकारक कीट है। जब फल छोटे व हरे रहते हैं तब इस कीट का आक्रमण शुरू होता है शुरू में फल में एक लट (मेगट) पाई जाती है। छोटे फल इसके प्रभाव में काणे हो जाते हैं लेकिन बड़े फलों के आकार में कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है। इसके आक्रमण से बीज के चारों ओर एक खाली स्थान हो जाता है तथा लटें अंदर से पूरा फल खाने के बाद बाहर आ जाती है।

इसके बाद यह मिट्टी में प्यूपा के रूप में छिपा रहता है। कुछ दिन बाद इससे मक्खियां बनकर तैयार हो जाती हैं तथा इनका आक्रमण फलों पर पुनः शुरू हो जाता है।

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नियंत्रण:-

बैग के आसपास के क्षेत्र से बेर की जंगली झाड़ियों को हटा देवें। प्रभावित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर देवें। मई- जून में बाग़ की मिट्टी को पलटते रहें। बेर के पौधे में फूल आते समय तथा जिस समय अधिकांश फल मटर के आकार के बनने लगे उस समय क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) 1.0 मिलीमीटर या डाइमिथोएट (30 ई.सी.) 1 मिलीमीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 10 से 15 दिन के बाद करें। इसके 15- 20 दिन बाद तीसरा छिड़काव करें।

चैफर बीटल:-

यह एक हानिकारक कीट है। इसका प्रकोप जून-जुलाई में अधिक होता है। यह पेड़ों की नई पत्तियों एवं प्ररोहों को खाता है। वर्षा शुरू होते ही इसका आक्रमण शुरू हो जाता है।

नियंत्रण:-

इसके नियंत्रण हेतु जून माह में पहली वर्षा के तुरंत बाद मोनोक्रोटोफॉस (36 एस.एल.) 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से पेड़ों पर ठीक तरह से छिड़काव करें।

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छाल भक्षक:-

यह कीट पेड़ की छाल को खाता है तथा छिपने के लिए अंदर डाली में गहराई तक सुरंग बना लेता है। जिससे कभी-कभी डाल/शाखा कमजोर हो जाती है।

नियंत्रण:-

नियंत्रण हेतु सुखी शाखाओं को काट कर जला देवे। क्यूनोलोफोस (२५ ई.सी.) 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर शाखाओं तथा डालियों पर छिड़के साथ ही सुरंग को साफ करके पिचकारी की सहायता से केरोसिन 3 से 5 मिलीलीटर रुई का फाहा बनाकर रख दे और बाहर से गिली मिट्टी से बंद करें।

बेर के फलों की तुड़ाई एवं उपज:-

प्रायः शीघ्र पकने वाली किस्में जनवरी से तुड़ाई तैयार हो जाती हैं। फल तोड़ने के समय ध्यान रखना चाहिए कि फल पूर्ण रूप से विकसित एवं पके हुए फलों को सावधानी से तोड़कर एवं फलों की छंटाई करके नायलोन के धागे से बनी 1 किलो की थैली में विधिवत बंद करके बाजार में भेजना चाहिए।

वर्षा पर आधारित बाग से 5 वर्ष के पौधे से लगभग 40 किलोग्राम फल प्राप्त किया जा सकता है। जबकि सिंचित बाग से 120 किलोग्राम फल प्रति वृक्ष मिल जाता है।

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