जैविक खेती (Organic farming)

वर्मी कंपोस्ट बनाने की विधि उपयोग एवं महत्व

Written by Bheru Lal Gaderi

हमारे गाँवों में लगभग 75 करोड टन कृषि अपशिष्ट (भूसा, कडप, गोबर, पत्तियां एवं कचरा आदि) उपलब्ध है। केंचुएं द्वारा यह अपशिष्ट उत्तम किस्म की खाद (वर्मी कंपोस्ट) में परिवर्तित हो सकता हैं।

वर्मी कंपोस्ट

लगभग 2 करोड टन पोषक तत्व कंपोस्ट से प्राप्त हो सकते हैं, केंचुआ द्वारा कृषि अपशिष्ट का कंपोस्ट में परिवर्तन “वर्मी कल्चर” के रूप में जाना जाता है।

वर्मी कंपोस्ट व कुकन का मिश्रण वर्मीकास्ट कहलाता है। वर्मी कंपोस्ट में 65% कृषि अपशिष्ट एवं 35% गोबर का मिश्रण उपयोगी रहता है।

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केंचुए के प्रकार:-

एपीजिक  केंचुए:-

कंपोस्ट बनाने में सहयोगी है।सतह पर (कम गहराई 1 मीटर तक) रहते हैं। ये कृषि अपशिष्ट 100% एवं मृदा 10% खाते हैं। इनमें आइसीनिया, फीटिडा एवं यूड्रिलियस युजिनी प्रमुख प्रजातियां हैं।

इन्डोजीक केंचुए:-

भूमि में गहरी सुरंग (3 मीटर से अधिक) बनाकर मिट्टी को भुरभुरी बनाते हैं। यह प्रजाति जल निकास जल सरंक्षण में उपयोगी है। यह 90% मिट्टी खाते हैं।

डायोजिक केंचुएं:-

ये केंचुएं 1-3  गहराई पर रहते है। ये केंचुएं दोनों के बीच की श्रेणी में आते हैं।

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वर्मी कंपोस्ट के लाभ:-

  1. गोबर खाद की तुलना में वर्मी कंपोस्ट में एक्टिनोमाइसिटीज 8 गुना अधिक होता है तथा इस खाद से तैयार फसल में बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।
  2. केंचुएं मृदा की जलशोषण क्षमता में 20% की वृद्धि करते हैं। भूमि का कटाव रुकता है एवं पौधों की जल उपलब्धता में भी वृद्धि होती है।
  3. वर्मी कंपोस्ट में पेरिट्रोपिक झिल्ली होने के कारण जल वाष्पीकरण में कमी होती है। सच्चाई की संख्या भी कम रहती है।
  4. केंचुओं की खाद से खेत में ह्यूमस वृद्धि के कारण वर्षा की बूंदों का आघात सहने की क्षमता साधारण मृदा की अपेक्षा अधिक होती है।
  5. केंचुएं की खाद प्रयुक्त खेत में खरपतवार कम होती है। खेत में दीमक भी नहीं लगती है।

वर्मी कंपोस्ट एवं अन्य कंपोस्ट के तुलनात्मक पोषक तत्व:-

क्र.सं.कंपोस्ट किस्मप्रमुख पोषक तत्व, प्रतिशत
नत्रजनफास्फोरस  पोटाश
1.वर्मी कंपोस्ट1.0-2.00.5-1.01.5-2.0
2.गोबर की खाद0.50.250.50
3.नाडेप कंपोस्ट0.5-1.50.50-0.901.2-1.4
4.शहरी कंपोस्ट1.51.01.5

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वर्मी कंपोस्ट बनाने की विधि:-

  • वर्मी कंपोस्ट शेड बनाने हेतु छायादार जगह चुने जहां पानी का भराव नहीं हो। शेड पानी के स्रोत/धोरे के पास हो ताकि पानी देने में आसानी रहे। खाद के गड्ढे या क्यारी जल स्रोत से ऊपर वाले क्षेत्र में नहीं हो अन्यथा रासायनिक तत्व रिसाव से जल को प्रदूषित कर सकते हैं।
  • सामान्यतः वायुवेग  की दिशा में गड्डों की चौड़ाई रखें तथा आवासीय मकान गड्ढों से निचले क्षेत्र (जिधर हवा बहती हैं नहीं बनाए) इससे वायु प्रदूषण द्वारा नुकसान नहीं होगा।
  • खाद की आवश्यकता अनुसार गड्डों या क्यारियों की संख्या निश्चित करें। गड्डों या क्यारियों की लंबाई कचरे की मात्रा अनुसार रखें। चौड़ाई 1.2 मीटर (4 फिट) रहें, अन्यथा अपशिष्ट पलटने के समय असुविधा रहेगी। क्यारी या  गड्डे की गहराई 30 से 45 से.मी. (01- 1.52 फीट) रखे।  क्यारी या  गड्डे को 2 मीटर ऊँचे छप्पर से ढँक कर रखे।
  • गड्डों में भरने हेतु अपशिष्ट इकट्ठा  करे ताकि एक  दिन में भर सके।
  • सबसे नीचे मोटे कचरे की (कड़प, सरसों, तुअर अपशिष्ट आदि) 5-7.5 से.मी. तह (परत) (24  घंटे पूर्व भिगोई हुई) बिछाये।
  • इसके ऊपर 10 से.मी. बारीक़ भूसे की तह (हरा अथवा सूखा कचरा) फैलाकर पानी से नम करें। पानी लगभग 30 – 40% रहे।
  • अब गोबर की 5 से.मी. की समान रूप से बिछाएं।
  • प्रति वर्ग मीटर के लिए केंचुएं की संख्या में 1000  रखें। केंचुएं अलग-अलग तह में विभाजित रखें।
  • इस सतह को मिट्टी, नीम की पत्तियों एवं राख के मिश्रण से ढके।

  • यह सतह पोषक तत्वों को स्थिर रखेगी।
  • क्रम संख्या 5 से 8 तक की क्रियाऐं दोहराये जब तक की गड्डा या क्यारी भर न जाएँ।
  • सबसे ऊपर सड़ा हुआ गोबर व पत्तियां रखें ताकि मध्य में ऊँचा रहें।
  • गर्मी में प्रतिदिन व  सर्दी में 2 से 3 दिन में एक बार पानी देकर उचित नमी बनाए रखें।
  • प्रतिमाह मिश्रण को पलटते रहे ताकि वायु का संचार हो सके एवं केंचुओं का संवर्धन भी होता रहे।
  • भुरभुरा- भूरे रंग का खाद बन जाने के बाद पानी देना बंद करें। मिश्रण को रेती छानने की छलनी में छानकर बोरी में भरे अथवा उपयोग में लें।
  • खाद में 10 -20% नमी रहनी चाहिए। कचरे की किस्म के अनुसार वर्मीकम्पोस्ट 75 – 90 दिन में तैयार हो जाता है। केंचुएं पुनः खाद बनाने हेतु उपयोग में ले।

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वर्मी कंपोस्ट का उपयोग:-

सामान्य फसलें- 5 टन प्रति हेक्टर (गेहूं मक्का सरसों सोयाबीन बाजरा आदि)

सब्जियां- 5 से 7.5 टन प्रति हेक्टर

फलदार वृक्ष-  5 किलो प्रति पौधा

फूलों की क्यारियां- 1 से 2 किलो प्रति वर्ग मीटर

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Bheru Lal Gaderi

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