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बागवानी

अनार की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अनार
Written by Bheru Lal Gaderi

अनार पौष्टिक गुणों से परिपूर्ण, स्वादिष्ट, रसीला एवं मीठा फल है। अनार का रस स्वास्थ्यवर्धक तथा स्फूर्तिदायक होता है। इसके फलों के छिलकों से पेट की बीमारियों की दवाइयाँ तैयार की जाती है। प्रायः अनार के फल ताजे ही खाये जाते हैं। इसके दानों को धूप में सूखाकर ‘अनारदाना’ भी बना सकते है, जिसका उपयोग विभिन्न व्यंजन बनाने में किया जाता है। मेवाड़ अंचल में विशेषकर भीलवाडा, चितौड़गढ, राजसमन्द आदि जिलों की जलवायु इसकी खेती के लिए अनुकूल है।

अनार

जलवायु:-

शुष्क एवं अर्ध शुष्क जलवायु अनार उत्पादन के लिए बहुत ही उपयुक्त होती है। पौधों में सूखा सहन करने की अत्यधिक क्षमता होती है परन्तु फल विकास के समय नमी आवश्यक है। अनार के पौधों में पाला सहन करने की भी क्षमता होती है। फलों के विकास में रात के • समय ठण्डक तथा दिन में शुष्क व गर्म जलवायु काफी सहायक होती है। ऐसी परिस्थितियों में दानों का रंग गहरा लाल तथा स्वाद मीठा होता है। वातावरण एवं मृदा में नमी के अत्यधिक उतार-चढ़ाव से फलों में फटने की समस्या बढ़ जाती है तथा उनकी गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

भूमि:-

अनार लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है परन्त अच्छी पैदावार के लिये जल निकासयुक्त बलुई दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 7 से 8 पीएच के मध्य होता है, उपयुक्त होती है। इसके पौधों में लवण एवं क्षारीयता सहन करने की भी क्षमता होती है।

उन्नत किस्में :-

भगवा:-

इस किस्म के पौधे मध्यम ऊँचाई के होते हैं। फल आकार में बड़े एवं लाल रंग के होते है। दाने लाल, रसदार और मीठे एवं खाने में स्वादिष्ट होते है। औसत उपज 20-25 किलो फल प्रति पेड़ है। फल 180-190 दिन में तैयार होते है।

मृदुला:-

यह एक अच्छी उपज देने वाल संकर किस्म है। जो गणेश तथा रूसी किस्मों के संयोग से प्राप्त हुई है। इसके फल का आकार मध्यम, रंग लाल तथा दाने गहरे लाल रंग के होते हैं। फल 140-150 दिन में तैयार होते है।

गणेश:-

इस किस्म के पौधे सदाबहार व मध्यम ऊँचाई के होते हैं। फल आकार में बड़े एवं पीले-लाल रंग के होते है। दाने हल्के गुलाबी, रसदार और मीठे एवं खाने में स्वादिष्ट होते है। औसत उपज 40-100 फल प्रति पेड़ है।

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प्रवर्धन:-

अनार के पौधे कलम (कटिंग) एवं गुट्टी से तैयार किये जा सकते है। कलम से पौधे तैयार करने के लिए एक वर्ष पुरानी शाखाओं से प्राप्त 9-10 इंच लम्बी कलमों को 1000 पी.पी.एम. I.B.A. अथवा सेरेडेक्स बी या रूटेक्स (जड़ विकसित करने वाले हार्मोन्स) से उपचारित करके पौधशाला में लगाते है। कलम लगाने के लिए जनवरी-फरवरी अथवा जून-जुलाई का समय अधिक उपयुक्त होता है।

गूट्टी द्वारा भी अनार के पौधो तैयार किए जाते हैं। एक वर्ष पुरानी शाखा से लगभग 2. 5-5.0 सेमी लम्बाई में छाल हटा देते है। तत्पश्चात् इसके ऊपरी भाग पर 10,000 पीपीएम I.B.A. हार्मोन लगा देते है। इसके पश्चात् गीले माँस से लपेट कर 100 गेज मोटी पोलीथीन से ढककर बांध देते है। लगभग 30 से 40 दिन पश्चात् अच्छी जड़ विकास होने पर इसको मातृ पेड़ से काट कर नर्सरी में लगा देते है।

पौधे लगाना:-

दूरी:-

5X5 मीटर, 5X4 मीटर

गड्ढे का आकार:-

100 सेमी X 100 सेमी X 100 सेमी

गड्ढे भराई का मिश्रण:-

प्रत्येक गठ्ठे में 5-7 किलो वर्मीकम्पोस्ट अथवा 20-25 किलो गोबर की खाद, 1 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 100 ग्राम मिथाइल पैराथियान चूर्ण को मिट्टी में मिलाकर भरना चाहिए। यदि तालाब की मिट्टी उपलब्ध हो तो उसकी भी कुछ मात्रा गठ्ठे में डालनी चाहिए। “गट्टों को मानसून आने से पहले ही भर देना चाहिए। पौधे लगाने का कार्य जुलाई अगस्त अथवा फरवरी मार्च में करना चाहिए।

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अन्तराशस्य:-

आरम्भ के तीन वर्षों तक बाग में सब्जियों, दाल वाली फसले आदि ली जा सकती है।

साधना:-

अनार के पौधों को उचित आकार व ढांचा देने के लिए स्थाई एवं काट-छांट की नितान्त आवश्यकता होती है। एक स्थान पर चार तने रखकर अन्य शाखाओं को हटाते

सिंचाई:-

अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक फल उत्पादन के लिए गर्मी के मौसम में 7-10 दिन के अन्तराल पर तथा सर्दी में 15-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल विकास के समय वातावरण तथा मृदा में नमी का असंतुलन रहता हैं तो फल फट जाते है। इसके लिए फल •विकास के समय भूमि तथा वातावरण से निरन्तर पर्याप्त नमी बनाये रखनी चाहिये।

खाद एवं उर्वरक:-

अनार के पौधों को निम्न तालिका के अनुसार खाद एवं उर्वरक देवे:-

पेड़ की आयु वर्ष में

मात्रा किलोग्राम प्रति पौधा

गोबर की खाद

यूरियासुपर फास्फेट

पोटाश

1 वर्ष

8-10

0.1000.250

0.050

2 वर्ष

16-20

0.2000.500

0.050

3 वर्ष

24-30

0.3000.750

0.100

4 वर्ष

32-40

0.4001.00

0.150

5 वर्ष और उसके बाद

40-50

0.5001.25

0.150

मृग बहार के लिए गोबर की खाद, सुपर फॉस्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा व युरिया की आधी मात्रा को जून माह में तथा शेष यूरिया को सितम्बर माह में देना चाहिए। अम्बे बहार के लिए गोबर की खाद, सुपर फॉस्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश की पुरी मात्रा व युरिया की आधी मात्रा को दिसम्बर-जनवरी माह में तथा शेष युरिया को अप्रैल माह में देना चाहिए। पौधों में सुक्ष्म पोशक तत्वों को भी देना चाहिए।

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बहार नियंत्रण:-

अनार में वर्ष में तीन बार फूल आते है। जिसे ‘बहार’ कहते है।

  1. अम्बे बहार (जनवरी-फरवरी)
  2. मृग बहार (जून-जुलाई)
  3. हस्त बहार (सितम्बर-अक्टूबर)

वर्ष में कई बार फूल आना व फल आते रहना उपज एवं गुणवत्ता की दृष्टि से ठीक नहीं रहता है इसलिए अवांछित बहार का नियन्त्रण कर जलवायु के अनुसार कोई एक बहार की फसल लेना लाभदायक रहता है।

तीनों बहारों में से कोई एक इच्छित बहार का उत्पादन लेने हेतु किए जाने वाले प्रबन्ध को बहार उपचार कहा जाता है जिसका जल उपलब्धता, बाजार भाव, गुणता इत्यादि के अनुरूप चयन किया जाता है।

मृग बहार लेने के लिए पौधों में मार्च-अप्रेल में सिंचाई बन्द कर दी जाती है तथा मई माह में थावलों की खुदाई की जाकर खाद एवं उर्वरक दिये जाते है तथा हल्की सिंचाई की जाती है। जिससे जुन-जुलाई में फूल आते है। फल के विकास के समय आवश्यकतानुसार लगातार सिंचाई करते रहना चाहिए।

अम्बे बहार लेने के लिए पौधों को दिसम्बर माह में पानी बन्द कर देना (तान देना) चाहिए। जनवरी माह के दूसरे सप्ताह में खाद व उर्वरक देने के पश्चात सिंचाई करनी चाहिए। जिसके फलस्वरूप फरवरी मार्च में फूल आते है।

बहारफूल आनाफलों की तुडाईनोट
अम्बे बहारजनवरी-फरवरीजुलाई-अगस्तअधिक फूल व फल, फलों का रंग कम लाल
मृग बहारजून जुलाईदिसम्बर-जनवरीकीट व बीमारी का ज्यादा प्रकोप
हस्त बहारसितम्बर अक्टूबरफरवरी- अप्रैलकम कीट व बीमारी का प्रकोप, फलों की गुणवता अच्छी कम फूल व फल

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रसायन द्वारा पत्तियों को गिराना:-

30 से 40 दिन मिट्टी की स्थिति के अनुसार पानी बन्द रखा जाता है। पौधों में जब तनाव (stress) के लक्षण दिखाई देवें तब इथरल 2 मि.ली. / लीटर के हिसाब से छिड़काव करके पत्तियों को गिराया जाता है। इसके प चात् हल्की प्रुनिंग की जा सकती है। प्रुनिंग के पश्चात् एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए तथा खाद व उर्वरक देकर सिंचाई करनी चाहिए। इस प्रकार से पौधों पर भरपूर फूल आएगें।

अनार की देखभाल:-

बाग को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए समय समय पर निराई-गुड़ाई करना आवश्यक होता है। सर्दी की ऋतु के अन्त में सूखी एवं रोगग्रस्त टहनियों को काटकर अलग कर देना चाहिए। अनार में फलो के फटने की समस्या के निवारण के लिए नियमित रूप से सिंचाई करनी चाहिए तथा बोरेक्स 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।

कीट प्रबंध:-

छाल भक्षक कीट:-

अमरूद फसल के अनुसार नियंत्रण करें।

अनार की तितली:-

मादा तितली पुष्प कली पर अण्डे देती है। इनमें लटें निकल कर बनते हुए फलों में प्रवेश कर जाती है। फल को अन्दर ही अन्दर खाती है फलस्वरूप फल सड़ कर गिर जाते है। नियंत्रण हेतु बाग को साफ सुथरा रखना अति आवश्यक है। फूल व फल बनते समय कार्बोरिल 50 डब्ल्यू पी 2 से 4 ग्राम या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस एल एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

मिली बग:-

इसके अवयस्क (शिशु) प्रायः नवम्बर दिसम्बर में बाहर निकल कर तने के सहारे चढ़ते हुए वृक्ष की कोमल टहनियों एवं फूलों पर एकत्रित हो जाते हैं तथा रस चूस कर नुकसान पहुंचाते है। इनके प्रकोप से फल नहीं बन पाते है। इसके द्वारा एक तरह का मीठा चिपचिपा पदार्थ छोड़ा जाता है जिससे काला कवक लग जाता है।

नियंत्रण हेतु:-

पेड़ के आस पास की जगह को साफ रखें। अगस्त-सितम्बर तक पेड़ के थांवले की मिट्टी को पलटते जिससे अण्डे बाहर आकर नष्ट हो जाये। क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियोंन 2 प्रतिशत चूर्ण 50-100 ग्राम प्रति पेड़ के थांवले में 10-25 सेमी की गहराई में मिलावें।

शिशु कीट को पेड़ पर चढ़ने से रोकने के लिये नवम्बर में 30-40 सेमी चौड़ी 400 गेज एल्काथिन की पट्टी जमीन से 60 सेमी की ऊंचाई पर तने के चारों और लगावे तथा इसके निचले (15-20 सेमी.) भाग पर ग्रीस का लेप करें। यदि पेड़ पर मिली बग चढ़ गयी हो तो मोनोक्रोटोफॉस (36 एस.एल.) या डाईमिथोएट (30 ई.सी.) 1.5 मिलीलीटर या मिथाइल पैराथियॉन (50 ई.सी.) या फेनथियॉन (50 ई.सी) 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

पत्ती मोड़क (बरुधी):-

सितम्बर माह में बरूथी के प्रकोप से पत्तियाँ सिकुड़ कर मुड़ जाती है जिससे पौधे के प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और पौधे की बढ़वार व फलन बुरी तरह प्रभावित होती है।

नियन्त्रण हेतु:-

सितम्बर माह में मोनोक्रोटोफॉस एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिये। दूसरा छिडकाव 15 दिन बाद अवश्य दोहरायें।

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व्याधि प्रबंध

पत्ती वा एवं कल सदन:-

वर्षा शुरू होते ही पत्तियों पर छोटे छोटे भूरे रंग के धब्बे बनते है तथा बाद में धब्बे भूरे काले रंग के हो जाते हैं। रोगी पत्तियां गिर जाती है। वातावरण में अधिक नमी होती है पर फल एवं कलियों पर काले धब्बे बन जाते है तथा धीरे-धीरे रोगी फल सड़ जाते है। नियंत्रण हेतु टोपसिन एम एक ग्राम या जाइनेब का दो ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से 15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करना चाहिये।

जीवाणु धब्बा (तेलियाँ धब्बा):-

इस रोग में पत्तियों, टहनियों व फलों पर भूरे रंग के तेलिये धब्बे बनते हैं जो बाद में भूरे रंग में बदल जाते हैं तथा फल फट जाता है। इस रोग के नियंत्रण में स्वस्थ पौधों के चयन के साथ कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम व स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 0.5 ग्राम का छिड़काव करना चाहिये।

फल फटना:-

इस समस्या का कारण मिट्टी में नमी का उतार-चढ़ाव व बोरॉन तत्व की कमी है। रोकथाम हेतु नियमित अन्तराल पर सही मात्रा में बाग में सिंचाई का प्रबन्ध करें तथा कुछ रसायनों में बोरॉन (0.2 प्रतिशत) या जिब्रेलिक अम्ल (40 पी.पी.एम.) का पर्णिय छिड़काव फल विकास अवस्था पर करें।

तुड़ाई एवं उपज:-

फलों को रंग जैसे ही हरे से हल्का पीला या लाल में बदलने लगे तो समझ लेना चाहिये कि फल पकने की स्थिति में आ गया है। फूल आने के बाद लगभग 5 से 6 माह बाद फल तैयार हो जाते हैं। अनार के अच्छे विकसित पौधे से जिसकी उम्र 5-6 साल की हो, 20 से 22 किलो फल प्रति पौधे के हिसाब से प्राप्त हो जाते है।

विशेष बिन्दु:-

  1. फल विकास की अवस्था में ध्यान रखना चाहिए कि मृदा में नमी लगातार बनी रहे। यदि पानी अनियमित रूप से देंगे तो फलो के फटने की समस्या उत्पन्न होगी।
  2. अनार के फलों को पक्षी खासकर तोते बहुत हानि पहुँचाते हैं। इनसे बचाव के लिए नाइलोन की जाली बगीचे में लगानी चाहिये। खाली पींपा आदि पीटकर भी पक्षियों से फलों को बचाया जा सकता है।
  3. बगीचे में सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। रोगग्रस्त व सुखी भाखाओं को पौधें से हटाकर बगीचे से दूर ले जाकर जला देना चाहिए। नियमित अन्तराल पर खरपतवारों को हटाते रहना चाहिए।
  4. कीट या बीमारी के लक्षण नजर आते ही तुरन्त कीटनाशक / फफूंदना कि का प्रयोग करना चाहिए। देरी से फलों की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है।
  5. फलों की तुड़ाई के 20 दिन पहले ही कीटनाशक / फफूंदनाशक का प्रयोग रोक देना चाहिए ताकि फलों में इनका अवषेश न रहे।
  6. कटाई-छंटाई के पहले चाकू / सिकेटियर को सोडियम हाइपो क्लोराइट से जीवाणुमुक्त करके ही प्रयोग करना चाहिए। कटाई-छटाई के दौरान चाकू/सिकेटियर को जीवाणुमुक्त करते रहना चाहिए।
  7. पौधों में सिंचाई आवश्यकतानुसार ही करनी चाहिए। अधिक नमी होने से पौधों में बीमारियों का प्रकोप अधिक होगा।
  8. जब 60-70 प्रतिशत फुलो में फल संचित (fruit setting) हो जाता है उस अवस्था में कीटनाशक + फफूंदनाशक (जैसे कार्बेन्डाजिम 30 ग्राम इमिडाक्लोप्रिड 5 मि.ली. प्रति 15 ली. पानी में मिलाकर) का छिड़काव अवश्य करना चाहिए ताकि फल मक्खी व फफूदीनाशक रोगों से फलों की गुणवत्ता खराब न हो।

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