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रिजके की उन्नत खेती हरे चारे के लिए

Written by Vijay Dhangar

रिजके की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

रिजका (Alfalfa farming) रबी में उगाई जाने वाली एक बहुवर्षीय फलीदार चारे की सिंचित फसल है, जो कि एक बार बोने पर लगभग 3 वर्ष तक उपज देती है। इसकी जड़ें भूमि में अधिक गहराई तक जाती है, इसी कारण से यह फसल भूमि में उपलब्ध पानी को सोखने की क्षमता रखती है। अतः इसकी खेती अपेक्षाकृत सूखे स्थानों एवं सिंचाई के लिए उपलब्ध सीमित पानी वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। रिजके में सूखे के साथ ही ठंड एवं गर्मी सहने की क्षमता भी अधिक होती है। इसकी जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नत्रजन का  स्थिरीकरण भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते है।

रिजके की उन्नत खेती हरे चारे के लिए

रिजके की उन्नत किस्में:-

रिजके की टाइप-8, टाइप 9 (बहुवर्षीय), आर. एल.- 88 (बहुवर्षीय) एवं आनंद- 2 (एकवर्षीय), एल.एल.सी- 3 (एकवर्षीय) उन्नत किस्में है।

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भूमि की तैयारी एवं उपचार:-

रिजके के लिए अच्छे जल निकास वाली गहरी दोमट मृदा सबसे अच्छी रहती है। इसकी खेती रेतीली दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी में भी की जा सकती है। यह क्षारीयता एवं जलक्रांति वाली अवस्था को सहन कर सकती है। कैल्शियम, फास्फोरस एवं पोटाश की प्रचुर मात्रा वाली भूमि रिजके की फसल के लिए बहुत अच्छी होती है।

रिजके की बुवाई के लिए मिटटी को भली प्रकार भुरभुरी करना आवश्यक है, एक गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करके दो- तीन बार हेरों चलकर अथवा देशी हल या बख्तर चलकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। आवश्यकतानुसार पता भी चलाया जा सकता है। क्यारियां समतल बनाये, जिससे की सिंचाई आसानी से हो सके।

दीमक व अन्य भूमिगत कीड़ों की रोकथाम के लिए अंतिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5% चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बिखेर कर जुताई करें।

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बीज:-

रिजके की बुवाई के लिए अक्टूबर का महीना उपयुक्त है। इसके बीजों का छिलका कठोर होता है। इसलिए बीजों को 6 से 8 घंटे तक पानी में भिगोकर तथा बाद में कल्चर मिलाकर बुवाई करें। ज्यादातर किसान रिजके को छिटकवा विधि से बोते हैं। इस विधि में करीब 20 से 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से तैयार खेत में छिड़ककर कल्टीवेटर या दंताली से हल्का सा मिट्टी में मिला कर सिंचाई कर दे।

बुवाई:-

रिजके की बुवाई 20 सेमी की दूरी पर पंक्तियों में की जा सकती है। यह विधि छिटकवा विधि से अच्छी होती है क्योंकि, पंक्तियों से निराई- गुड़ाई आसानी से की जा सकती है। बीज को 1-3 सेमि गहरा बोये। शुरू की कटाइयों में चारे के अधिक उत्पादन के लिए बीज के साथ सरसों, मेंथी, चाइनीज कैबेज के बीज मिलाकर बुवाई करें।

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बीजोपचार:-

रिजके के बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए। कल्चर उपलब्ध ना होने पर गत वर्ष जिस खेत में रिजका बोया गया जो उस खेत की ऊपरी परत से 4 क्विंटल मिट्टी लेकर प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम बार जुताई करते समय नए खेत में मिला देना चाहिए।

रिजके में जैविक खाद एवं उर्वरक प्रयोग:-

मिट्टी में जीवांश रखने के लिए, अच्छे सड़ी हुई गोबर की खाद 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के करीब 1 माह पूर्व खेत में डालकर खेत में मिला दें। रिजके की फसल के लिए जैविक खाद के अतिरिक्त 20 से 35 किलोग्राम नत्रजन एवं 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। फास्फोरस की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा को तीन भागों में बांट कर प्रत्येक दूसरी कटाई के बाद छिटककर तुरंत सिंचाई करें।

बहुवर्षीय फसल में प्रतिवर्ष अक्टुम्बर अक्टूबर माह में 80-100 किलोग्राम डाईअमोनियम फास्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से डालना लाभदायक सिद्ध हुआ है। इसमें भी प्रत्येक दूसरी कटाई के बाद 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, नत्रजनीय उर्वरक सिंचाई के साथ देना चाहिए।

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रिजके में सिंचाई एवं जल निकास:-

रिजके की जड़ें अधिक लंबी होने के कारण अधिक गहराई तक उपलब्ध पानी भी ले सकती हैं। अतः इसे बरसीम की अपेक्षा सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है। बुवाई के बाद अगली दो सिंचाइयाँ 5 से 7 दिन के अंतर पर करें, जिससे सभी बीज उग सके।

हल्की मिट्टी वाले क्षेत्रों में अगली सिंचाई सर्दियों में 10 से 12 दिन, बसंत में 7-8 दिन, गर्मियों में 5-7 दिन के अंतर पर करें। भारी मिट्टी वाले क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में 10 से 15 दिन, बसंत ऋतु में 15 से 20 दिन और शरद ऋतु में 20 से 25 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए।

वर्षा ऋतू में सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई जरूर करे। रिजके वाले खेत में पानी का निकास अच्छा होना नितांत आवश्यक है। जिन स्थानों पर जल निकास का ठीक प्रबंध नहीं हैं अथवा पानी का तल काफी ऊँचा हैं वहां वर्षा ऋतु में फसल नष्ट हो सकती है।

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निराई- गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण:-

बोने से पूर्व एवं अंकुरण के पश्चात निराई करके खरपतवार निकाल देना चाहिए। आरम्भ में रिजके की बढ़ोतरी धीमी गति से होती है, जिससे रबी के खरपतवार अधिक संख्या में जाते हैं और फसल खरपतवार से दबने लगती हैं।

इसलिए 1 वर्षीय खरपतवार नियंत्रण के लिए पहली एक दो कटाईयां जल्दी करें, लेकिन पहली कटाई 50 दिन से पहले न करें। कतारों में बोई गई बहुवर्षीय फसल में वर्षा ऋतु एवं इसके बाद 2-3 निराई गुड़ाई करना लाभदायक है।

रिजके में अमरबेल:-

इस फसल में अमरबेल मुख्य समस्या होती है। इसलिए प्रमाणित बीज ही बोए। जिस खेत में अमरबेल का प्रकोप हुआ हो उस खेत में जिसका न बोये तथा इसके बजाय गेहूं, चना, सरसों इत्यादि फसल बोए।

रिजके में खरपतवार नहीं रहे इसके लिए बीच को बोने से पूर्व 10% नमक के घोल में डुबोकर 5 मिनट तक हिलाए तथा ऊपर तैरते हुए बीज एवं कचरे को अलग कर दें। इसके बाद नमक के घोल से निकालकर बीजों को पानी में तीन चार बार धोकर कल्चर से उपचारित करके बोये। यदि फिर भी अमरबेल का प्रकोप हो जाए तो प्रभावित पौधों को अमरबेल सहित काटकर उसी जगह जला देना चाहिए।

रिजके की फसल में अमरबेल का नियंत्रण करने के लिए प्रभावित हिस्से में 0.1- 0.2% पेराक्वेट का घोल बनाकर पहली या दूसरी कटाई के तुरंत बाद छिड़काव करें।

एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 1000 लीटर घोल की आवश्यकता होगी। इससे अमरबेल व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नष्ट हो जाएंगे तथा एक साथ में कुछ प्रभावित होकर खिंचाई करने पर पुर्नवृद्धी कर एक साथ फसल के रूप में वापस आ जाएगा। इसके बावजूद भी अगर कहीं कहीं अमरबेल के पौधे फिर से आ जाए तो उन पर भी पेराक्वेट  घोल का छिड़काव दोहरावे। ध्यान रहे कि कटे हुए टुकड़े दूसरी जगह न पाए।

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रिजके की कटाई:-

पहली कटाई बुवाई के 55- 60 दिन बाद तथा अगली कटाईयाँ पौधों की बढ़वार के अनुसार 30 से 35 दिन के अंतर पर करें। अधिक उपज लेने के लिए मार्च के बाद वाली कटाईयाँ 10% फूल आने पर ही की जानी चाहिए। कटाई के बाद अच्छी वृद्धि के लिए कटाई की ऊंचाई 5 से.मी. तक रखनी चाहिए, जिससे मुकुट भाग पर पाई जाने वाली कलियाँ भी बिना क्षति के बढ़  सकती हैं।

रिजके की उपज:-

रिजके की 7-8 कटाइयों से 700- 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है।

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