kheti kisani उन्नत खेती

अरहर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अरहर
Written by Vijay Gaderi

अरहर की फसल कम सिंचाई वाले क्षेत्रों तथा बारानी क्षेत्रों के लिये बहुत उपयोगी है। इसे मिश्रित फसल के रूप में किसी अन्य फसल के साथ बोकर अतिरिक्त लाभ लिया जा सकता है साथ ही दलहनी फसल होने के कारण यह मिट्टी में नत्रजन स्थरीकरण कर जमीन की उर्वराशक्ति भी बढ़ाती है।

अरहर

अरहर की उन्नत किस्में एवं उनकी विशेषताएँ:-

आई.सी.पी.एल. 151:-

यह एक शीघ्र पकने वाली किस्म है, जो कि 120 से 145 दिनों में पक जाती है। इसमें पकाव एक साथ आता है। इसकी ऊँचाई 100 से 120 सें.मी. होती है। इसका दाना बड़ा एवं हल्के पीले रंग का होता है। इसकी पैदावार 12 से 20 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। यह भारी दोमट मिट्टी वाले क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है।

आई.सी.पी.एल. 87 (1986):-

यह मध्यम समय में पकने वाली बौनी किस्म है। इसकी ऊँचाई 90 से 100 सें.मी. होती है व 140 से 150 दिनों में पक जाती है। इसकी पत्तियाँ गुच्छों में आती हैं और फली मोटी तथा लम्बी होती है। यह किस्म एक साथ पकती है। इसके बाद गेहूँ बोया जा सकता है। यह फाइटोपथेरा बीमारी से रोगरोधी है। इसकी पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। ग्वालियर – 3 : यह फसल 180 से 250 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी ऊँचाई 225 से 275 सें.मी. तथा उपज 8-12 क्विंटल प्रति हैक्टर है।

यू.पी.ए.एस. 120 (1985):-

120 से 140 दिन पकने वाली इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 150 से 200 सेन्टीमीटर तथा पैदावार 10 से 15 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। आई.सी.पी.एल.: 88039 यह एक शीघ्र पकने वाली किस्म है जो कि 135-138 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म ने परीक्षण के दौरान यू.पी.ए.एस.- 120 से 45.80 प्रतिशत अधिक पैदावार दी। इस किस्म की औसत पैदावार 13-14 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है।

पूसा-992:-

यह एक शीघ्र पकने वाली किस्म है जो कि 135-138 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म ने परीक्षण दौरान यू.पी.ए.एस. 120 से 34.70 प्रतिशत अधिक पैदावार दी। इस किस्म की औसत पैदावार 12-13 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है।

पूसा-991:-

यह एक शीघ्र पकने वाली किस्म है जो कि 136-140 दिन में पककर तैयार से 16.90 प्रतिशत अधिक हो जाती है। इस किस्म ने परीक्षण के दौरान यू.पी.ए.एस.-120 पैदावार दी। इस किस्म की औसत पैदावार 10-11 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है।

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खेत की तैयारी:-

अरहर की जड़ें मिट्टी में काफी गहराई तक जाकर पौषक तत्व ग्रहण करती है अतः गहरी अच्छे जल निकास वाली भूमि इस फसल के लिये उपयुक्त रहती है। उथली व जल भराव वाली मिट्टी में इसकी खेती सफलतापूर्वक नहीं की जा सकती है। वर्षा के प्रारम्भ होते ही जमीन को तीन चार बार हल से जोत लीजिये। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में देशी हल, बक्खर, कल्टीवेटर या हैरो से जुताई करें मिट्टी में ढेले टूट जायें व मिट्टी ज्यादा नमी संग्रह कर सके इस लक्ष्य से भूमि तैयार कर लीजिये।

खाद एवं उर्वरक:-

कारक (वर्षा, सिचिंत, असिचिंत, किस्म उपयोगिता)नाइट्रोजन किग्रा / हैक्टरफास्फोरस किग्रा / हैक्टरपोटाश किग्रा / हैक्टर
सामान्य15-2050-60

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इसमें प्रायः गोबर या कम्पोस्ट खाद नहीं देना चाहिये।

बीज की मात्रा एवं बुवाई:-

साधारणतयाः इसकी बुवाई मई माह से प्रारम्भ होकर अगस्त माह तक चलती रहती है। देर से बोई गई फसल हमेशा रोग एवं कीड़ों से प्रभावित होती है। अतः बुवाई उपयुक्त समय पर कर दीजिये। बुवाई का उपयुक्त समय मध्य जून से मध्य जुलाई है। * अकेली फसल के लिये प्रति हैक्टर 15 से 20 किलोग्राम तथा मिश्रित फसल के लिये 6–7 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

बीजों को राईजोबिया शाकाणु संवर्ध (कल्चर) से उपचारित करके हल के पीछे घोरा लगाकर ऊरिये। ध्यान रखिये कि बीज 5 सें.मी. से ज्यादा गहरा नहीं गिरे। बबाई के समय भूमि में उपयुक्त नमी का होना अत्यन्त आवश्यक है। अरहर की कतार से कतार की दूरी, जमीन की उर्वरा शक्ति तथा साथ में उगाई जाने वाली फसल पर निर्भर है। साधारणतया अरहर की कतार से कतार की दूरी 50 से 60 सें.मी. रखिये।

सिंचाई:-

अरहर को अधिकतर बारानी फसल के रूप में ही लिया जाता है परन्तु आवश्यकता होने पर जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हों वहाँ इसे एक या दो सिंचाई देना लाभदायक होता है। यदि वर्षा न हो तो पहली सिंचाई फसल की प्रारम्भिक अवस्था में ही करनी चाहिये। दूसरी सिंचाई सर्दी में फूल व फलियाँ लगते समय करिये, इससे फसल पाले द्वारा होने वाले नुकसान से भी बच सकेगी।

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निराई-गुड़ाई:-

प्रारम्भिक अवस्था से ही खेत से खरपतवार निकालने रहिये। जब फसल 3-4 सप्ताह की हो जाये तब कतारों में से अतिरिक्त पौधों को उखाड़ कर पौधे से पौधे की दूरी किस्म के आधार पर 25 से 35 सें.मी. कर लीजिये। अरहर की बुवाई मिश्रित रूप में करने से कतारों के बीच में छूटने वाली जगह का उपयोग हो जाता है तथा किसान को अतिरिक्त आमदनी मिल जाती है। यह फसल प्रारम्भिक अवस्था में बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिये इसके पकने से पहले कोई शीघ्र पकने वाली फसल ले सकते हैं। | इसी प्रकार छाया चाहने वाली फसलें जैसे हल्दी, अदरक इत्यादि जहाँ बोई जाती है, को भी इसके साथ मिश्रित फसल के रूप में बो सकते हैं।

पौध संरक्षण:-

अरहर अगर मिश्रित फसल के रूप में बोई गई है तो साथ में ली गई फसल की कटाई के तुरन्त बाद अरहर की कतारों के बीच में हल या हैरो चलाइये यह क्रिया अरहर की बढ़ोतरी में सहायक होती है।

दीमक:-

जहाँ कहीं दीमक लगती हो वहाँ बुवाई से पूर्व क्यूनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टर की दर से भूमि उपचार करें। लाल लट : प्रारम्भिक अवस्था में अरहर के बढ़ते पौधों की पत्तियों को लाल बाल वाली लट खा जाती है। इन कीड़ों से फसल को बचाने के लिये 2 प्रतिशत मिथाइल पैराथियों चूर्ण 20 से 25 किलोग्राम का भुरकाव प्रति हैक्टर करें।

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फली छेदक:-

नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. या मैलाथियॉन 50 ई.सी. एक लीटर या कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुनलशील चूर्ण ढाई किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से फूल आते ही छिड़क दीजिये। अरहर में फली छेदक (बेधक) कीट की रोकथाम हेतु एसिफेट 75 एस.पी. 500 ग्राम प्रति हैक्टर, दो छिड़काव अथवा स्पाइनोसेड 25 एस.सी. 60 मि.ली. अथवा बायोबिट एक किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से फूल आने पर व फली बनने की अवस्था पर छिड़काव करें। फ्ल्यूबेन्डामाइड 480 एस.सी. का 100 मिलीलीटर प्रति हैक्टर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बना कर छिडकाव करने से भी फलीछेदक का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर 10 दिन के अन्तराल पर पुनः छिड़काव करें।

उखटा (विल्ट):-

अरहर की यह प्रमुख बीमारी है। खेत की तैयारी के समय ट्राइकोडर्मा 2.5 किलो प्रति 100 किलोग्राम कम्पोस्ट में मिलाकर प्रति हैक्टर में कूड में प्रयोग करे। उपयुक्त फसल चक्र लेकर भी इस रोग से बचा जा सकता है।

सूत्रकृमि:-

अरहर में पुट्टी के सूत्रकृमि के प्रबंधन हेतु ट्राइकोडर्मा हारजियानम 2.5 किलोग्राम प्रति हैक्टर व पोचोनिया क्लाइमेडोस्पोरिया 10 किलोग्राम प्रति हैक्टर जैव कारकों को साथ मिलाकर मृदा में बुवाई के समय प्रयोग करें।

कटाई एवं पैदावार:-

जून-जुलाई माह में बोई गई अरहर की अगेती फसल नवम्बर-दिसम्बर में पककर तैयार हो जाती है जबकि देर से पकने वाली फसल की कटाई मार्च-अप्रैल तक हो जाती है। उपरोक्त सभी उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाकर अरहर की प्रति हैक्टर 20 से 30 क्विंटल पैदावार ली जा सकती है।

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