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सोनामुखी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Written by Vijay Dhangar

सोनामुखी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

सोनामुखी या सनाय बहुवर्षीय कांटे रहित झाड़ीनुमा, औषधीय पौधा है, जो लेग्यूमिनोसी (दलहनी) कुल के अंतर्गत आता है। पूर्णतया बंजर भूमि में उगाए जा सकने वाले इस पौधे के लिए ज्यादा पानी एवं खाद की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार भारत के बंजर भूमि वाले भागों में सोनामुखी की खेती (Sonamukhi farming) करके पर्याप्त लाभ कमाया जा सकता है।

सोनामुखी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

सनाय एक औषधीय पौधा है जो एक बार लगा देने के उपरांत 4-5 वर्ष तक उपज देता है। इसका पौधा 4 डिग्री से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान सहन करने की क्षमता रखता है।

एक बार लगा देने के बाद इस फसल के पौधों को न तो कोई जानवर एवं पशु पक्षियों से नुकसान होता है और ना ही कीटो का प्रकोप बहुत होता है। दलहनी पौधा होने के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। इसकी पत्तियों, फलियों को विदेशों में  निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है। सोनामुखी की खेती भारत में मुख्य रूप से राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात में विशेष रूप से होता है।

जलवायु एवं मृदा:-

सोनामुखी के लिए शुष्क जलवायु एवं कम वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त रहते हैं। रेतीली दोमट मिट्टी जिसका पी.एच. मान 7.0-8.5 के मध्य हो उपयुक्त रहती है।

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खेत की तैयारी:-

सोनामुखी की बुवाई से पूर्व खेत की कोई विशेष तैयारी करने की जरूरत नहीं होती है। फिर भी प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से बाद में एक दो बार हेरों या कल्टीवेटर से जुताई, फिर पाटा लगाकर खेत को समतल कर देना चाहिए।

बुवाई का समय:-

सोनामुखी की बुवाई के लिए 15 जुलाई से 15 सितंबर तक का समय उपयुक्त होता है।

सोनामुखी की बीज दर :-

एक हेक्टेयर में बुवाई हेतु लगभग 10 से 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

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सोनामुखी बुवाई की विधि:-

इसकी बुवाई हल या ट्रैक्टर द्वारा सीड ड्रिल से 2.3 सेमी की गहराई पर करें। परंतु छिड़काव पद्धति से भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। बुवाई करते समय कतार से कतार की दूरी 50 सेमी से अधिक ना हो और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी रखनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक:-

मृदा जांच के उपरांत खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना उत्तम रहता है। यदि किसी कारणवश मृदा जांच ना हो सके, तो उस स्थिति में निम्न मात्रा एवं उर्वरक प्रति हेक्टर डालना होगा। गोबर की खाद 10 से 15 टन, नाइट्रोजन 50 किलोग्राम, फास्फोरस १० किलोग्राम एवं पोटाश 40 किलोग्राम।

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सनाय की किस्में:-

ए.एच.एफ.टी.:-

इस किस्म को गुजरात में बड़े पेमाने पर उगाया जा रहा है। इसको विशेष रूप से पत्तियों के लिए उगाया जाता है।

सोना:-

इस किस्म को उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में उगाने हेतु संस्तुत किया गया है। इसकी पत्तियों में सोनासाइट 3.51% तक पाया जाता है।

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सिंचाई प्रबंधन:-

वर्षा ऋतु में यदि काफी लंबे समय तक वर्षा ना हो तो आवश्यकतानुसार उपलब्ध होने पर सर्दियों में 30 दिन और गर्मियों में 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। यदि वर्षा ऋतु में सोनामुखी की फसल में पानी एकत्रित हो जाए, तो उसे निकालने की तुरंत व्यवस्था करनी चाहिए अन्यथा फसल को नुकसान की आशंका रहती है।

खरपतवार नियंत्रण:-:-

फसल की अवस्था में यदि खेत में खरपतवार ज्यादा उग जाए तो आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। वैसे इसकी फसल के 30 दिन की हो जाने के बाद निराई- गुड़ाई की आमतौर पर बहुत कम आवश्यकता होती है।

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कीट एवं रोग नियंत्रण:-

सनाय के पौधों पर कोई विशेष कीट एवं बीमारी का प्रकोप नहीं होता है परंतु कभी-कभी पत्ती खाने वाली सुंडी, सफेद मक्खी, फली बेधक आदि कीट तथा आर्द्र विगलन (डेम्पिंग ऑफ) नामक रोग का प्रकोप हो जाता है। अतः इसके नियंत्रण के लिए किसी उपयुक्त कीटनाशी एवं फफूंदनाशी रसायन का प्रयोग करना चाहिए।

फसल कटाई:-

सोनामुखी की बिजाई के लगभग 100 से 120 दिनों के उपरांत इसकी पत्तियां काटने लायक हो जाती है। पौधों की कटाई तेज धारदार वाले हँसिये द्वारा जमीन से 3 इंच ऊपर से करनी चाहिए ताकि उसमें आसानी से दोबारा पत्ते आ जाए। प्रथम कटाई से 60 से 75 दिन के अंतराल पर इस फसल की अगली कटाई करनी चाहिए।

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सोनामुखी की उपज:-

बारानी क्षेत्रों में इस फसल से लगभग 400 से 600 किग्रा सूखी पत्तियों का उत्पादन होता है। बीज का उत्पादन बारानी व सिंचित दशा में क्रमशः 4 क्विंटल व 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिल जाता है।

कटाई उपरांत प्रबंधन व संग्रहण:-

सोनामुखी पौधे के पत्तों कटाई के बाद सूखने के बाद भी इनका रंग हरा रहना चाहिए। इसलिए काटने के उपरांत उनकी छोटी-छोटी ढेरियां लगा देनी चाहिए। पत्तों का रंग हरा रहे, इसके लिए पत्तों को छाया में छुपाया जाना उपयुक्त रहता है।

सूख जाने पर एक तिरपाल बिछाकर पत्तियों को जाड़ लिया जाना चाहिए। जिससे पत्तियां अलग हो जाए तथा डंठल अलग हो जाएं। टहनियों से जाड़े गए पत्तों को बोरों में भरकर बिक्री हेतु भेजा जा सकता है।

अतः यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन बोरों में पत्ते भरे जाए वे हल्के बारदान के बने हो। इस कार्य हेतु ५०”स५०” के बोरों को उपयोग में लाना उपयुक्त होता है।

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सोनामुखी का बीज उत्पादन:-

प्रारंभ में सोनामुखी की फसल के बीज किसी प्रमाणिक संस्था से खरीदा जाना चाहिए। परंतु भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अथवा फसल को और अधिक बढ़ाने की दृष्टि से यह उपयुक्त रहता है, कि किसान अपने खेत के सबसे अच्छे एवं स्वस्थ पौधों को काटे नहीं।

इससे इन पौधों पर फलियां लगेगी जो की पकने पर भूरी हो जाएंगी। इन फलियों को तोड़कर धूप में सुखाकर, डंडों से कूटकर बीज को पृथक कर लेना चाहिए। ये बीज साफ करके अगली  फसल बिजाई हेतु प्रयुक्त किए जा सकते हैं।

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