kheti kisani उन्नत खेती

धान की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

धान
Written by Vijay Gaderi

रोपाई हेतु उन्नत किस्में एवं उनकी विशेषताऐं

पुसा सुगधा-5 (2004):-

यह किस्म धान की मध्यम अवधि में पकने वाली बासमती गुणों से युक्त, मध्यम ऊँचाई वाली किस्म है। यह सुगधिंत, पतले लम्बे दाने वाली किस्म जो की फुदका एवं अंगमारी से प्रतिरोधक है। इसका उत्पादन 47-50 क्विंटल प्रति हैक्टर होता है।

धान

पुसा सुगंधा-4 (2005):-

यह एक बासमती किस्म है, जो कि मध्यम अवधि (135-140 दिन) में पकती है। इसका पौधा 97 से.मी. लम्बा होता है। यह एक सुगंधित, पतले दाने व उच्च गुणवत्ता वाली किस्म है। इसमें ब्लास्ट, अंगमारी एवं फुदके से प्रतिरोधकता पाई गयी है। इसका उत्पादन 50-55 क्विंटल प्रति हैक्टर तक होता है।

खुशबु (1995):-

शीघ्र पकने वाली धान की यह किस्म लगभग 118–125 दिन में पकती है। यह मध्यम कद की है जो 126 किग्रा नाइट्रोजन प्रति है. देने पर भी आड़ी नहीं गिरती हैं। बाली में किसी किसी दाने पर छोटा काँटा (तिकुर) होता है। इसका चावल लगभग 7-7.5 मिली मीटर लम्बा सफेद व अत्यधिक खुशबुदार है। यह किस्म कीड़ा व बीमारियों से प्रतिरोधी क्षमता रखती है।

माही सुगन्धा (1995):-

बासमती धान की अर्द्ध बौनी एवं अधिक पैदावार देने वाली है। इस किस्म की औसत पैदावार 35-40 क्विंटल प्रति है. होती है। इस किस्म का दाना लम्बा व पतला तथा खाने में स्वादिष्ट होता हैं। इसका तना काफी मजबूत होता है जिससे फसल आडी नहीं गिरती हैं। 130-135 दिन में पकने वाली इस किस्म में कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता हैं।

पी.एच.बी. 71 (1997) :-

संकर धान की अर्द्ध बौनी एवं अधिक पैदावार देने वाली यह किस्म 130-135 दिन में पक कर तैयार होती हैं। इस किस्म की औसत उपज 55-60 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। इसका चांवल लम्बा व पतला होता है यह किस्म फुदका एवं ब्लास्ट से प्रतिरोधी तथा तना छेदक एवं जीवाणु पत्ताअंगमारी से मध्यम प्रतिरोधी है।

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इम्प्रूव्ड पुसा बासमती 1 (पी-1460) (2007):-

यह बासमती धान की अर्ध बौनी (100-110 सेमी. ऊंचाई) एवं इसका दाना पतला, लम्बा, चमकीला एवं अत्यधिक खुशबुदार होता है। यह किस्म 130-138 दिन में पक कर औसतन उपज 40-45 क्विटल प्रति हैक्टर देती हैं। सह ब्लास्ट, तनाछेदक, जीवाणु अंगमारी एवं कीटों से मध्यम प्रतिरोधी पायी गयी हैं।

सीधी बुवाई उन्नत किस्में एवं उनकी विशेषताऐं

पूसा 2-21 (1976):-

इस किस्म का दाना मोटा व गोल होता है। इसकी पैदावार 45 से 50 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। यह किस्म 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

बाला (1974):-

इस किस्म का दाना छोटा व गोल होता है। इसकी उत्पादन क्षमता 40 से 45 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह किस्म 105 से 110 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

बीजोपचार:-

थोथे बीज को निकालने के लिए 2 प्रतिशत नमक के घोल में डालकर अच्छी प्रकार हिलायें घोल के ऊपर तैरते हल्के बीजों को निकाल दीजिए और पैदे में बैठे बीजों को साफ पानी में धोकर अच्छी प्रकार सुखा लीजिये तत्पश्चात् बुवाई के काम में लीजिये। पहले बीजों को एक प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइड से उपचारित कीजिये 40 लीटर पानी में 400 ग्राम सोडियम हाइपोक्लोराइट घोल कर 25 किलो बीजों को 12 घंटे तक भिगोये रखिये। इस प्रकार बीजोपचार करने से अंकुरण बढ़ता है। बीज कवच पर लगी बीमारियों की रोकथाम होती है तथा धान के पौधे की शीघ्र बढ़वार होने से खरपतवार कम पनपते हैं।

धान के जीवाणु अंगमारी की रोकथाम के लिए 25 किलो बीज के लिये तथा 9 ग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लीन 35 लीटर पानी में घोल लीजिये। इस घोल में बीजों को करीब 12 घंटे तक भिगोइये तथा समय-समय पर डंडे से हिलाते रहिये घोल के ऊपर तैरते हुए थोथे बीजों को निकाल दीजिये तथा शेष नीचे बचे बीजों को बुवाई के काम में लीजिये।

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रोपणी (नर्सरी):-

मध्यम अवधि की किस्मों के लिये रोपणी मई के अन्तिम सप्ताह से जून के दूसरे सप्ताह तक लगायें। शीघ्र पकने वाली किस्मों की रोपणी जून के अन्तिम सप्ताह तक भी लगाई जा सकती है। रोपणी के लिए समतल खेत का चुनाव कीजिये जहाँ पानी उपलब्ध हो। गीली रोपणी बनाने हेतु खेत में पानी भरकर अच्छा गारा तैयार कीजिये।

प्रत्येक 100 वर्ग मीटर नर्सरी के लिए 2 से 3 किलो यूरिया, 3 किलो सुपरफास्फेट व 1 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश उर्वरकों की आवश्यकता होती है। रोपणी में एक से डेढ़ मीटर चौड़ी क्यारियाँ बनाइये। नर्सरी में पौधे पीले पड़ने लगे तो 0.5 प्रतिशत फैरस सल्फेट के घोल का छिड़काव कीजिये।

एक हैक्टर खेत में रोपाई के लिए 25 से 30 किलो बीज से तैयार पौध की ज़रूरत रहती है। तैयार की हुई क्यारियों में उपचारित सूखा बीज 50 से 60 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से छिटक दीजिये। रोपाई हेतु पौधे को क्यारियों में उखाड़ने से 6 दिन पहले एक किलो नत्रजन प्रति 100 वर्ग मीटर रोपणी के हिसाब से और दें। जहाँ रोपाई के लिए पानी मिलना निश्चित समय पर संभव नहीं हो पाता है, वहाँ सूखी रोपणी बनाना उपयुक्त रहता है। ऐसी सूखी अवस्था में जहाँ पौधे मर जाते हैं, वहाँ गीली रोपणी ही तैयार कीजिये।

रोपणी में पौध संरक्षण:-

पौधों को कीड़ों आदि से बचाने हेतु बुवाई के 10-12 दिन बाद 18 लीटर (एक कनस्तर) पानी में 50 मिली लीटर डाईमिथोएट 30 ई.सी. दवा घोलकर छिड़काव कर दीजिये। एक हैक्टर की नर्सरी के लिए 20 कनस्तर घोल की आवश्यकता रहती है। जरूरी होने पर 8-10 दिन बाद दूसरा छिड़काव और कर दीजिये।

नर्सरी में खरपतवारों की रोकथाम के लिए खड़ी फसल हेतु बताये गये खरपतवार नाशकों का उपयोग किया जा सकता है। नर्सरी में ज्यादा काई न आने दें इसके लिए जब तक पौध अच्छी तरह जम न जाये तब तक पानी कम रखिये पौध पीली पड़ने लगे तो नत्रजनीय उर्वरक डालिये। पौध उखाड़ते समय इसकी जड़ों को नुकसान न पहुँचे इसके लिये नर्सरी की मिट्टी को नम बनाये रखें व पानी अधिक देवें। पौध उखाड़ने के बाद उसे पानी में रखिये।

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धान की रोपाई के लिए खेत की तैयारी:-

धान की खेती के लिए समतल खेत का चुनाव करें तथा उसमें जल निकासी का ध्यान रखिये। खेत में पौध रोपाई से तीन सप्ताह पहले 25 से 30 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हैक्टर डाल दीजिये। खेत में पानी भर कर अच्छा गारा तैयार कर लीजिये तथा गारा करते समय आखिरी जुताई के साथ फॉस्फेट व पोटाश की कुल मात्रा व नत्रजन की आधी मात्रा डाल दीजिये। खेत में गारे की मिट्टी अच्छी तरह नीचे बैठ जाने के बाद रोपाई कीजिये।

फसल में पीलीया रोग की रोकथाम के लिए गंधक द्वारा भूमि उपचार भी लाभदायक पाया गया है। अतः रोपणी और खेत दोनों जगह तीन वर्ष में एक बार 250 किलोग्राम गंधक का चूर्ण प्रति हैक्टर दीजिये।

खाद एवं उर्वरक:-

कारक (वर्षा, सचिंत, असिचिंत किस्म,उपयोगिता)

नाइट्रोजन किग्रा / हैक्टरफास्फोरस किग्रा / हैक्टरपोटाश किग्रा./ हैक्टर

अन्य

HYVs

80-120 ½, ¼, ¼ भागों में40-6030-45 
 25 किग्रा. ZnSO4 का प्रयोग करें (दो वर्ष में एक बार)

कम जस्ते वाली मृदा

0.5% ZnSO4 का छिड़काव करें व छिडकाव दोहरा भी सकते है।जस्ते की कमी के कारण धान में खैरा रोग होता है।

ऊसर मृदा

   हरी खाद के रूप में ढैचा बोयें।

 

नत्रजन की आधी मात्रा गारा करते समय दीजिये व शेष नत्रजन की आधी मात्रा रोपाई के 20 से 30 दिन बाद कल्ले निकलने से पूर्व तथा शेष मात्रा रोपाई के 40 से 50 दिन बाद बालियाँ निकलने से पूर्व डालिये।

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ऊसर भूमि में यदि सिंचाई की सुविधा हो तो धान से पूर्व ढैचा की फसल हरी खाद के रूप में लें और बाद में इसे भूमि में मिला दें।

जस्ते की कमी के कारण धान में खैरा रोग हो जाता है जिससे पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं। यूरिया की अधिकतम उपयोगिता हेतु एक भाग यूरिया को 5 भाग नम मिट्टी में मिलाकर 24 घण्टे छाया में रखकर खेत में डालें अथवा यदि कोलतार उपलब्ध हो सके तो 100 किलो यूरिया को 20 किलो नीम की खली, आधा किलो कोलतार व एक लीटर केरोसिन से उपचारित करें।

रोपाई धान की जिस किस्म की फसल जितने माह खेत में खड़ी रहती है, उसकी उतने सप्ताह की पौध रोपाई के लिये उपयुक्त रहती है। अतः साधारणतः 25 से 30 दिन की स्वस्थ पौध रोपाई के काम में लीजिये एवं उसे 20-20 सें.मी. दूर बनी कतारों में 15-15 सें.मी. दूर रोपिये हर एक जगह पर दो तीन पौधे लगाइये। रोपाई तीन सेंटीमीटर से गहरी न हो अन्यथा फुटान कम होने से पैदावार कम होगी पाई बाद 7-10 दिन के अन्दर रिक्त स्थानों पर पौधे लगा दीजिये। रोपाई के समय खेत में अच्छा गारा होना चाहिए। इससे खरपतवार कम पनपेंगे, किन्तु अधिक पानी को निकाल दीजिये। जब पौध खेत में जम जायें तब से उसमें पानी की सतह 5 सें.मी. पर बनाये रखिये।

सीधी बुवाई:-

जिन क्षेत्रों में पौध तैयार न की गई हो अन्यथा किन्हीं कारणों से धान की सीधी बुवाई करनी हो, वहाँ वर्षा होते ही बताई गई मात्रा में खाद व उर्वरक देकर बुवाई हेतु खेत में हल्का गारा तैयार कर लीजिये। पानी के निथरने के बाद खेत में 20-20 सें.मी. की दूरी पर कतारें बनाते हुए बीज 3 सें.मी. गहरा ऊर दीजिये। सीधी बुवाई के लिए वर्षा होते ही खेत को अच्छी तरह तैयार करके बताई गई मात्रा में खाद बिखेर कर पाटा लगाकर बुवाई करें।

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निराई – गुड़ाई:-

घास कुल के खरपतवारों की रोकथाम के लिए रोपाई के 3 से 5 दिन बाद 1.5 किलो बेन्धियोकार्ब का प्रति हैक्टर छिड़काव करें। रोपाई के 5 से 6 दिन बाद ब्यूटाक्लोर 5 प्रतिशत 25 किलो कण प्रति हैक्टर के हिसाब से भी काम में ले सकते हैं। सीधी बुवाई वाले खेतों में खरपतवार नियन्त्रण के लिए बुवाई के 3-4 दिन के अन्दर बेन्धियोकार्ब का 1.5 किलो प्रति हैक्टर छिड़काव करें।

सिंचाई:-

अच्छे जल प्रबन्ध से फसल की फुटान अच्छी होगी, पौधों द्वारा नत्रजन अधिक ली जायेगी खरपतवार कम होंगे और पानी की कुल मात्रा भी कम लगेगी। इसके लिए खेत समतल होना जरूरी है व उसमें 5 सें. मी. पानी भरा रखिये। जब भी खेत में पानी का भराव करें हर बार एक दिन के लिए खेत को खाली रखें, तत्पश्चात् पानी का भराव करें। नत्रजन की मात्रा का खड़ी फसल में तभी उपयोग करें जब खेत खाली रहे। फसल पकने के दो सप्ताह पहले खेत से पानी निकाल दें।

फसल संरक्षण:-

धान की फसल को तना छेदक व फुदका कीड़ों से बचाने के लिए कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत कण 15-18 किलो या फोरेट 10 प्रतिशत कण 10-15 किलो रोपाई के 15-20 दिन बाद खेत में खड़े पानी में छिटक दीजिए। दवाई छिड़कने के बाद खेत से पानी को 5-6 दिन तक न निकालें। अगर ये दानेदार दवाईयाँ उपलब्ध न हो तो फार्मोथियान 25 ई.सी. या मोनेक्रोटोफॉस 36 एस. एल. या डाइमिथोएट 30 ई.सी. एक लीटर प्रति हैक्टर की दर से तीन छिड़काव प्रति पखवाड़े कीजिये।

यदि फसल पर सिर्फ गंधी बग का प्रकोप हो तो कार्बोरिल 5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टर का प्रयोग कीजिये सैन्य कीट, शीर्ष लट, जैसिड्स, थ्रिप्स आदि कीड़ों के लिए भी उपरोक्त रसायनों का प्रयोग करें धान के जीवाणु अंगमारी रोग की रोकथाम के लिए 25 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन दवा 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 15 दिन पश्चात् यह छिड़काव दोहरायें। यह रोग अधिक नम वातावरण में होता है। बीजोपचार द्वारा इसकी रोकथाम की जा सकती है।

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