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मेहंदी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मेहंदी की उन्नत खेती
Written by Vijay Dhangar

मेहंदी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मेंहदी (लसोनिया इनरमिस) एक बहुवर्षीय झाड़ीदार फसल हैं, जिसे व्यवसायिक रूप से पती उत्पादन के लिए उगाया जाता है। मेहंदी प्राकृतिक रंग का एक प्रमुख स्रोतों हैं। शुभ अवसरो पर मेंहदी की पत्तियों को पीसकर सौंदर्य के लिए हाथ व पैरों पर लगाते हैं। सफेद बालों को रंगने के लिए भी मेंहदी (Mehndi Cultivation) की पतियों का प्रयोग किया जाता है। मेंहदी की पतियों को पीसकर सिर पर लगाने से रूसी दूर जाती हैं। मेंहदी के बीज, पतियों का पाउडर तथा पौधे की छाल दवाई के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

मेहंदी की उन्नत खेती

इसका उपयोग किसी भी द्रदृष्टीकोण से शरीर के लिए हानिकारक नहीं होता है। मेंहदी की हेज घर, कार्यालय व उद्यानों में सुंदरता के लिए लगाते हैं। मेंहदी शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में बहुवर्षीय फसल के रूप में टिकाऊ खेती के सबसे अच्छे विकल्पों में से एक हैं। मंहदी की खेती पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक हें।

उत्पादक क्षेत्र:-

मेहंदी पूरे भारतवर्ष में पायी जाती है। देश के कुल मेंहदी क्षेत्र व उत्पादन में राजस्थान का हिस्सा 90% है। भारत के अलावा ईरान, यमन, नाइजीरिया व सूडान आदि देशों में भी मेंहदी की खेती की जाती है। राजस्थान के पाली जिले का सोजत व मारवाड़ जंक्शन क्षेत्र वर्षों से मेहंदी के व्यवसायिक उत्पादन का मुख्य केंद्र है। यहां करीब 40 हजार हैक्टेयर भूमि पर मेंहदी की फसल उगाई जाती है।

सोजत में मेहंदी की मंडी व पत्तियों का पाउडर बनाने तथा पेकिंग करने के कई कारखाने हैं। सोजत की मेहंदी अपनी रचाई क्षमता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। सोजत से विदेशों में बड़े स्तर पर मेंहदी निर्यात की जाती है। मेंहदी के उत्पादनो के निर्यात से देश को वर्ष 2014 -15 में 464 करोड रुपए से ज्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है।

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मेंहदी की प्रजातियां:-

मेंहदी की अभी तक कोई उन्नत किस्में विकसित नहीं हुई है। अतः स्थानीय फसल से ही स्वस्थ, चौड़ी व घनी पत्तियों वाले एक जैसे पौधों के बीच से ही पौध तैयार कर फसल की रोपाई करें।

खेत की तैयारी:-

वर्षा ऋतु से पहले खेत की मेड बंदी करें तथा अवांछनीय पौधे को उखाड़ कर लेजर लेवलर की सहायता से खेत को समतल करें। इसके बाद डिस्कवर कल्टीवेटर से जुताई कर भूमि को भुरभुरा बना लेवे।

मेंहदी में खाद व उर्वरक:-

खेत की अंतिम जूताई के समय 10 -15 टन सड़ी देशी खाद व 250 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलावे तथा 60 किलो नत्रजन 40 किलो फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में प्रतिवर्ष प्रयोग करें। फास्फोरस की पूरी मात्रा व नत्रजन की आधी मात्रा पहली बरसात के बाद निराई गुड़ाई के समय भूमि में मिलावे व शेष नत्रजन की मात्रा उसके 25-30 दिन बाद वर्षा होने पर देवे।

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प्रवर्धन:-

मेंहदी को सीधा बीज द्वारा या पौधशाला में पौध तैयार कर रोपण विधि से या कलम द्वारा लगाया जा सकता है। हेज लगाने के लिए प्रवर्धन की तीनों विधियां काम में ली जाती है। लेकिन व्यवसायिक खेती के लिए पौध रोपण विधि ही सर्वोत्तम है।

मेंहदी की पौध तैयार करना:-

एक हेक्टेयर भूमि पर पौधरोपण के लिए करीब 7 किलो बीज द्वारा तैयार पौध  पर्याप्त होती है। इस हेतु 1.5 x 10 मीटर आकार की 8 से 10 क्यारियाँ अच्छी तरह तैयार कर मार्च माह में बीज की बुवाई करें। मेंहदी का बीज बहुत कठोर व चिकना होता है तथा सीधा बोने पर अंकुरण कम मिलता है। अतः अच्छा अंकुरण पाने के लिए से करीब 1 सप्ताह पहले बीच को टाट या कपड़े के बोरे में भरकर पानी के टैंक  में भिगोवे व टैंक का पानी प्रतिदिन बदलते रहे। इसके बाद भी बीज को कार्बेन्डाजिम  2.5 ग्राम प्रति किलो की दर से उपचारित कर छिड़काव विधि से बुवाई करें।

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मेंहदी की पौधरोपण:-

जुलाई माह में अच्छी वर्षा होने पर पौधशाला से पौधे उखाड़कर सिकेटियर द्वारा थोड़ी-थोड़ी जड़ शाखाएं काट दे। खेत में नुकीली खुटी या हलवानी की सहायता से 30 x 50 सेंटीमीटर से 50 x 50 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियों में छेद बनावे तथा प्रति छेद 1-2 पौधे रोपकर जड़े मिट्टी से अच्छी तरह से दबा दें।

पौध लगाने के बाद अगर वर्षा न हो तो सिंचाई कर देनी चाहिए। मेहंदी में 30 x 50 सेंटीमीटर की दूरी को ट्रैक्टर चलित यंत्रों द्वारा समय पर निराई गुड़ाई कर प्रभावी रूप से खरपतवार नियंत्रण व क्षेत्र नमीे संरक्षण के साथ-साथ पतझड़ की समस्या में कमी व उत्पादन में सुधार के उद्देश्य से उपयुक्त पाया गया है।

अन्तः फसलीय पद्धति:-

मेंहदी की 2 पंक्तियों के बीच खरीफ व रबी ऋतु में दलहन तथा अन्य कम ऊंचाई वाली फसलें उगाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। अंतः फसल के उत्पादन एवं आमदनी की दृष्टि से खरीफ में मूंग व रबी में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर इसबगोल असालिया सबसे उपयुक्त फसले पायी गई हैं।

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मेंहदी की निराई गुड़ाई:-

इसके अच्छे फसल प्रबंधन में निराई- गुड़ाई का महत्वपूर्ण स्थान है। जून-जुलाई में प्रथम वर्ष के बाद बेलों के हल व कुदाली से निराई गुड़ाई कर खेत को खरपतवार रहित बना लेवे। गुड़ाई अच्छी गहराई तक करें ताकि भूमि में वर्षा का अधिक से अधिक पानी संरक्षित किया जा सके।

मेंहदी की कटाई:-

पत्ती उत्पादन व गुणवत्ता की दृष्टि से पुष्पावस्था कटाई के लिए सर्वोत्तम है। आमतौर पर मेहंदी की कटाई सितंबर- अक्टूबर माह में की जाती है। कटाई तेज धार वाले हंसिया से हाथ में चमड़े के दस्ताने पहनकर की जाती है। मेहंदी की एक हेक्टेयर फसल की कटाई के लिए 12-13 कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है।

फसल काटने के 18 से 20 घंटे तक मेंहदी को खुला छोड़े तथा इसके बाद एकत्र कर ढेरी बना लें। ऐसा करने से मेहंदी की गुणवत्ता में सुधार आता है। मेंहदी को सूखने पर हाथ द्वारा डंडे से पीटकर या झाड़कर पतियों को अलग कर ले। पत्तो की झडाई का कार्य पक्के फर्श पर करना चाहिए।

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मेंहदी की पौध संरक्षण उपाय:-

मेंहदी के खेत में कुछ पौधे दीमक कीट,जड़गलन रोग व अन्य कारणों से सूख जाते हैं। इनकी जगह समय-समय पर पौधरोपण कर देना चाहिए अन्यथा उत्पादन कम हो जाता है।

जड़ गलन रोग:-

पौधशाला से पौधे उखाड़कर 0.1 प्रतिशत कार्बेंडाजिम के घोल में जड़े भिगोकर पौधरोपण करेें। खड़ी फसल में जड़ गलन रोग का प्रकोप होने पर 1 ग्राम कार्बेंडाजिम  प्रति लीटर पानी में घोलकर रोग प्रभावित पौधों की जड़ों में डालें। रोग के जैविक नियंत्रण हेतु 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा फफूंद को 100 किलोग्राम नमीयुक्त सड़ी देसी खाद में मिलाकर करीब 72 घंटे छायादार स्थान पर रखें व अंतिम जुताई के समय या खड़ी फसल में कुदाली द्वारा प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिला वे।

पत्ती धब्बा रोग:-

सामान्य से अच्छी वर्षा की स्थिति में पौधे पर पत्ती धब्बा रोग का प्रकोप पाया जाता है। इसके नियंत्रण हेतु 0.2 प्रतिशत मैंकोजेब का छिड़काव करें।

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दीमक:-

रासायनिक विधि द्वारा दीमक नियंत्रण हेतु कार्बोफ्यूरोन 3 जी  25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या  क्लोरपायरिफॉस  20 ई. सी. 4 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलाव। जैविक विधि द्वारा दीमक नियंत्रण हेतु 5 किलोग्राम बावेरिया या मेटाराजियम फफूंद को 100 किलोग्राम नमी युक्त सड़ी हुई देसी खाद में मिलाकर करीब 10 घंटे छायादार स्थान पर रखें व अंतिम जुताई के समय या खड़ी फसल में कुदाली द्वारा प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलावे।

पतीभक्षक लट:-

पत्ती भक्षक लट का प्रकोप होने पर क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.0 -1.5 लीटर दवा 500 से 700 लीटर पानी में घोलकर छिड़के। धूल के रूप में क्यूनालफास 1.5% या मिथाइलपेराथीआन 2 प्रतिशत चूर्ण 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरके। लटो के जैविक नियंत्रण हेतु भुने  हुए बाजरे का चुग्गा  खेत में 8 से 10 जगह स्टैंड बनाकर रखें। चुग्गे के आकर्षण से चिड़िया खेत में आकर लटो को खा जाती है।

रस चूसक किट:-

सफेद मक्खी वह हरा तेला आदि रस चुसक कीटों के नियंत्रण हेतु ट्राईजोफोर्स 40% ई.सी. 1. 5 लिटर या ऐसीफेट 75 एस.पी. 500 ग्राम या मोनोक्रोटोफॉस 36  डब्लू.एस. .सी. 1 लीटर या डायमीथोएट 30 ई.सी. 1 लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17. 8 एस.एल 100 -150 मिली लीटर /हैक्टेयर की दर से – 700 लीटर पानी में घोलकर छिड़के।

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मेंहदी की उपज:-

प्रथम वर्ष मेंहदी की उपज क्षमता का केवल 5 से 10% उत्पादन ही प्राप्त हो पाता है। मेहंदी की फसल रोपण के 3 से 4 साल बाद अपनी क्षमता का पूरा उत्पादन देना शुरू करती है जो करीब 20 से 30 वर्षों तक बना रहता है। सामान्य वर्षा की स्थिति में अच्छी तरह प्रबंधित फसल से प्रति वर्ष करीब 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी पत्तियों का उत्पादन होता है।

प्रस्तुति:-

डॉ.बी.एस. राठौड़, आचार्य, कृषि अनुसंधान केंद्र, मंडोर, जोधपुर (राज.)

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