बागवानी

अमरूद की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अमरूद की उन्नत खेती
Written by Bheru Lal Gaderi

अमरूद का फल मीठा, मधुर सुगंध वाला, पाचक एवं स्वादिष्ट होता है। फलों में विटामीन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। फल ताजे रूप में खाने एवं जैम, जैली आदि बनाने में प्रयोग किये जाते हैं।

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जलवायु एवं भूमि:-

अमरूद उष्ण तथा उपोष्णीय क्षेत्र का फल है। इसका पौधा सूखे की दशा में कम प्रभावित होता है लेकिन वह पाले में शीघ्र ही प्रभावित हो जाता है। यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है। वैसे गहरी उपजाऊ बलुई दोमट मिट्टी अमरूद की खेती के लिये उपयुक्त रहती है।

अमरूद की उन्नत किस्में:-

  1. इलाहाबाद सफेदा
  2. लखनऊ-49 (सरदार)
  3. पन्त प्रभात
  4. श्वेता
  5. ललित
  6. रेड फ्लेस्ड

पदोन्नति:-

अमरूद का प्रवर्धन बीज एवं वानस्पतिक तरीके से किया जाता है। वानस्पतिक विधियों में इनाचिंग, वेंज ग्राफ्टिंग एवं लेयरिंग प्रमुख है। प्रवर्धन का उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त है।

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पौधे लगाने की विधि:-

पौधे लगाने का उचित समय जुलाई से सितम्बर है लेकिन जहां सिंचाई की सुविधा हो वहां फरवरी-मार्च में भी पौधे लगाये जा सकते है। पौधे लगाने के लिये 100X100X100 सेन्टीमीटर आकार के गड्डे, गर्मी के दिनों (मई, जून) में तैयार किये जाते हैं। इन गड्डों में 25 किलो अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद, एक किलो सुपर फॉस्फेट, 50 से 100 ग्राम क्यूनालफॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण तथा मिट्टी के मिश्रण से भर देना चाहिए। वर्षा ऋतु में पौधों को लगा दिया जाता है।

पेड़ व कतार की दूरी 6X6 मीटर रखनी चाहिये। सघन पौधा रोपण के लिए अमरूद के पौधे 3X6 मीटर या 3 X 3 मीटर दूरी पर भी लगाये जा सकते हैं। अति सघन बागवानी में 2X1 मीटर कतार व पौधे की दूरी रखते हुए प्रति हेक्टेयर 5000 पौधे लगा सकते हैं।

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खाद एवं उर्वरक:-

प्रति पौध खाद एवं उर्वरक निम्न दर्शायी गयी तालिका के अनुसार डालें:-

वृक्ष की आयु वर्ष में

मात्रा किलोग्राम प्रति पौधा
गोबर की खादयूरियासुपर फॉस्फेट

म्यूरेट ऑफ पोटाश

1-3

10-12

0.05-0.250.15-1.50

0.20-0.40

4-6

25-40

0.30-0.600.50-2.00

0.40-0.80

7-10

40-50

0.75-1.002.00

0.80-1.20

10 से अधिक

50

1.002.50

1.20

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वर्षा ऋतु वाली फसल के लिये देशी खाद, सुपर फॉस्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा दिसम्बर माह में तथा बची हुई यूरिया की आधी मात्रा मार्च अप्रैल में देनी चाहिये।

इसी प्रकार शरद ऋतु की फसल के लिये देशी खाद, सुपर फॉस्फेट, पोटाश व यूरिया की आधी मात्रा जून तथा शेष यूरिया की मात्रा सितम्बर माह में देनी चाहिये। सर्दी की फसल लेना अधिक लाभप्रद है क्योंकि फल अच्छे गुणवत्ता वाले व कीट/व्याधि मुक्त होते है।

सिंचाई और अंतरफसल:-

गर्मियों में प्रायः 7 से 10 दिन एवं सर्दियों में 15 से 20 दिन के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए। फल विकास के समय उचित नमी होना आवश्यक होता है। आरम्भ के तीन वर्षों तक आय का साधन बना रहे इसके लिए मटर, ग्वार, चौला, मिर्च, बैंगन आदि फसलों की खेती की जा सकती है।

• कृन्तन (प्रूनिंग):-

अमरूद में फूल तथा फल, नई वृद्धि शाखाओं पर ही लगते है अतः कृन्तन नियमित प्रति वर्ष अपनाना चाहिये। जिससे नयी वृद्धि अधिक मात्रा में हो।

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बहार नियंत्रण:-

अमरूद के पौधे पर वर्ष में तीन बार फूल आते है

 

अम्बे बहार

फूल आने का समय   फलों की तुड़ाई

फरवरी मार्च

वर्षा (जुलाई-अगस्त)

मृग बहार

जुलाई अगस्त

सर्दी (नवम्बर-दिसम्बर)

हस्त बहार

सितम्बर अक्टूबर

बसंत (मार्च-अप्रैल)

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मृग बहार से मिलने वाले फलों की गुणवत्ता अच्छी होती है। इस समय बरसात होने से सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। शेष ऋतुओं की बहार को नष्ट कर देना चाहिये। फलतः रोकने के लिये फूलों को हाथ से तोड़ देना चाहिये अथवा फूल आने से 1.5-2 माह पहले पानी नहीं देना चाहिये एवं बाग की गुड़ाई कर देनी चाहिये।

एन.ए.ए. के 100 पी.पी.एम. (100 मिग्रा / लीटर) या उर्वरक ग्रेड यूरिया का 10 प्रतिशत सान्द्रता (100 ग्राम प्रति लीटर) का छिड़काव 15 अप्रैल से 15 मई (50 प्रतिशत पुष्पन अवस्था) में करना चाहिये। इससे बहार नियंत्रण में मदद मिलती है।

पौध संरक्षण:-

कीट प्रबंधन:-

फल मक्खी :-

यह मक्खी बरसात के फलों को विशेष हानि पहुंचाती है। यह फलों के अन्दर अण्डे देती है। जिससे बाद में लटे (मैगट्स) पैदा होकर फल के अन्दर के गूदे को खाने लग जाती है। प्रभावित फल भी अन्त में नीचे गिर जाते है।

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नियंत्रण के लिए:-

प्रभावित फलों को इकट्ठा करके भूमि में गहरा गाड़ देवें अथवा नष्ट कर देवें।

शीरा या शक्कर 100 ग्राम के एक लीटर पानी के घोल में 10 मिलीलीटर मैलाथियॉन 50 ई.सी. मिलाकर प्रलोभक तैयार कर 50 से 100 मिलीलीटर प्रति मिट्टी के प्याले की दर से प्याले में डालकर जगह-जगह पेड़ों पर टांग देवे।

मैलाथियॉन 50 ई.सी. का एक मिलीलीटर प्रति लीटर या इमेडाक्लोप्रिड एक मिलीलीटर प्रति 3 लीटर अथवा मिथाइल डिमेटॉन 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिडकाव करें

छाल भक्षक कीट:-

यह कीट अमरूद के वृक्ष की छाल को खाता है तथा छिपने के लिये अन्दर डाली में गहराई तक सुरंग बना डालता है जिससे कभी-कभी डाल / शाखा कमजोर पड़ जाती है।

नियन्त्रण हेतु:-

  1. सूखी शाखाओं को काटकर जला देना चाहिये।
  2. क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर शाखाओं / डालियों पर छिड़कें तथा साथ ही सुरंग को साफ करके किसी पिचकारी की सहायता से केरोसिन 3 से 5 मिली प्रति सुरंग में डालें या रूई का फाहा बनाकर अन्दर रख देवें एवं गीली मिट्टी से बंद कर देवें।

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रोग प्रबंधन:-

ग्लानी रोग (सूखा, उखड़ा हुआ, सूखा या मुरझाया हुआ)

रोग के लक्षण दो प्रकार के होते है। पहला आंशिक मुरझान, जिसमें पेड़ की एक या अधिक मुख्य शाखाए रोग ग्रस्त होती है और अन्य शाखाएं स्वस्थ रहती है। ऐसे पेड़ों की पत्तियां पीली पड़कर झड़ने लगती है। रोग ग्रस्त शाखाओं पर कच्चे फल छोटे भूरे व सख्त हो जाते है।

दूसरी अवस्था में रोग का प्रकोप पूरे पेड़ पर होता है और वह शीघ्र सूख जाता है। रोग अगस्त से अक्टूबर माह में उग्र रूप धारण कर लेता है।

  1. रोग का प्रभावी नियन्त्रण कठिन है। कार्बेन्डाजिम दो ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल कर 10 से 20 लीटर घोल प्रति वृक्ष या आवश्यकतानुसार भूमि का मंजन (ड्रेन्च) करने से लाभ होता है
  2. रोग के फैलने से बचाने व खेत की स्वच्छता के लिये रोग के बचाव हेतु रोगी पेड़ों को जड़ सहित उखाड़ कर जला देना चाहिये व उस स्थान की मिट्टी को बाविस्टीन 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से दूसरा पौधा लगाने से पूर्व उपचारित करना चाहिये।

श्याम वर्ण (एन्थ्रेक्नोज):-

रोग का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक प्रभावी रहता है। ग्रसित फलों पर काली चित्तीयां पड़ जाती है और उनकी वृद्धि रुक जाती है। पेड़ों के सिरे से रोगी कोमल शाखाये नीचे की तरफ सूखने लगती है। ऐसी शाखाओं की पत्तियां झड़ने लगती है और उसका रंग भूरा हो जाता है।

नियन्त्रण हेतु सूखी टहनियों को काट देना चाहिये और उसके पश्चात मैन्कोजेब दवा का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर फल आने तक 10-15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करना चाहिये।

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जस्ते की कमी :-

अमरूद की फसल, जस्ते की कमी से सामान्यतः प्रभावित होती देखी गयी है। इससे पत्तिया अत्यधिक छोटी व चर्मिल हो जाती है और उनकी शिराओं के बीच का भाग पीला पड़ ताम्र वर्ण हो जाता है।

ग्रसित पेड़ों की बढ़वार रुक जाती है और ऊपर से नीचे की और शनैः शनै मरने लगते है। फल सख्त होकर सूख कर गिर जाते हैं। नियन्त्रण हेतु जिंक सल्फेट 6 ग्राम व बुझा हुआ चूना 4 ग्राम को एक लीटर पानी में घोल कर अप्रैल व जून माह में छिड़काव करने से अच्छा लाभ होता है।

तुड़ाई एवं उपज:-

फलों का रंग जब हरे से पीले में बदलने लगे तब उन्हें सावधानी पूर्वक तोड़ लेना चाहिये। एक पूर्ण विकसित पेड़ से लगभग 40 से 50 किलोग्राम फल प्राप्त हो जाते है।

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