kheti kisani उन्नत खेती

नॉन बी.टी. कपास की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

कपास
Written by Vijay Gaderi
उन्नत किस्में एवं बीज दर
बीकानेरी नरमा (1978):-

यह अमेरिकन किस्म की कपास है। जल्दी पकने वाली इस किस्म के रेशे की लम्बाई 0.84 इंच ओटाई प्रतिशत 33-34 तथा उच्चतम कताई क्षमता 32-34 है। इसका बीज छोटा और रोयेदार होता है। इसके पौधे की ऊँचाई मध्यम होती है। बुवाई हेतु इसका 15-16 किलो बीज प्रति हेक्टर काम में लीजिये। आर. एस. टी. 9 (1992) इस अमेरिकन किस्म के रेशे की लम्बाई 0.89 इंच, ओटाई प्रतिशत 34 एवं उच्चतम कताई क्षमता 28-30 होती है। बुवाई के लिए प्रति हेक्टर 20-25 किलो बीज पर्याप्त रहता है।

कपास

संकर-4 (1974):-

इस संकर किस्म के रेशे की औसत लम्बाई 1.06 से1.10 इंच, ओटाई 34 प्रतिशत तथा उच्चतम कताई क्षमता 40-50 होती है। इसकी रूई रेशम सी नरम एवं सफेद होती है। बुवाई हेतु इसका ढाई किलो ग्राम बीज प्रति हेक्टर काम में लीजिये।

खेत की तैयारी:-

कपास की खेती के लिए दोमट चिकनी मिट्टी उपयुक्त रहती है। एक बार मिट्टी पलटने वाले हल तथा बाद में त्रिफाली या हेरो से दो तीन बार जुताई कर भूमि तैयार कर लीजिये।

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खाद एवं उर्वरक:-

बुवाई के तीन चार सप्ताह पहले 25-30 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टर जुताई कर भूमि में अच्छी तरह मिला दीजिये। अमेरिकन कपास की किस्मों को प्रति हेक्टर 75 किलो नत्रजन और 35 किलो फॉस्फेट की आवश्यकता रहती है।

कपास की देशी किस्मों को प्रति हेक्टर 50 किलो नत्रजन एवं 25 किलो फॉस्फेट की आवश्यकता होती है। कपास की संकर किस्म को प्रति हेक्टर 100 किलो नत्रजन एवं 40-50 किलो फॉस्फेट की आवश्यकता होती है।

पोटाश उर्वरक मिट्टी परीक्षण के आधार पर दीजिये। फॉस्फेट की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पहले दीजिये। नत्रजन की शेष आधी मात्रा फूलों की कलियों बनते समय दीजिये। जिन मृदाओं में जस्ते की कमी हो वहाँ 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टर बुवाई से पहले उर्वरक के साथ डालें।

बीज उपचार:-

नॉन बी.टी. कपास के बीज में गुलाबी लट की सूंडी छुपी हुई होती है। बोने से पहले उसे नष्ट करने के लिये बीजों को धूमित कर लीजिये। 40 किलो तक बीजों को धूमित करने के लिये एल्यूमिनियम फॉस्फाइड का एक पाउच काफी होता है। बीज में दवा के पाउच को डालकर उसे हवारोधी बनाकर उसे 24 घंटे तक बन्द रखिये धूमित करना संभव न हो तो धूप में बीजों को पतली तह के रूप में फैला कर 6 घंटे तक तपने दीजिये।

कपास के बीजों से रेशे हटाने के लिये जहाँ संभव हो, व्यापारिक गंधक के तेजाब का प्रयोग कीजिये 10 किलो बीज के लिये 1 लीटर गंधक का तेजाब पर्याप्त होता है। मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में बीज डालकर, गंधक का तेजाब डालिये और एक दो मिनट तक लकड़ी से हिलायें व काला पड़ते ही तुरन्त बीज को बहते हुए पानी में धो डालिये और ऊपर तैरते हुए बीज को अलग कर दीजिये।

गंधक के तेजाब से बीज का उपचार करने से अंकुरण अच्छा होगा एवं यह उपचार कर लेने पर बीज के प्रधूमन की भी आवश्यकता नहीं रहेगी।

फसल में बीज जनित रोग न हो इसके लिये बाद में बीज को 6-8 घंटे पानी में भिगोकर सुखाने के बाद पारा फफूंदनाशी दवा की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज में मिलाकर उपचारित करिये अथवा 10 लीटर पानी में 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में 8 से 10 घंटे तक भिगोकर सुखा लीजिये और फिर बोने के काम में लीजिये। जहाँ पर जड़ रोग का प्रकोप होता है, वहाँ बीजों को तीन ग्राम थाइरम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिये। असिंचित स्थितियों में कपास की बुवाई के लिये प्रति किलो बीज को 10 ग्राम एजेटोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर बोने से उपज में वृद्धि होती है।

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बुवाई का समय तथा विधि:-

नॉन बी.टी. कपास की बुवाई का उपयुक्त समय 10 मई से 31 मई तक है। कुछ क्षेत्रों में कपास की सूखी बुवाई की जा सकती है। इसके लिये सूखी बुवाई करके तुरन्त सिंचाई कर देनी चाहिये। कपास की बुवाई में अमेरिकन किस्मों में कतार से कतार की दूरी 60 सें.मी. और पौधे से पौधे की दूरी 45 से.मी. रखनी चाहिये। अन्तरशस्यवर्तन के लिये कतार से कतार दूरी 75 सें. मी. रखें। कपास संकर-4 के लिये कतार से कतार की दूरी 150 सें.मी. और पौधे से पौधे की दूरी 60 सें.मी. रखें।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई

बुवाई के बाद 3-4 सिंचाइयाँ कीजिये तथा उर्वरक देने के बाद और फूल आते समय सिंचाई अवश्य कीजिये। दो फसली क्षेत्रों में 15 अक्टूबर के बाद सिंचाई नहीं करें। अंकुरण के बाद पहली सिंचाई 20-30 दिन में कीजिये। इससे पौधों की जड़े ज्यादा गहराई तक बढ़ती हैं तथा इसी समय पौधों की छंटनी भी कर दीजिये। कपास में खरपतवार नियन्त्रण अति आवश्यक है अन्यथा फसल की पैदावार काफी कम हो जायेगी। इसके लिए एक माह बाद एक निराई-गुड़ाई अवश्य करनी चाहिये, इसके बाद यदि खरपतवार दुबारा हो जाये तो दूसरी निराई-गुड़ाई करें। फसल में रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु पेन्डीमिथेलिन 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई के तुरन्त बाद 600 लीटर पानी में घोल बना कर छिडकाव करें घास वर्गीय खरपतवारों के नियंत्रण के लिए क्यूजालोफोप इथाइल 50 ग्राम प्रति हैक्टेयर बुवाई के 15 दिन बाद 600 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें।

यदि फसल में बोई गई किस्म के अलावा दूसरी किस्म के पौधे मिले हुए दिखाई दें तो उन्हें निराई के समय उखाड़ देवें, क्योंकि मिली हुई कपास का मूल्य सदैव कम मिलता है।

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नॉन बी.टी. कपास की चुनाई:-

कपास के डोडे जब पूरे खिल जायें तब इसकी चुनाई कर लीजिये। कपास की फसल में 60-70 प्रतिशत डोडे खुलने की अवस्था पर ड्रॉप अल्ट्रा 250 एम.एल. प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करने पर फसल पर बिना किसी दुष्प्रभाव के उपज में वृद्धि होती है।

मिलवां खेती एवं फसल क्रम:-

कपास मूँग कपास की कतारों के बीच एक कतार बैसाखी मूँग की बोना लाभप्रद रहता है। बारानी क्षेत्रों में अन्तरशस्य किया जाना उपयुक्त रहता है। जुड़वाँ कतार विधि से अर्न्तशस्य अधिक लाभप्रद रहती है। सिंचित क्षेत्रों में निम्न फसल चक्र लाभप्रद एवं कपास की पैदावार में वृद्धि करने वाले पाये गये हैं।

(1) कपास- गेहूँ (1 वर्ष)

(2) मक्का- गेहूँ- कपास- मैथी (2 वर्ष)

(3) मक्का- सरसों-कपास-मैथी (2वर्ष)

(4) ग्वार-गेहूँ- चारा-कपास (2 वर्ष)

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सिंचित क्षेत्र:-

फसल संरक्षण:-

अमेरिकन कपास:-

प्रथम छिड़काव:- सफेद मक्खी, ग्रे वीविल, जैसिड तथा थ्रिप्स एवं मकड़ी आदि कीड़ों क रोकथाम के लिए एक लीटर डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. में से किसी एक दवा का छिड़काव कीड़े दिखाई देने पर कीजिए।

दूसरा छिड़काव:- उपरोक्त कीटों के लिए दूसरा छिड़काव जुलाई के दूसरे या तीसरे सप्ताह में फिर कीजिए। उपर्युक्त दवाओं के अतिरिक्त मिथाईल पैराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण 20 किलोग्राम या मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. एक लीटर या कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण ढाई किलो प्रति हेक्टर भी काम में लिया जा सकता है।

तीसरा छिड़काव:- सवा लीटर क्यूनालफॉस 25 ई.सी. या कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुनलशील चूर्ण 2.5 किलोग्राम या एक लीटर मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. या साइपरमेथ्रिन 25 ई.सी. 400 मि.ली. या फेनवेलरेट 20 ई.सी. 450 मि.ली. या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. एक लीटर का प्रति हेक्टर के हिसाब से छिड़काव अगस्त के पहले से तीसरे सप्ताह में कीजिये।

चौथा छिड़काव:- सितम्बर के द्वितीय अथवा तृतीय सप्ताह में 2.5 कि.ग्रा. कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण या एक लीटर मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. या क्यूनालफॉस 255. सी. या क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. या ऐसीफेट 75 एस.पी. 500 ग्राम प्रति हेक्टर का छिड़काव कीजिये।

पाँचवा छिड़काव:- यदि कीटों का प्रकोप अधिक दिखाई दे तो अक्टूबर में उपर्युक्त में से किसी एक दवा का प्रयोग कीजिये। बालवर्म की प्रभावी रोकथाम के लिए कपास की फसल देने के तुरन्त बाद इसके डंठल जल्दी से जल्दी जला दीजिये।

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ब्लेक आर्म (जीवाणु अंगमारी):-

इस रोग की रोकथाम के लिए दूसरे, तीसरे एवं चौथे छिड़काव में काम में ली जाने वाली दवा के साथ फफूंदनाशी दवा मिलाकर छिड़काव कीजिये।

जड़ गलन रोग:-

इस रोग की रोकथाम हेतु प्रति किलो बीज को 3 ग्राम थाइरम से उपचारित करके बोइये। रोग ग्रसित खेतों में कपास और मोठ की मिश्रित फसल लीजिये। रोग का प्रकोप अधिक हो तो रोगग्रस्त खेतों में दो वर्षों तक कपास की फसल मत लीजिये।

असिंचित क्षेत्र:-

नॉन बी.टी. कपास में अमेरिकन कपास:-

प्रथम छिड़काव- ग्रेवीविल, जैसिड, सफेद मक्खी, तेला, पत्ती मोड़क आदि की रोकथाम के लिए जुलाई के आखिरी अथवा अगस्त के पहले सप्ताह में फार्मोथियान 25 ई.सी. या डाई मिथोएट 30 ई.सी. या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. एक लीटर या मैलाथियान 50 ई.सी. सवा लीटर या मिथाईल पैराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण 20 किलो का प्रति हेक्टर छिड़काव / भुरकाव करिये।

द्वितीय छिड़काव- बालवर्म, जैसिड, ग्रेवीविल आदि की रोकथाम के लिये अगस्त के अंतिम सप्ताह में मोनोक्रोटोफास 36 एस. एल. एक लीटर या कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुनलशील चूर्ण 2.5 किलोग्राम या फेनिट्रोथियान 50 ई.सी. सवा लीटर या ऐसिफेट 75 एस. पी. 500 ग्राम का प्रति हेक्टर छिड़काव कीजिये। इसके साथ 8 ग्राम स्ट्रेप्ट्रोसाइक्लिन मिलाइये।

तृतीय छिड़काव सितम्बर की तीसरे या चौथे सप्ताह में द्वितीय छिड़काव के लिये दी गई दवाओं को काम में लेते हुए तीसरा छिड़काव कीजिये। देशी कपास देशी कपास के लिये असिंचित क्षेत्रों में अमेरिकन कपास के लिये दिये गये अन्तिम दो छिड़काव कर देना ही काफी रहता है।

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संकर कपास:-

कपास संकर-4 की फसल के पौध संरक्षण हेतु पहले के छिड़काव के स्थान पर किसी भी दानेदार कीटनाशक दवा जैसे फोरेट एक किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टर खेत की मिट्टी में मिलाकर भूमि उपचारित कर लीजिए, साथ ही पौध संरक्षण हेतु अन्य किस्मों पर जो कीटनाशक दवायें चौथे एवं पांचवें छिड़काव में इस्तेमाल की जाती है, उन्हीं का छिड़काव दिये गये विवरण के अनुसार नवम्बर के प्रथम तथा तीसरे सप्ताह में किया जाना आवश्यक है।

नॉन बी.टी. कपास में मिलिबग नियंत्रण हेतु:-

प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से – छिड़काव करें।

नॉन बी.टी. कपास में समेकित नाशीकीट प्रबन्धन :

  1. गर्मी में खेत की जुताई करें।
  2. फसल के बचे हुए अवशेषों को जलाकर नष्ट कर देवें ।
  3. पूरे क्षेत्र में एक साथ एवं जल्दी बुवाई कर देवें ।
  4. खेत के चारों ओर मक्का कतार लगावें । तीन चार कतारें लगाकर उनके बीच में चंवला की एक कतार लगावें ।
  5. कपास की प्रत्येक नवीं व दसवीं कतार के बीच सिटेरिया की एक कतार लगावें । 6. बीजों को एमीडाक्लोप्रिड 7.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर बुवाई करें।
  6. फसल अंकुरण के 21 दिन बाद खेतों में बालवर्म के लिए फेरोमोन प्रपंच 5 प्रति हेक्टर की दर से लगावें।
  7. 45 एवं 55 दिन की फसल अवस्था पर नीम बीज सत्व का 5 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  8. हेलियोथीस एन पी वी का 250 एल ई प्रति हेक्टर की दर से छिड़कें।
  9. अंड परजीवी ट्राइकोग्रामा किलोनिस 1.5 लाख प्रति हेक्टर की दर से फसल की 75 दिन की अवस्था पर दो बार एक सप्ताह के अन्तराल पर छोड़ें।
  10. आवश्यकता पड़ने पर रासायनिक कीटनाशी का प्रयोग करें।

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