kheti kisani सब्जियों की खेती

आलू की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

आलू
Written by Vijay Gaderi

भारत में आलू, सत्रहवीं सदी से पुर्तगालियों द्वारा लाया गया था जो प्रारम्भ में केवल किचन गार्डन में ही उगाया जाता था परन्तु इसके स्वाद व पौष्टिकता ने इसको जन-जन में लोकप्रिय बना दिया।आज सब्जियों में आलू का एक महत्वपूर्ण स्थान हैं इसमें विभिन्न पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।

आलू

विश्व में भारत, आलू का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया हैं।यह दुनिया के कुल आलू उत्पादन का करीब 4% आलू उत्पादित करता हैं। आलू उत्पादन में पिछले 5-7 दशकों में अभूतपूर्व प्रगति हुई हैं। इस समयावधि में आलू उत्पादन में 15 गुना एवं उत्पादकता में लगभग 3 गुना वृद्धि हुई हैं।

आलू की लगभग 72% खेती सिंध-गंगा के मैदानी क्षेत्रों में तकरीबन 10% पहाड़ी क्षेत्रों में तथा शेष 4% दक्षिण-पूर्व के मैदानी मध्य एवं भारतीय पठारी क्षेत्रों में की जाती है।

आलू एक अधिक आदान चाहने वाली फसल हैं यदि इसकी उत्पादन तकनीकी पर ध्यान दिया जाये तो कृष कगण आलू की फसल लगा कर अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं साथ ही सकारात्मक आर्थिक लाभ से विकास की और अग्रसर हो सकते हैं।

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जलवायु:-

आलू की फसल विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में सफलतापूर्वक लगाई जा सकती हैं। तापक्रम व जल आलू के उत्पादन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं।आलू के अच्छे अंकुरण के लिए 24-25° सेल्सियस एवं उत्पादन एवं वानस्पतिक वृद्धि के लिए 14-20° सेल्सियस औसत तापमान चाहिए एवं कन्द निर्माण के लिए 14-20° सेल्सियस औसत तापक्रम चाहिए।

भूमि की तैयारी:-

आलू की फसल हल्की से मध्यम भारी सभी प्रकार की भूमि में ली जा सकती हैं परन्तु उच्च जीवांश युक्त अक्की उर्वर, समतल एवं अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट से चिकनी दोमट भूमि उत्तम रहती हैं। ऐसी मृदाए जिनका पि.एच. मान 5-6 हो तो उत्तम रहतीहैं। क्षारीय, लवणीय एवं अत्यधिक अम्लीय भूमि आलू की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं क्योंकि यह विभिन्न प्रकार की बिमारियों को बढ़ावा देती हैं।

खेत की तैयारी हेतु सर्वप्रथम पलेवा देकर खेत में उचित नम अवस्था होने पर एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करके तथा 2-3 बार हैरो या देशी हल से खेत की गहरी जुताई कर मिट्टी को बारीक़ एवं भुरभुरी कर लेना चाहिए, साथ-साथ पाटा लगाकर मिट्टी को समतल एवं बारीक़ करना चाहिए जिससे नमी का उचित संरक्षण भी होता हैं। यदि पलेवा देकर बुवाई नहीं करके तो बुवाई के तुरंत बाद सिंचाई करना चाहिए। गर्मी की गहरी जुताई ही लाभदयक रहती हैं।अतः गर्मी में गहरी जुताई अवश्य करें। साथ ही एक ही खेत में लगाकर कई वर्षों तक फसल न लेवे।

बुवाई का उचित समय:-

आलू की बुवाई भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु के अनुसार अलग-अलग समय पर की जाती हैं। मैदानी क्षत्रों में यह शीत ऋतू में एवं पहाड़ी क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतू में लगाई जाती हैं ।अतः मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई अक्टुम्बर-नवम्बर माह में की जाती हैं एवं पहाड़ी क्षेत्रों में बुवाई फरवरी से अप्रेल माह के बिच की जाती हैं।

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बीज कंदो का चुनाव:-

आलू के बीज कंदो का चुनाव करना एक महत्वपूर्ण कार्य हैं, क्योंकि यह एक अत्यंत प्रभावी कारक हैं जो उत्पादकता को बहुत अधिक प्रभावित करता हैं।अतः आलू के बीज कंदों का चयन करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

बीज कंद उन्नत प्रमाणित एवं क्षेत्रीय संस्तुति के अनुरूप ही किस्मों का चुनाव करें।

सड़े गले एवं रोगग्रस्त कंदों को बुवाई हेतु काम में न लेवे केवल स्वस्थ कंदों का ही चयन करें।

बीज आलू को बुवाई से 4-10 दिन पहले शीत गृह से निकाल कर पहले 24 घंटे तक अभिशीतन कक्ष रखें। ताकि बीज सामान्य ताप पर आ सकें। इसके पश्चात अंकुरण हेतु बीज आलू को पतली तह में छायादार स्थान पर फैला दें। ताकि इनमे एक समान 5-7 मि.मि. लम्बे पूर्व अंकुरित कल्ले निकल जाये, यदि 10-12 दिन से ज्यादा पहले आलू शीतगृह से निकालते हैं तो कल्ले ज्यादा लम्बे हो जाएंगे व बुवाई के समय टूटेंगे तथा देरी से निकालने पर कल्ले बिलकुल छोटे होंगे व अंकुरण देर से होगा।

25-40 ग्राम वजन के कंद बुवाई के लिए उपयुक्त रहते हैं। उन आलू कंदों को जिनका वजन 50 ग्राम से अधिक हो, काटकर प्रयोग में ले सकते हैं इस बात का ध्यान रखे की आलू के टुकड़ो को 0.2% मेंकोजेब के घो लमें तकरीबन 10-15 मिनट तक डुबोए तत्पछ्चात निकालकर छायादार एवं हवादार स्थान पर 24-34 घंटे रखकर बाद में बोदे, ध्यानर हें की कटा हुआ भाग भूमि की तरफ निचे हो।जिन क्षेत्रों में भूमि जनित रोग लगने की संभावना अधिक हो वहां साबुत बीज आलू ही काम में लेने चहिए।

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बीज कंदो की मात्रा एवं कंद:-

कंदो की मात्रा के आकार एवं भार के अनुसार घट-बढ़ सकती हैं परन्तु सामान्य परिस्तिथियों में स्वस्थ बीज कंद 25-40 ग्राम भार वाले तकरीबन 25-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पर्याप्त हैं।

बीज कंद उपचार:-

कंदो को काली रुसी (ब्लेक स्कर्फ) व अन्य कंद जनित एवं मृदा जनित रोगो से बचाव हेतु ३% बोरिक अम्ल के घोल में 20-30 मिनट तक डुबोकर उपचारित करें। (घोल बनाने के लिए तेल वाला ड्रम या प्लास्टिक का बर्तन काम में लेवे।दवा को पहले थोड़े हल्के गर्म पानी में अच्छी तरह घोलकर फिर बाकि पानी में मिला देनी चाहिए )या बुवाई से पूर्व आलुओं पर छिड़काव करें।तत्पश्चात छायादार स्थान पर सुखाकर बुवाई करें। एक बार बनाये घोल को 10 बार तक प्रयोग कर सकते हैं।

बीज कंदों को 1 ग्राम इमीडेक्लोप्रिड प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10 मिनट डुबोने के बाद बुवाई करने से तना ऊतक क्षय रोग पर प्रभावी नियंत्रण होता हैं। आलू की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए 1% यूरिया एवं 1 % सोडियमबाईकार्बोनेट के घोल में ५ मिनट तक डुबोये, इसके बाद कंदों को एजेक्टोबेक्टर एवं पि.एस.बी. जीवाणु कल्चर से उपचारित कर बुवाई करें।

बीज आलू की सुषुप्तावस्था तोडना:-

आलू की खुदाई के कुछ दिनों तक आलू को बिजाई हेतु प्रयोग नहीं कर सकते क्यंकि यह सुषुप्तावस्था में रहते हैं। परन्तु कई बार ऐसी परिस्थिति आ जाती हैं की कुछ दिन पहले खुदाई किए गए ताजे आलू को दूसरी फसल लेने हेतु बुवाई करनी पड़ती हैं।अतः साबुत बीज आलू की सुषुप्तावस्था तोड़ने के लिए आलू पर 3-4 से.मी. लम्बे व 1-2मि.मि. गहरे 2-3 कट लगाए। इस बात का ध्यान रखे की कट लगाते समय आँखों को नुकसान न हो।

साबुत व कटे आलू के टुकड़ों को एक घंटे तक 1% थायोयूरिया और एक मिली ग्राम जिब्रेलिकअम्ल प्रति लीटर घोल में 1 घंटे तक उपचारित करें। 40 की.ग्रा. आलू को एक ही बार में भिगोने के लिए 20 लीटर घोल पर्याप्त रहेगा। भिगोने के बाद उन्हें बाहर निकाल कर सुखाए तथा 1-2 सप्ताह की अवधि में बुवाई कर दे।

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बुवाई का तरीका:-

आलू की बुवाई मुख्यतः दो तरीकों से की जाती हैं।

पहले 15-20 से.मी. ऊँची मेड़ें, 45-60 से.मी. दुरी पर बना लेते हैं। तत्प्श्चात उन्हें दोनों तरफ या बिच में 15-20 से.मी. दुरी पर आलू 7-8 से.मी.गहराई पर खुरपी की सहायता से लगा देते हैं।

दूसरी विधि में खेत में उथली नालिया (5-7से.मी. गहरी) बनाकर, उनमे 20-20 से.मी. दुरी पर बीज आलू रखकर दो कतारों के बिच हल चलाकर आलू को दबा देते हैं अथवा नालिया बनाए बिना ही आलू 5-7 से.मी.गहरा बोकर मेड बना देते हैं।

पहाड़ी क्षेत्रों में आलू की बिजाई/बुवाई 4 मीटर चौड़ी छोटी- छोटी क्यारियों में लाइने (45-60 से.मी. की दुरी) बनाकर करनी चाहिए तथा ढलान 8-10% से अधिक नहीं होना चाहिए। लाइनों में आलू बीज को पहले बिछा कर मिट्टी में दबा देना चाहिए तथा उन पर फावड़े की मदद से लगभग 3-4 इंच (8-10से.मी.) मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

उन्नत किस्में:-

उचित किस्म का चुनाव एक महत्वपूर्ण कार्य हैं क्यों कि गलत किस्म के चुनाव से न केवल उत्पादकता प्रभावित होती हैं बल्कि आर्थिक हानि भी होती हैं अतः जलवायु विशेष के अनुसार उचित किस्म का चयन करना चाहिए।

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उर्वरक एवं खाद:-

आलू उत्पादन में फसल भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्वों को ले लेती हैं अतः पोषक तत्वों की कमी होने से उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।सामान्यतया मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों को देना चाहिए।यदि मृदा परीक्षण संभव न हो पाए तो ऐसी स्थिति में 25 टन गोबर की खाद खेत की तैयारी करते समय भूमि में भली प्रकार मिलाए।

तत्पश्चात पहाड़ी क्षेत्रों में नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश क्रमशः 150-200: 80-100: 80-100  की.ग्रा./हैक. की दर से एवं मैदानी क्षेत्रों में नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश क्रमशः 150-187.5:100-125:100-125 की.ग्रा./हैक. की दर से देना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में नत्रजन की 2/3 मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय डालना चाहिए एवं शेष 1/3 नत्रजन मिटटी चढ़ाते समय डालना चाहिए।जबकि मैदानी क्षेत्रों में नत्रजन की 1/2 मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूर्ण मात्रा बुवाई के समय डालना चाहिए।

ध्यान रखें की बुवाई पर नत्रजन प्राप्ति के लिए किसान खाद (कैल्शियम, अमोनियमनाइट्रेट) या अमोनियम सल्फेट और मिटटी चढ़ाते समय यूरिया उपयुक्त रहती हैं। बुवाई पर यूरिया प्रयोग न लेवे क्योंकि इससे अंकुर जल जाते हैं या कई बार कंद सड़ जाते हैं। याद रहे की यूरिया देने के तुरंत बाद सिंचाई न करें वरना नत्रजन बहकर जमीन में चला जाएगा।कुछ किसान नत्रजन की सारी मात्रा डी.ए.पी. देना हे तो फास्फोरस की मात्रा को सिफारिश अनुसार देवे व शेष नत्रजन को अमोनियम सल्फेट के माध्यम से देवे। हरी खाद व कालचककाउपयोगकरने से भी उपज में आशातीत वृद्धि होती हैं अतः इसके उपयोग पर भी ध्यान देना चाहिए।

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आलू की फसल में खरपतवार प्रबंधन:-

आलू की फसल में पाए जाने वाले खरपतवार लगभग 43 किग्रा.नत्रजन, 8 फॉस्फोरस एवं 49 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर लेते है साथ ही ये पानी, प्रकाश वस्थान के लिए प्रति स्पर्धा करते है। कुछ खरपतवार कीट एवं रोग पनपने में मदद करते है। इन सभी कारण से उपज में 10-80 प्रतिशत तक कमी आ जाती है।

इसलिए खरपतवार प्रबंधन पर ध्यान देना आवश्यक है। आलू की फसल में मुख्य रूप से आने वाले खरपतवारों में पौआ, जंगली पालक, जंगली गाजर, जंगली प्रभामंडल, बथुआ, कृष्णा नील, सतगढ़िया आदि शामिल हैं। इन्हें तीन मुख्य तरीकों से नियंत्रित किया जा सकता है।

कृषि पद्धतियों के माध्यम से:-

  1. उचित फसल चक्र अपनाना
  2. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई
  3. उचित मात्रा में खाद डालें एवं लाइन में ही उर्वरक डालना
  4. पलेवा करके बुवाई करना
यांत्रिक साधनों से:-

यांत्रिक विधि द्वारा खरपतवारों का नियंत्रण यांत्रिक साधनों द्वारा किया जाता है। जैसे निराई, गुड़ाई, बुवाई के 20-25 दिन बाद और मिट्टी की जुताई के 30-35 दिन बाद आदि।

रासायनिक विधि से:-

उपयोग के समय के अनुसार खरपतवारनाशी को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. आलू की बुवाई से पहले – फ्लुक्लोरालिन को 10 किग्रा/हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें।
  2. आलू की बुवाई के बाद – लेकिन आलू और खरपतवार के बढ़ने से पहले मुख्य रूप से निम्नलिखित खरपतवारनाशी इस श्रेणी में आते हैं। बुवाई के 3-5 दिन बाद छिड़काव करें। (सक्रिय अवयवों में सभी मात्राएँ)
  • मेट्रिब्यूसिन – 500 ग्राम/हेक्टेयर (चौड़ी पत्ती वाली घास के लिए)
  • पेंडीमेथालिन – लीटर प्रति हेक्टेयर (चौड़ी पत्ती वाली घास के लिए)
  • एसोप्रोटूरॉन – 500 ग्राम/हेक्टेयर (केवल घास के लिए)
  • अलाक्लोर – 1 लीटर प्रति हेक्टेयर (पट्टी और खरपतवार के लिए)
खरपतवार उगने के बाद:-
  • इस अवस्था में पेराक्वेट का छिड़काव 500-1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रारंभिक पोस्टमर्जेंस (आलू के 5% अंकुरण तक) के रूप में करें।
  • सभी दवाओं को 800-1000 लीटर पानी/हेक्टेयर में मिलाकर स्प्रे करें।
  • क्लेइंग
  • आलू की खेती में यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि इसे नहीं अपनाया जाता है, तो कंद बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है साथ ही प्रकाश बल्बों पर सूर्य का पड़ना उन्हें शुष्क (सोलनिन) बना देता है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

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जल प्रबंधन:-

आलू की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ का विन्यास उथला होता है और यह कम अवधि की, अधिक पत्तेदार फसल होती है। इसलिए पत्तियों को स्वस्थ रखने के लिए उन्हें लगातार उचित मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। आलू की फसल में पानी की मांग 400-600 मिली. जो जलवायु, मिट्टी के प्रकार, किस्म और वृद्धि की अवधि पर निर्भर करता है। इसलिए, पौधों की उचित वृद्धि और विकास के लिए 7-10 सिंचाई की आवश्यकता होती है।

आम तौर पर पलेवा द्वारा तैयार खेत में आलू बोने के बाद फसल की नालियों को 3/4 भाग से अधिक न भरें। आलू की फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए पहली सिंचाई बुवाई के 7 दिन बाद मिट्टी में और 8-10 दिन बाद भारी मिट्टी में करें। साथ ही दूसरी और तीसरी सिंचाई क्रमशः 20-21 दिनों के बाद और 30-35 दिनों के बाद (मिट्टी के समय) करें। इसके बाद बची हुई सिंचाई 10-15 दिनों के बाद भारी मिट्टी में और 7-10 दिनों के बाद हल्की मिट्टी में करें। जैसे-जैसे फसल पकती है, सिंचाई के अंतराल में वृद्धि करें। खुदाई से 15-20 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें, अन्यथा उपज की गुणवत्ता प्रभावित होगी।

पाला पड़ने की संभावना हो तो हल्की सिंचाई करना लाभकारी होता है।

आलू में सिंचाई के लिए पारंपरिक क्यारी विधि का प्रयोग किया जाता है, लेकिन उन्नत विधियों का प्रयोग किया जाए, छिड़काव या ड्रिप विधि का उपयोग किया जाता है, तो 40-50% पानी की बचत होती है साथ ही उपज में भी 25-50% की वृद्धि होती है।

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डीहॉल्मिंग:-

फसल के कंदो की त्वचा को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए ऊपर के पत्तो को काटकर किस्मों अनुसार 75 एवं 90 दिन की अवस्था पर करते हैं। इसके 15 दिन बाद खुदाई करते हैं।

खुदाई:-

डीहॉल्मिंग के 15 दिन उपरांत हाथ एवं ट्रेक्टर द्वारा या हल के द्वारा खुदाई करते हैं।यदि आलू की त्वचा कच्ची होतो खुदाई उचित अवस्था आने पर ही करें।साथ ही खुदाई के समय मिट्टी कंदों से अधिक न चिपके।मैदानी क्षेत्रों में खुदाई फरवरी मास तक कर लेनी चाहिए।क्योंकि अधिक तापमान होने पर काला गलन रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।

ग्रेडिंग व सोर्टिंग (छटनी):-

उपज को व्यवस्थित करने के लिए ग्रेडिंग व सोर्टिँग करते हैं इसके लिए मुख्यतयाः तीन ग्रेड बनाते हैं।

  • प्रथम ग्रेड-75 ग्राम या इससे अधिक भार वाले कंद।
  • द्वितीय ग्रेड-50-75 ग्राम तक के कंद।
  • तृतीय ग्रेड-20 ग्राम में कम भार वाले (इन्हे बीज आलू की तरह काम नहीं ले सकते क्योंकि फसल में वायरस जनित रोग होने की संभावना बढ़ जाती हैं)
  • सोर्टिँग के समय कटे हुए, बीमारी ग्रस्त व कीट से संक्रमित आलू को अलग छटनी कर देवे एवं इनका निस्तारण तुरंत करें।

उपज:-

सामान्यतः उपज किस्म व उनकी अवधि पर निर्भर करती हैं। 75/90 दिन की अवधि वाली से 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर एवं 90/105 दिन की फसल अवधि वाली किस्मों से 250-300 क्विंटल. हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं।

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