kheti kisani उन्नत खेती औषधीय फसलों की खेती

इसबगोल की जैविक खेती एवं उत्पादन तकनीक

इसबगोल
Written by Vijay Gaderi

इसबगोल एक महत्वपूर्ण नगदी औषधीय फसल हैं जो रबी के मौसम में उगाई जाती हैं। यह प्रमुख रूप से पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में उगाया जाता हैं। पिछले कुछ वर्षों में इसका उत्पादन मध्यप्रेदश में भी किया जाने लगा हैं। इसकी राष्ट्रिय व अंतराष्ट्रीय बाजार में मांग हैं। इसके निर्यात से लगभग ५०,००० हेक्टेयर में की जाती हैं।

ईसबगोल

औषधीय गुण एवं उपयोग:-

भारत इसबगोल का सर्वाधिक उत्पादन एवं निर्यातक देश हैं। विश्व बाजार में जैविक पद्धति से उगाये गये इसबगोल की मांग अत्यधिक हैं। वस्तुतः इसबगोल के बीजों के ऊपर पाया जाने वाला छिलका ही उसका औषधीय उत्पाद होता हैं। इसका औषधीय उपयोग पेट की सफाई, कब्जियत, अल्सर, बवासीर, दस्त तथा आंव पेचिस जैसी शारीरिक बिमारियों को दूर करने में आयुर्वेदिक औषधि के रूप में किया जाता हैं।

साथ ही इसका उपयोग प्रिंटिंग, खाद्द्य प्रसंस्करण, आइसक्रीम तथा रंगरोगन आदि जैसे उद्योगों के काम में भी किया जाता हैं। जिससे किसानों को सामाजिक एवं आर्थिक फायदा तो होता ही हैं साथ ही जनता को खाद्द्य एवं पोषण सुरक्षा प्रदान भी करता हैं। इसबगोल को कम पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं इसलिए इसबगोल के जैविक उत्पादन हेतु पोषक पूर्ति जैविक खादों से आसानी से कर सकते हैं।

Read Also:- अरहर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

जैविक उत्पादन की आवश्यकता:-

चूँकि इस फसल को पोषक तत्वों की कम आवश्यकता होती हैं अतः इस फसल को आसानी से जैविक पद्धति में रूपांतरण अवधि के दौरान बिना किसी उपज में कमी के उगाया जा सकता हैं।

  • जैविक विधि से खेती करने पर मृदा उर्वरता के साथ-साथ मृदा में होने वाली जैविक क्रियाओं में सुधार होता हैं।
  • जैविक विधि से फसल उत्पादन करने पर किसानों को लागत में कमी आती हैं। क्योंकि खादों एवं कीटों की रोकथाम जैविक विधि से स्वतः ही हो जाती हैं।
  • यदि इसबगोल का उत्पादन जैविक विधि से किया जाए तो इसकी मांग बाजार में और भी अत्यधिक हो जाती हैं।
  • जैविक इसबगोल का बाजार मूल्य उचित मिलता हैं इसलिए किसानों की आय में वृद्धि हो जाती हैं।
  • जैविक खेती से फार्म अवशिष्ट एवं कचरे के उचित प्रबंधन द्वारा न केवल प्राकृतिक संतुलित बना रहता हैं बल्कि पर्यावरण प्रदूषण भी कम होता हैं।

जलवायु:-

इसबगोल की खेती के लिए ठंडा व शुष्क मौसम सर्वोत्तम होता हैं। अतः इसकी खेती को सम्पूर्ण काल में खुला आसमान तथा शुष्क मौसम की आवश्यकता होती हैं। किन्तु यदि पकते समय रात का तापक्रम अधिक होता हैं साथ ही हल्की

बौछार पड़ती हैं तो इसबगोल की बाली से बीज जमीन पर बिखर कर फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

Read Also:- कांगणी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

भूमि:-

इसबगोल की खेती के लिए हल्की बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती हैं क्योंकि इस मिट्टी में जल निकास अच्छी तरह होता हैं। इसके अलावा चिकनी दोमट, हल्की से भारी काली मिट्टी में भी उगाया जा सकता हैं, बशर्ते जल निकास की व्यवस्था उचित हो।

खेत की तैयारी:-

खरीफ फसलों की कटाई के पश्चात जिन क्षेत्रों में सोयाबीन का उत्पादन होता हैं वहां पर कटाई के पश्चात मिट्टी की अवस्था के आधार पर हेरों या कल्टीवेटर से जुताई करके पाटा चलाना चाहिये ताकि मिट्टी भर-भूरी हो जाए।

किस्मों का चयन:-

जैविक खेती करते समय ऐसी किस्मों का चयन करना चाहिए जोकी भूमि एवं जलवायु के अनुकूल होने के साथ-साथ कीटों एवं रोगों के लिए प्रतिरोधक हो।किस्मों के चयन में अनुवांशिकता की विविधता को भी ध्यान में रखना चाहिए।यदि जैविक प्रमाणित बीज की उपलधता नहीं होतो रसायन के बिना उपचारित सामान्य बीज का उपयोग कर सकते हैं।

इसबगोल की फसल के लिए प्रमुख किस्में- इसबगोल-1 (जी.आई.-1 ), गुजरात इसबगोल-2 (जी.आई.-2), हरियाणा इसबगोल-5  (एच.आई.-5) और जवाहर इसबगोल-4 (जे.आई.-4 ) ट्राम्बे सेलेक्शन (1-10) और इ.सी. 124 एवं 345 हैं।इसमें जवाहर इसबगोल-4 अधिक उपज (1300-1500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) देने वाली किस्म हैं। (मुर्गी खाने की खाद को उपयोग करने से पहले 45-60 दिन तक खेत में सडाना चाहिए)

Read Also:- अजवाइन की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

बोने का समय:-

इसबगोल की बुवाई नवम्बर माह के प्रथम सप्ताह से लेकर अंतिम सप्ताह तक की जा सकती हैं। इसकी देरी से बुवाई करने पर कम उत्पादन के अलावा कीटों एवं बिमारियों का प्रकोप भी हो सकता हैं।

बोने का तरीका:-

वातावरण की नत्रजन के प्रभावशाली जैव यौगिकीकरण के लिए इसबगोल के बीजको एजेक्टोबेक्टर कल्चर से उपचारित करते हैं। फास्फोरस विलयकारी जीवाणु (पी.एस.बी.) कल्चर से बीज को उपचारित करके मिट्टी में फॉस्फोरस की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता हैं। इन कल्चर को बुवाई से पहले बीज एवं बारीक़ मिट्टी या रेत या छनी हुई गोबर की खाद के साथ मिलाया जाना चाहिये।

इसकी बीज की दर 4-6 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर रखते हुए सीड ड्रिल या हल के पीछे ३०से.मी. की दुरी पर कतारों में तथा 2-3 से.मी. गहराई पर बुवाई करनी चाहिये।इसके बीज हल्के एवं छोटे होते हैं, अतः गोबर की खाद के साथ मिलाकर बुवाई करते हैं।

पोषण प्रबंधन:-

जैविक खादों एवं अन्य पोषक तत्वों के पोषण के लिए जैविक साधनों को अधिक से अधिक खेत पर ही बनाकर पोषण प्रबंधन करना चाहिए। गोबर की खाद, देशी खाद, केंचुआ खाद, गोबर गैस की खाद, मूत्र, फसल अवशेष एवं हरी खाद, को जैविक कृषि में तभी इस्तेमाल कर सकते हैं, जब इन्हे खेत पर ही तैयार किया गया हो।

खेत से बहार तैयार की गई खादों को प्रयोग नहीं करना चाहिए। कुछ प्रमुख खादों में पाई जाने वाले पोषक तत्वों के आधार पर इसबगोल के लिए वैज्ञानिकों द्वारा सरणी एक के अनुसार जैविक पोषण प्रबंध बताया हैं जो की पौधे के विकास एवं वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

स्थानीय उपब्धता के आधार पर उपरोक्त खादों में से सम्मिलित रूप से कोई एक अथवा दो या तीन खादों को सम्मिलित रूप से उपयोग कर सकते हैं।जब जैविक खादों का सम्मिलित उपयोग हो रहा हो तो इस बात का प्रमुख रूप से ध्यान रखना चाहिए की फसल को कुल मिलाकर 20 की.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर मिले।जैविक खादों का उपयोग बुवाई के 10-15 दिन पहले करना चाहिए।

Read Also:- तिल की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

फसल सुरक्षा:-

गर्मी में गहरी जुताई के अलावा स्वस्थ एवं अच्छी इसबगोल की पौध संख्या खरपतवारों की वृद्धि कुछ हद तक कम करती हैं।इसके अलावा जरूरत पड़ने पर बुवाई के 20-25 दिन पश्चात या पलेवा करना चाहिये जिससे की बीजों का अंकुरण अच्छी तरह से हो, साथ ही बुवाई के ठीक बाद में सिंचाई करने से बीजों के बहने या ढकने की समस्या से छुटकारा मिल जाए।

अगर बीजों का अंकुरण सही तरह से नहीं हो पाया हैं तो बुवाई के 6-7 दिन पश्चात एक सिंचाई करनी चाहिए। कीटों एवं बिमारियों के सफलतापूर्वक प्रबंधन के लिए प्रतिरोधक या सहनशील किस्मों को उगाना चाहिए। इसबगोल की बुवाई के समय खेत में ट्राइकोडर्मा को 5 ग्राम प्रति हैक. की दर से उपयोग करने से उकठा बीमारी से बचाव हो जाता हैं।

फसल की कटाई एवं गहाई:-

इसबगोल की साधारणतया 110 से 120 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं जब पत्तियों का रंग पीला तथा लाल पड़ने लगे तथा दाने हाथ से मसलने पर ही निकलने लगे तो इसकी परिपक्वता पूर्ण हो जाती हैं। इसकी कटा ईके पश्चात एवं गहाई के पूर्व फसल की ढेरियों को 2-3 दिन धुप में सुखाते हैं।

गहाई के पूर्व ढेरियों पर हल्का सा पानी छिड़क देते हैं जिससे दाने आसानी से अलग हो जाते हैं। ओसाई करने के बाद भूसा अलग करके साफ बीज प्राप्त कर लिए जाते हैं।

उपज:-

जैविक खेती से इसबगोल की खेती करने पर प्राप्त उपज सामान्य रासायनिक खेती के बराबर या कभी-कभी अधिक प्राप्त होती हैं।इसबगोल की फसल से लगभग 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं। इसके बीज की भूसी जो वजन में लगभग 20% होती हैं। वही औषधी निर्माण में प्रयुक्त होती हैं।

एक हेक्टेयर की खेती से लगभग 5 क्विंटल भूसी प्राप्त होती हैं।इस फसल से प्राप्त सूखा चारा पशुओं को खिलाने के काम आता हैं।

उपसंहार:-

यदि जैविक पद्धति से इसबगोल की खेती की जाए तो मृदा उत्पादकता एवं जैविक पद्धति द्वारा उगाये गये उत्पाद की गुणवत्ता में बढ़ोतरी पाई गई हैं।यदि किसान अपने उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करके जैविक खेती करें तो निश्चित ही किसानों को ज्यादा लाभ प्राप्त होगा।

Read Also:- मूंगफली की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

About the author

Vijay Gaderi

Leave a Reply

%d bloggers like this: