सब्जियों की खेती

सौंफ की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

Written by Vijay Dhangar

सौंफ की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

सौंफ की खेती मुख्य रूप से मसाले के रूप में की जाती है। इसके बीजों से ओलेटाइल तेल (0.4-1.2) प्रतिशत भी निकाला जाता है। सौंफ एक खुशबूदार बीज वाला मसाला होता है। इसके दाने आकार में छोटे और हरे रंग के होते हैं।

सौंफ की खेती

आमतौर पर छोटे और बड़े दाने भी होते हैं। फूलों में खुशबू होती हैं, सौंफ (Fennel cultivation) का उपयोग आचार बनाने में और सब्जियों में खुशबू और स्वाद बढ़ाने में किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है। सौंफ एक त्रिदोषनाशक होती है। भारत में सौंफ की खेती राजस्थान (सिरोही,टोंक), आंध्रप्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और हरियाणा के भागों में जाती है।

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भूमि:-

इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन सौंफ की खेती के लिए दोमट मिट्टी सबसे उत्तम मानी जाती है। इसके अलावा चुने से युक्त बलुई मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है। इसकी अच्छी फसल लेने के लिए उचित जल निकासी वाली भूमि  होना आवश्यक है।  रेतीली मिट्टी में इसकी खेती नहीं की जा सकती है।

सौंफ की उन्नत किस्में:-

आरएफ- 35, आरएफ- 101, आरएफ- 125, गुजरात सौंफ 1, अजमेर सौंफ- 2, उदयपुर एफ- 31, चबाने वाली सौंफ की लखनवी किस्म को परागगण के 30-45 दिन बाद तुड़ाई करते है।

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खेत की तैयारी:-

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में तीन से चार जुताई हल या कल्टीवेटर से कर के खेत को समतल बनाकर पाटा लगाते हुए एक सा बना लिया जाता है। आखिरी जुताई में 150 से 200 टन गोबर की सदी हुई खाद को मिलाकर खेत को पाटा लगाकर समतल कर लिया जाता है। इसके अलावा बीजों की बुआई करने के 30 और 70 दिन के बाद फास्फेट की 40 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टर में डालें।

बीज बुवाई:-

बीज द्वारा सीधे बुवाई करने पर लगभग 9 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लगता है। अक्टूबर माह बुवाई के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। लेकिन 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक बुवाई कर दे।  बुवाई लाइनों में करना चाहिए तथा छिटककर बुआई भी की जाती है। सौंफ की रोपाई में लाइन से लाइन की दूरी 8 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखें।

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सौंफ की रोपाई:-

सौंफ की रोपाई करने पर लगभग 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टर बीज लगता है। रोपाई के लिए बीजों को नर्सरी में पौधे तैयार करने के लिए 100 वर्ग मीटर भूमि की आवश्यकता होती है।

जब पौध 5 सप्ताह की हो जाए तब पौध खेत में रोपण करना चाहिए। इसके बीजों को जून या जुलाई के महीने में बोए जब बीजों में अंकुरण हो जाए तो खेत में रोपित किया जाता है। सौंफ के बीजों को सीधे खेत में बो सकते हैं। लेकिन यदि इसके पौधों को नर्सरी में तैयार करके पौधों की बुवाई करें तो इससे हम अधिक और अच्छी गुणवत्ता वाली सौंफ प्राप्त की जा सकती हैं और पौधा छोटा रहता है जो हवा से भी नहीं गिरता है।

सौंफ की फसल में खाद एवं उर्वरक:-

गोबर की सड़ी हुई खाद 10-15 टन प्रति हेक्टर बुवाई के 1 माह पूर्व खेत में डालें और उर्वरक की मात्रा 80 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टयर देना चाहिए।

नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय आखरी जुताई के समय देनी चाहिए। शेष नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 60 दिन बाद तथा शेष मात्रा 90 दिन बाद खड़ी फसल में देनी चाहिए।

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सिंचाई:-

इसकी फसल में पहली सिंचाई बुवाई के 5 या 7 दिन के अंतर पर कर देनी चाहिए। सौंफ की फसल की पहली सिंचाई करने के बाद 15-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान रखे की खेत में पानी का भराव न हो। यदि खेत में पानी भर जाता है तो उससे फसल और उसके बीज को हानि पहुंचती है। इसलिए खेत में पानी का भराव नहीं होना चाहिए।

सौंफ में खरपतवार:-

सौंफ की फसल में खरपतवार फसल के लिए नुकसानदायक है। इसलिए इसकी फसल में खरपतवार को निकालने के लिए बुवाई के 30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। इसके अलावा खरपतवार को दूर करने के लिए खरपतवारनाशी दवा पेंडामेथालिन 1.0 लीटर/हेक्टेयर का भी प्रयोग कर सकते हैं। जिस खेत में सौंफ की खेती की  जा रही है उसे हमेशा खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए।

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फसल कटाई:-

सौंफ की फसल लगभग 107 से 170 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। इस फसल की कटाई उस समय करें जब इसके बीज पूरी तरह से विकसित हो जाए। हालांकि इसके बीज का रंग हरा ही रहता है। इस लिए पहले एक डंडी को तोड़कर उसमें से बीज को निकालकर दोनों हाथों के बीच रगड़ कर देखें कि यह पूरी तरह से पक चुके हैं या नहीं। इसके बाद ही फसल की कटाई करें। इस फसल की कटाई लगभग 10 दिन में पूरी कर लेनी चाहिए।

कटाई के बाद बीज सुखना:-

सौंफ की कटाई के बाद सौंफ को 7-10 दिन तक छाया में सुखाया जाता है। इसके बाद एक या दो दिन तक धूप में सुखाया जाता है। इसके बीजों को लंबे समय तक धुप में न सुखाये। इससे सौंफ की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।

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सौंफ की सफाई एवं ग्रेडिंग:-

सौंफ के बीजो को अच्छी तरह से सुखाने के बाद इसकी सफाई की जाती है। सौंफ को अच्छी तरह से सफाई की जाती है। इसके बीजो को साफ करने के लिए वेक्यूम गुरुत्वाकर्षण या सर्पिल गुरुत्वाकर्षण विभाजक नामक यंत्र की सहायता लेनी चाहिए। इसकी साफ और अच्छी गुणवत्ता के आधार पर पैक किया जाता है।

इसे जुट से बनी थैलियों में पैक किया जाता है। सौंफ में होने वाले विकार की रोकथाम करने के लिए हमें सल्फ्यूरिक एसिड की 0.1 प्रतिशत की मात्रा को पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इससे सौंफ की ठण्ड में किसी प्रकार का विकार नहीं होता है।

सौंफ की उपज:-

सौंफ की उपज 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है और जब कुछ जब कुछ हरे बीज प्राप्त करने के बाद पका कर फसल काटते हैं तो पैदावार कम होकर 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टर रह जाती है।

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सौंफ के प्रमुख रोग एवं रोकथाम:-

पाउडरी मिल्ड्यू:-

इस रोग में पत्तियों, टहनियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है, जो बाद में पूर्ण पौधे पर फैल जाता है।

रोकथाम:-

गंधक चूर्ण  20-25 किलोग्राम/हेक्टर का भुरकाव करें या घुलनशील गंधक 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकता अनुसार 15 दिन बाद में दोहरावे।

जड़ एवं तना गलन:-

यह रोग “स्क्लेरोटेनिया, स्क्लेरोटियोरम व फ्यूजेरियम सोलेनाई” नामक कवक से होता है। इस रोग के प्रकोप से तना नीचे मुलायम हो जाता है व जड़ गल जाती है।  जड़ों पर छोटे बड़े काले रंग के स्क्लेरोशिया दिखाई देते हैं।

रोकथाम:-

बिवाई पूर्व बीज को कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बूवाई करनी चाहिए या केप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से भूमि उपचारित करनी चाहिए।  ट्राइकोडर्मा विरडी मित्र फफूंद 2.5 किलो प्रति हेक्टेयर गोबर खाद में मिलकर बुवाई पूर्व भूमि में देने से रोग में कमी होती है।

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झुलसा रोग:-

सौंफ में झुलसा रोग रेमुलेरिया व ऑल्टरनेरिया नामक कवक से होता है। रोग के सर्वप्रथम लक्षण पौधे की पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं, धीरे-धीरे ये धब्बे काले रंग में बदल जाते हैं। पत्तियों से वृत्त, तने एवं बीज पर इसका प्रभाव पड़ता है। संक्रमण के बाद यदि आद्रता लगातार बनी रहे तो बीज नहीं बनते  या बहुत कम और छोटे आकार के बनते हैं। बीजों की विपणन गुणवत्ता का हास हो जाता है।

नियंत्रण:-

स्वस्थ बीजों को बोन के काम में लीजिये। फसल में अधिक सिंचाई न करे। इस रोग के लगने की प्रारंभिक अवस्था में फसल पर मेंकोजेब 0.2% के घोल का छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव को दोहराये। रेमुलेरिया जलसा रोग रोधी किस्में आरएफ- 15, आरएफ- 18, आरएफ- 21, आरएफ- 31, जी एफ- 2 बोये ।

सौंफ में रेमुलेरिया व ऑल्टरनेरिया  झुलसा, गमोसिस रोग का प्रकोप भी बहुत अधिक होता है। रोग रहित फसल से प्राप्त बीज को ही बोयें।  बीज उपचार तथा फसल चक्र को अपनाकर तथा मेंकोजेब 0.2% घोल का छिड़काव करें।

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