kheti kisani उन्नत खेती सब्जियों की खेती

पत्ता गोभी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

पत्ता गोभी
Written by Vijay Gaderi

जलवायु:-

पत्ता गोभी की उन्नत खेती के लिए ठंडी एवं नम जलवायु सबसे अच्छी होती हैं। इसकी वानस्पतिक वृद्धि के लिए उपयुक्त तापमान 4 से 8 डिग्री सेल्सियस तक या इसे कम तापमान चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में ही पत्ता गोभी का बीज उत्पादन ज्यादा अच्छा होता है।

पत्ता गोभी

भूमि और इसकी तैयारी:-

पत्ता गोभी की अच्छी पैदावार के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। खेती से पहले भूमि की तीन से चार जुताई करनी चाहिए। पहले जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से की जाती है। फिर जैविक खाद बिखेरकर भूमि की जुताई करते हैं। मिट्टी बारीक करके पाटा की सहायता से समतल कर लेते है।  उन्नत किस्में और हाइब्रिड

अगेती किस्में:-

गोल्डन एकड़, प्राइड ऑफ इंडिया, पूसा मुक्ता, कोपेन्हेगन मार्केट, यह किस्में रोपाई के 60 से 75 दिन बाद तैयार हो जाती हैं। इनके बंद गोल और ठोस होते हैं।

पछेती किस्में:-

पूसा ड्रम हेड, लेट ड्रम हेड, सितंबर। यह रोपाई के 90 से 120 दिन बाद तैयार हो जाती हैं। इनमें तने छोटे और हेड चपटे होते हैं।

संकर:-

हाइब्रिड-10, श्री गणेश गोल, एन. एल.- 401, बी.एस. – 32

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नर्सरी प्रबंधन एवं पौध तैयार करना:-

अच्छी जल निकासी के लिए क्यारियां भूमि कि 17 से 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंची बनानी चाहिए। बुवाई  से लगभग 10 से 20 दिन पहले क्यारियों को फार्मल्डिहाइड से उपचारित करें। उपचार के बाद क्यारियों को पॉलिथीन की चादर या तिरपाल से 4 से 5 दिन तक ढक कर रखते हैं। ताकि दवाई की वाष्प न निकल सके।

इसके बाद नर्सरी को तीन से चार दिन तक खुला रखें और उसके बाद ही बुवाई करें। ऐसा करने से मृदा जन्य रोगों से पौधे बचाए जा सकते हैं। फार्मल्डिहाइड की जगह कैप्टान थीरम 0.3% का घोल बनाकर 5 लीटर प्रति वर्ग मीटर डाल कर क्यारियों का उपचार कर सकते हैं। ऐसा बुवाई के एक दिन पहले करें।

बुवाई का समय:-

पत्ता गोभी बुवाई का समय इस प्रकार तय किया जाना चाहिए ताकि ठंड पड़ने पर से पहले बंद तैयार हो जाए। पछेती प्रजातियों की बुवाई जून के मध्य तथा अगेती प्रजातियां की मध्य जुलाई तक कर देनी चाहिए। बुवाई से एक महीने बाद रोपाई कर देनी चाहिए।

बीज की मात्रा:-

एक हेक्टेयर की पौध तैयार करने के लिए अगेती किस्म के लिए 500 से 600 ग्राम और पछेती किस्म के लिए 350 से 500 ग्राम 20 प्राप्त होता है।

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रोपाई:-

पौध 4 से 6 सप्ताह बाद रोपाई योग्य हो जाती है। अगेती किस्म को 45-60 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक:-

खेत तैयार करते समय 20 से 30 तन प्रति हेक्टर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद भूमि में मिला देवे।  इसके अलावा 120 किलोग्राम नत्रजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस और 25 किलो पोटाश प्रति हेक्टर आवश्यकता होती है। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा पौध  लगते समय भूमि में मिला देवे। नत्रजन की आधी मात्रा पौध लगाने के 6 से 7 सप्ताह बाद देवे।

सिंचाई:-

पौध की रोपाई करने के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। उचित विकास के लिए भूमि में समुचित भूमि होना आवश्यक होता है। सिंचाई 10 दिन के बाद की जा सकती है। पछेती किस्म में सिंचाई जल्दी भी की जा सकती है।

निराई गुड़ाई:-

अनावश्यक खरपतवारों को बढ़ने से रोकने के लिए दो से तीन बार निराई- गुड़ाई उस समय करनी चाहिए जब वह मिट्टी थोड़ी सूख जाए।

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पत्ता गोभी की कटाई, उपज और संग्रहण:-

सिर विक्रय आकार में जब तक पहुंचते ही पत्ता गोभी की कटाई की जाती है। तुलनात्मक रुप से गर्म परिस्थितियों में विकसित जल्दी कल्टीवर्स प्रारंभिक लक्षण चरण में सिर विकास, लेकिन परिपक्वता पर कठिन हो जाते हैं। कुछ किस्मों में सिर परिपक्वता के बाद जल्दी खुलना शुरू हो जाता है। कटाई में देरी हो रही है, तो ऐसे मामलों में सिर की गुणवत्ता, तेजी से कमजोर होती है। इसलिए कटाई, अच्छी गुणवत्ता के सिर प्राप्त करने के लिए सही स्तर पर करनी चाहिए। जल्दी कल्टीवर्स 80-100 दिनों माध्यम से 60- 80 दिनों के बाद पछेती और 100-130 दिनों, रोपाई के बाद फसल कटाई के योग्य हो जाती है।

जल्दी गोभी किस्म की पैदावार उत्तरी मैदान में 300- 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं, जबकि मध्य और देर गोभी 400-600 क्विंटल/ हेक्टेयर के बीच रहती है। गोभी को से 2-8 महीने के लिए डिग्री सेल्सियस और प्रतिशत अपेक्षित आर्द्रता पर संग्रहित की जा सकती है।

गोभीवर्गीय सब्जियों में पत्ता गोभी के प्रमुख कीट व व्याधियां:-

गोभी वर्गीय सब्जियों को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीट कटुआ सुंडी, माहो, हीरक पृष्ट पतंगा (डाइमंड बैक मौथ), तम्बाकू की झिल्ली, अर्द्घकुंडलक कीट (सेमीलूपर), गोभी की तितली, सरसों की आरा मक्खी आदि है व व्याधियों में जड़ गांठ (रूट नाट), मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू), झुलसा रोग या अल्ट्रनेरिया पानी धब्बा रोग, इत्यादि हैं। इस लेख में गोभी वर्गीय सब्जियों के कीट एवं व्याधिया के नियंत्रण का वर्णन किया हैं।

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प्रमुख कीट

पत्ती भक्षक कीट

ये कीट पत्ता गोभी की पत्तियों को खाकर काफी नुकसान पहुंचाते हैं। नियंत्रण हेतु फूल से बनने से पूर्व मैलाथियान 5 प्रतिशत अथवा कार्बोरील 5 प्रतिशत के 20 किलो चूर्ण का प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए।

हीरक पृष्ठ पतंगा (डायमंड बेक मोथ)

दुनियाभर में इस कीट से गोभीवर्गीय सब्जियों को अधिक नुकसान हो रहा है। इस कीट की इल्लियां  पीलापन लिए हुए हरे रंग की और शरीर का अगला भाग भूरे रंग का होता है एवं वयस्क, धूसर रंग का होता है। जब यह बैठता है तो इसके पृष्ठभाग पर तीन हीरे की तरह चमकीले चिन्ह दिखाई देते हैं. इसी वजह से इसे हीरक पृष्ठ पतंगा कहते हैं। नुकसान पहुंचाने का काम इल्लियां करती है। जो पत्तियों की निचली सतह को खाती है और उनमें छोटे-छोटे छिद्र बना देती है। अधिक प्रकोप होने पर पौधे मर जाते हैं। बड़े पौधों पर फूल छोटे आकार के लगते हैं। इस कीट के लगभग 50 से 60% तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण:-

हीरक पृष्ठ शलभ के रोकथाम के लिए बोल्ड सरसों को गोभी के प्रत्येक 25 कतारों के बाद दो कतारों में लगाना चाहिए। डिपेल 8 एल. या पादान (50 ई.सी.) का 1000 मिली प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें। स्पाइनोशेड (25 एस.सी) 1.5 मि.ली. या थायोडाइकार्ब 1.5 मि.ली. की की दर से या बेसिलस थुरजेन्सिस कुस्टकी (बी.टी. के) 2 ग्रा.मी. के दर से 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर के दो छिड़काव करें। छिड़काव रोपण 25 दिन व दूसरा इसके 15 दिन बाद करें।

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माहु:-

यह आकर में हरे पीले पनकदर व पंखविहीन कीट होते हैं। इस कीट के शिशु एवं वयस्क दोनों ही पत्तियों से रस चूसते हैं। जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती है। उपज का बाज़ार मूल्य कम हो जाता है। माहु अपने शरीर से मधु रस उत्सर्जित करते हैं जिस पर काली फफुंदु विकसित हो जाती है जिससे पौधों पर जगह-जगह काले धब्बे दिखाई देते हैं। इस कीट से लगभग 20- 25 % तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण:-

परभक्षी कीट लेडी बर्ड बीटल (काक्सीनेला स्पी.) को बढ़ावा दें। मेलाथियान 5% या कार्बोरील 10% चूर्ण का 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें या मिथाइल डिमेटान (25 ई.सी.) या डाइमिथोएट (30 ई.सी.) 1.5 प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

अर्धकुण्डलक कीट (सेमिलूपर):-

यह बहुभक्षी कीट है यहां चलते समय अर्थ कुंडलाकार संरचना बनाते हैं। इस कीट की इल्लियाँ हरे रंग की होती है एवं शरीर पर सफेद रंग की धारियां होती है। इल्लियां पत्तियों को खा जाती है परिणाम स्वरुप केवल शिराएं ही रह जाती है। इस कीट के आक्रमण से लगभग 30 से 60% उपज में कमी आ जाती है।

नियंत्रण:-

प्रारंभिक अवस्था में सुन्डिया समूह में रहती है। अतः इन्हें पत्तियों समेत नष्ट कर देना चाहिए। प्रकाश प्रपंच का प्रयोग व्यस्त शलभों को पकड़ने के लिए करना चाहिए। मेलाथियान (50 ई.सी.) को 1.5 मी.ली. प्रति लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

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सरसों की आरा मक्खी:-

यह कीट मध्यम आकार की मक्खी की तरह वयस्क होता है इसका शरीर नारंगी, सिर कला व पंख स्लेटी रंग के होते हैं। मादा अपने आरिनुमा एंड निक्षेपित से पत्तियों के किनारे चिर कर अंडे देती है। इस कीट की गर्भ अवस्था हानिकारक होती है। भृंगक पत्तियां खाते हैं और अधिक प्रकोप होने पर सिर्फ शिराएं ही रह जाती है। भृंगक फूल के शीर्ष, भीतरी भाग या फिर डंठलों के बीच के भाग को खाकर, उसमें अपशिष्ट पदार्थ छोड़ने पर जीवाणु आक्रमण करते हैं।

नियंत्रण:-

सुबह के समय इल्लियों को हाथ से पकड़ कर नष्ट करें। मेलाथियान (50 ई.सी.) 1.5 लीटर की दर से पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

प्रमुख व्याधियां:-

आर्द्र गलन (डम्पिंग ऑफ़):-

यह रोग गोभी की अगेती किस्मों में नर्सरी अवस्था में होता है। जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पढ़कर कमजोर हो जाता है तथा छोटे पौधे गिरकर मरने लगते हैं।

नियंत्रण:-

इसके नियंत्रण हेतु बुवाई पूर्व केप्टान 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

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झुलसा:-

इस रोग से पत्तियों पर गोल आकार के छोटे से बड़े भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं तथा उसमें धारिया बनती है। अंत में यह धब्बे काले रंग के हो जाते हैं।

नियंत्रण:-

इसके नियंत्रण हेतु जाइनेब या मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर दोहरावे।

यह पौधे की सभी अवस्थाओं में आता है व काफी नुकसान करता है। इसमें पत्तियों की निचली सतह पर हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।

नियंत्रण:-

रिडोमिल एम. जेड- 72 का 1 ग्राम प्रति लीटर की दर से या डायथेन एम-45 का 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

जड़ गांठ (रूठ नोट):-

इस रोग से पौधों की जड़ों में गोल कृमि के संक्रमण से गांठ पड़ जाती है। जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है पतियों पर पीली झुर्रियां पड़ जाती है तथा पत्तियां पीली व हरे मोटी दिखाई देती है। जिससे पौधों पर फल कम संख्या में तथा छोटे लगते हैं।

नियंत्रण:-

मई-जून में खेत की गहरी जुताई कर दे। फसल चक्र अपनाना चाहिए। मेड में चारों तरफ गेंदा के पौधे लगाना चाहिए। बुवाई पूर्व खेत में 25 क्विंटल नीम की खाद प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए व एल्डीकार्ब 60से 65 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से पौधे रोपने से पूर्व देनी चाहिए।

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