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सेक्ससेल तकनीक अब गाय केवल बछड़ी को ही देगी जन्म

सेक्ससेल तकनीक अब गाय केवल बछड़ी को ही देगी जन्म
Written by Vijay Dhangar

सेक्ससेल तकनीक बदल देगी भविष्य का पशुपालन

पशुपालन के लिए अत्यधिक तकनीक से होने वाले कृत्रिम गर्भाधान से अब गाय केवल बछड़ी को ही जन्म देगी। इसके लिए डेनमार्क व अमेरिका से आयात होने वाले सेक्ससेल तकनीक (Sexcell technology) का सीमन भारत में सुलभ हो गया है। अमेरिकी कंपनी ने पूना में प्लांट स्थापित कर दिया है।

सेक्ससेल तकनीक अब गाय केवल बछड़ी को ही देगी जन्म

एक से दो हजार रुपए मे सैंपल

केवल बछड़ी के जन्म के लिए मिलने वाले सीमन सैंपल पहले अमेरिका व डेनमार्क से बड़ी सीमित संख्या में अत्याधुनिक डेयरी फार्म के किसानों को काफी महंगी दर पर उपलब्ध होते थे, लेकिन अब भारत में ही प्लांट स्थापित करने से यह गायों की विभिन्न प्रजाति के हिसाब से 1 से 2 हजार रूपये में पशुपालकों को उपलब्ध हो जाएगा।

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आवारा पशु, बेल के खर्च से पशुपालक होगा मुफ्त

सेक्ससेल तकनीक से पशुपालक को बेल से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसे में बेल ना होने से उस पर होने वाला खर्च भी बच जाएगा। साथ ही बछड़ी होने से हर बार उसे ब्यात से बछड़ी मिलने से उसकी दूध की पैदावार लगातार बढ़ती जाएगी। ऐसे में पशुपालकों का तेजी से विकास होगा व उनकी आय भी तेजी से बढ़ेगी। ट्रैक्टर व मशीनीकरण के बाद बेल चलन में बेहद कम रह गए हैं। ऐसे में आवारा पशुओं की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।

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ऐसे होता है तैयार

कॉउ सीमन को विशेष मशीनों से निश्चित राउंड में घुमाया जाता है। जिससे नर निर्माण के लिए आवश्यक वाई क्रोमोजोम अलग कर लिया जाता है और पशुपालकों केवल एक्स क्रोमोजोम वाला सीमन ही उपलब्ध करवाया जाता है। इससे गर्भाधान के बाद गाय केवल बछड़ी को ही जन्म देती है। बाजार में गीर, साहिवाल, जर्सी, होलिस्टन प्रजाति के लिए सैंपल उपलब्ध है।

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उन्नत किसान को रास आ रही तकनीक

इस तकनीक का मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा के पशुपालन उपयोग कर रहे हैं। इससे उनके डेयरी फार्मों में गायों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नस्लों की अच्छी गायों के लिए मिलने से बछड़ियों के दूध देने की मात्रा भी पुराने पशुओं से अधिक है।

सेक्ससेल तकनीक से मिलने वाले सैंपल सीमन में केवल एक्स क्रोमोजोम होता है। इससे गाय केवल बछड़ी को जन्म देगी। अब यह तकनीक भारत में उपलब्ध हो गई है। इससे पशुपालक का तेजी से आर्थिक विकास होगा।

प्रो. एम.के. गर्ग, एनिमल प्रोडक्शन, डेयरी प्रोजेक्ट,

कृषि विश्वविद्यालय, कोटा

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स्त्रोत:-

राजस्थान पत्रिका (सोमवार, 11 मार्च, 2019)

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