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जायद मूंगफली की खेती एवं उत्पादन तकनीक

जायद मूंगफली
Written by Bheru Lal Gaderi

जायद मूंगफली की बुवाई 5 मार्च से 15 मार्च तक कर लेनी चाहिए। देरी से बुवाई करने पर बारिश शुरू होने की स्थिति में खुदाई के बाद इसकी फलियों के सूखने की समस्या रहती है।

जायद मूंगफली

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जायद मूंगफली के लिए उन्नत किस्में:-

टी. ए. जी. 24 (1992):-

यह किस्म 120-125 दिन में पककर तैयार होती है। इस किस्म की उपज 30-35 क्विंटल प्रति हैक्टर तथा इसकी फलियों में दानों का अनुपात 70 प्रतिशत है। इसके 100 दानों को वजन 38 ग्राम एवं तेल की मात्रा 48-50 प्रतिशत होती है। यह किस्म पत्ती धब्बा रोग से प्रतिरोधी है।

डी. एच. 86:-

यह किस्म 125-128 दिन में पककर 30-32 क्विंटल प्रति हैक्टर की उपज देती है। इसमें तेल की मात्रा 48-50 प्रतिशत एवं 100 दानों का वजन 38 ग्राम होता है। इसकी फलियों में दानों का अनुपात 70 प्रतिशत होता है। यह किस्म शीर्ष गलन प्रतिरोधी है।

जी जी 2 (1984):-

अल्प अवधि वाली यह झुमका किस्म 100-110 दिन में पककर 31 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज देती है। फलियां दो दाने वाली एवं दाने मोटे होते हैं जिनमें 49 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। 100 दानों का वजन 36 ग्राम होता है।

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टी.जी.- 37ए:-

यह मूंगफली की झुमका किस्म हैं। यह किस्म 95-98 दिन में पककर तैयार होती हैं। इसकी औसत उपज 28-30 क्वि. प्रति हैक्टर एंव तेल की मात्रा 49-50 प्रतिशत तथा 100 दानो का वजन 40-44 ग्राम होता हैं। यह किस्म अगेती एंव पिछेती धब्बा, कलिका विशाणु रोग, ग्रीवा विगलन एंव तना गलन रोग से सामान्य प्रतिरोधी हैं।

प्रताप राज मूंगफली (2011):-

यह किस्म अखिल भारतीय मूंगफली सुधार परियोजना, उदयपुर द्वारा विकसित की गई है। इस किस्म की उपज (शुष्क फलिया: 17-25 क्विंटल प्रति हैक्टर) है।

पकाव अवधि:-

95 से 99 दिन है। फलियों में दानों का अनुपात 68.70 प्रतिशत है। 100 दानों का वजन 40 से 44 ग्राम है। तेल की मात्रा 48-50 प्रतिशत है।

रोग प्रतिरोधी:-

यह किस्म तम्बाकू की इल्ली, पर्ण सुरंगक एवं पर्णजीवी कीटों से मध्यम प्रतिरोधी है। यह किस्म पत्ती धब्बा रोग, मूंगफली का कलिका क्षय विषाणु रोग से मध्यम प्रतिरोधी है।

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टी.जी. 37ए (2004):-

यह मूंगफली की एक झुमका किस्म है। यह किस्म 95-98 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी शुष्क फलियों की औसत उपज 28-30 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। इसकी फलियों में दानों का अनुपात लगभग 71 प्रतिशत एवं तेल की मात्रा 49 से 50 प्रतिशत है। इसके 100 दानों का वजन 40 से 44 ग्राम होता है।

रोग प्ररिरोधी:-

यह किस्म अगेती एवं पिछेती धब्बा, कलिका विषाणु रोग, ग्रीवा विगलन एवं तना गलन रोग से सामान्य प्रतिरोधी है। इस किस्म की बारानी क्षेत्रों में औसत उपज 15-20 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है।

खेत की तैयारी एवं भूमि उपचार :-

इसकी खेती रेतीली दोमट भूमि में सफलता पूर्वक की जाती है। जैसे ही खेत खाली हो 2-3 जुताईयां कर खेत तैयार कर लेवें। दीमक की रोकथाम हेतु क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 कि. ग्रा. प्रति हैक्टर भूमि तैयार करते समय खेत में मिलायें।

बीज, बीजोपचार एवं बुवाई :-

100-120 कि.ग्रा. बीज (गुली ) प्रति हैक्टर बोये। जायद मूंगफली की बुवाई फरवरी के दूसरे पखवाड़े में करें। कतारों में 25-30 सेन्टीमीटर की दूरी पर 5 सेन्टीमीटर की गहराई पर मूंगफली की बुवाई करें। पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेन्टीमीटर रखें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी अच्छे अंकुरण के लिये आवश्यक है।

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बीज उपचार:-

बुवाई से पहले प्रति कि.ग्रा. बीज को 6-8 ग्राम ट्राईकोड्रमा या 3 ग्राम थाईरम या 2 ग्राम मैन्कोजेब या कार्बेण्डेजिम से उपचारित करके बोना चाहिये। मूंगफली के बीजों को राइजोबियम व पीएसबी कल्चर से उपचारित करें।

खाद एवं उर्वरक :-

मूंगफली के लिये 10-15 टन प्रति हैक्टर सड़ी हुई गोबर की खाद बुवाई से पूर्व खेत में मिलावें। इसके अतिरिक्त बीज की बुवाई के समय पहले 15 कि.ग्रा. नत्रजन तथा 40-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टर ऊर कर देनी चाहिए। फॉस्फोरस की पूर्ति सिंगल सुपर फॉस्फेट से करना लाभदायक रहता है।

जिन खेतों में मूंगफली में पीलिया रोग होता है वहां तीन साल में एक बार बुवाई से पूर्व 250 कि.ग्रा. जिप्सम या 40 कि.ग्रा. गंधक चूर्ण प्रति हैक्टर डालना आवश्यक है। इसके अभाव में गंधक के अम्ल के 0.1 प्रतिशत घोल का फसल में फूल आने से पहले एवं पूरे फूल आने के बाद दूसरी बार छिडकाव करके भी पीलिये का नियन्त्रण किया जा सकता है। इस घोल में चिपकने वाला पदार्थ जैसे साबुन आदि अवश्य मिलावें।

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सिंचाई एवं निराई गुड़ाई :-

साधारणतया जायद की फसल को पलेवा के अतिरिक्त 6 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। इस फसल में फूल निकलते समय, सुईयां बनते समय एवं फली का विकास होते समय सिंचाई देना बहुत आवश्यक है। क्रान्तिक अवस्थाओं, फूल आने के पूर्व तथा फली में दाना बनते समय सिंचाई अवश्य करें। तापमान एवं भूमि में उपलब्ध नमी के अनुसार अतिरिक्त सिंचाई देवें ।

निराई गुड़ाई:-

बुवाई के 20 से 25 दिन बाद निराई गुड़ाई कर फसल को खरपतवार रहित करें। पौधों में सुईयां बनना शुरू होने के बाद गुड़ाई न करें।

खरपतवार नियन्त्रण:-

खरपतवार नियन्त्रण हेतु प्रति हैक्टर 0.75 किलोग्राम फ्लूक्लोरेलिन सक्रिय तत्व को 600 लीटर पानी में घोल कर बुवाई से पहले छिड़काव कर भूमि में मिला देवें तथा बाद में बीज की बुवाई करें। मूंगफली की खड़ी फसल में खरपतवार नियन्त्रण हेतु अंकुरण को 15-20 दिन पश्चात इमेजोथाइपर 10 प्रतिशत एस. एल. 100 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर को 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। बुवाई के 30 से 35 दिन बाद पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ावें।

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पौध संरक्षण:-

मोयला, तेला एवं सफेद मक्खी इनकी रोकथाम हेतु मिथाईल पैराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से भुरकाव करें। क्राऊन रॉट : इस रोग से बचाव के लिये 3 ग्राम थाइरम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।

टिक्का रोग रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेण्डेजिम आधा ग्राम या मैकोजेब दो ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से 500 से 600 लीटर घोल का प्रति हैक्टर छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 15 दिन के बाद करें।

खुदाई:-

पौधों की पत्तियाँ गीली पड़ने लगे तो खेत की हल्की सिंचाई करें एवं बाह आने पर पौधों को उखाड़ लेवें। इन पौधों को ढेर के रूप में 7-10 दिन तक धूप में सुखावे और उसके बाद मूंगफली की फलियों को अलग कर निकाल लीजिये।

जायद मूंगफली भण्डारण :-

जायद मूंगफली को सुखाकर ही भण्डारण में रखें। किसी भी हालत में मूंगफली के दानों में 8-10 प्रतिशत से अधिक नमी की मात्रा नहीं होनी चाहिये अन्यथा बीज पर एस्परजिलस नामक फफूंद लगने लगती है, जिससे एक विषैला पदार्थ (एफ्लाटोक्सिन) जमा होना शुरू हो जाता है। इससे ग्रस्त बीजों को खाना घातक सिद्ध होता है।

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