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पपीता की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

पपीता
Written by Bheru Lal Gaderi

पपीता जल्दी बढ़ने वाला एक फलदार पौधा है। इसके पौधे एक ही वर्ष में फल देने लगते है। यह विटामिन-ए तथा सी का अच्छा स्त्रोत है। इसका फल खाने में स्वादिष्ट होता है। जलवायु एवं भूमि यह उष्ण जलवायु का पौधा है जो खुले धूप वाले क्षेत्र में पानी की सुविधा के साथ उगाया जा सकता है। इसके लिये पाला हानिकारक होता है। जल निकास युक्त दोमट मिट्टी पपीते की खेती के लिये उत्तम रहती है। भूमि की गहराई 45 सेमी. होनी आवश्यक है।

पपीता

पपीता की उन्नत किस्में

कुर्ग हनी ड्यू:- पौधे कम ऊंचाई के होते हैं जिन पर बहुत कम ऊंचाई पर फल लगने शुरू हो जाते हैं। पौधों में नर और मादा दोनों फूल आते है। फल बड़े आकार के गूदा मोटा व मीठा होता है।

रेड लेडी (ताइवान) :- लोकप्रिय उभयलिंगी किस्म है। फल मध्यम आकार के 1.5 से 2 किग्रा भार युक्त जिनका गुदा मोटा व आकर्षक लाल रंग लिए होता है। यह किस्म जल्दी पकने वाली अधिक उत्पादक (70 से 80 किग्रा फल प्रति पौधा) के साथ रिंग स्पाट वायरस के प्रति सहनशील है।

पपीता की अन्य किस्में:- पूसा डिलिसियस, पूसा नन्हा, सी ओ 2, सूर्या

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पपीता का प्रवर्धन:-

पपीते का प्रवर्धन बीज द्वारा है। पौधे तैयार करने के लिये पौधशाला की अच्छी तरह खुदाई करके, खाद मिला कर उठी हुई क्यारियां तैयार कर लेनी चाहिये। बीजों को 2 सेमी की दूरी पर 10 सेमी की कतारों में लगभग 1 से 1.5 सेमी की गहराई पर बोना चाहिये। जब पौधे 5 से 7 सेमी बड़े हो जायें तो उन्हें पोलीथीन की थैलियों में बदल देना चाहिये। जब पौधे 15-20 सेमी के हो जाये तो खेत में निश्चित स्थान पर लगा देना चाहिये। एक हैक्टेयर क्षेत्र की पौध तैयार करने के लिये लगभग 100 ग्राम बीज पर्याप्त होते है।

पपीता के पौधे लगाने की विधि:-

खेत में 2×2 मीटर की दूरी पर 45X45X45 सेंटीमीटर आकार के गड्डे खोदें। प्रत्येक गड्डे में 200 ग्राम सुपर फॉस्फेट, 10 किग्रा. गोबर की सड़ी खाद व 50 ग्राम मिथाइल पैराथियान चूर्ण मिलाकर भर देना चाहिये। पपीते के पौधे जुलाई से सितम्बर व फरवरी-मार्च में रोपण कर सकते हैं।

खाद एवं उर्वरक:-

पपीते के पौधों में 10 से 15 किलो गोबर की खाद, 100 ग्राम यूरिया, 400 ग्राम सुपर फॉस्फेट व 150 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति पौधे के हिसाब से देना चाहिये। यूरिया की 25 ग्राम मात्रा पौध लगाने के दो माह बाद, 25 ग्राम पौध लगाने के चार माह बाद तथा 50 ग्राम फूल आने से पूर्व देवें। सुपर फॉस्फेट की 200 ग्राम मात्रा गड्डा भरते समय तथा 200 ग्राम मात्रा पौध रोपण के 5 से 6 माह बाद देवें। पोटाश को गड्डा भरते समय देवें। देशी खाद की मात्रा जून-जुलाई/ फरवरी-मार्च में देनी चाहिये।

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सिंचाई एवं देखभाल:-

पपीते की जड़े भूमि में गहरी नहीं जाती है अतः थोड़े-थोड़े समय के अन्तर से सिंचाई करनी चाहिये लेकिन इस बात का विशेष ध्यान देते रहे कि पेड़ के तने के पास पानी भरा नहीं रहे वरना जड़ और तने के सड़ने की सम्भावना रहती है। गर्मियों में लगभग एक सप्ताह के अन्तर से तथा जाड़े में 10 से 15 दिन के अन्तर से सिंचाई करनी चाहिये। खेत में जल निकास की समुचित व्यवस्था रखनी चाहिये तथा तने के चारों तरफ थोड़ी मिट्टी चढ़ा देनी चाहिये ताकि पानी तने के सीधे सम्पर्क में नहीं आये। बूँद-बूँद सिंचाई पद्धति अपनाने से फल उपज व गुणवत्ता में सुधार होता है।

पौध संरक्षण:-

तेल एवं सफेद मक्खी:-

पपीते के पौधे पर मुख्यतः हरा तेला व सफेद मक्खी का आक्रमण होता है। यह कीट पत्तियों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाता है। नियंत्रण हेतु मिथाईल डेमेटोन 25 ई सी एक मिलीलीटर प्रति लीटर या डाइमिथोएट 30 ई सी एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

लाल मकड़ी:-

यह फलों एवं पत्तियों पर आक्रमण करती है। नई पत्तियां पीली पड़ जाती है रोकथाम ओमाइट या इथियोन 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

मूल ग्रन्थि (सूत्रकृमि):-

इसके आक्रमण से जड़ों पर गांठे पड़ जाती है तथा पौधा कमजोर और पीला पड़ जाता है और फल भी छोटे व कम लगते है। नियंत्रण हेतु पौध तैयार करते समय कार्बोफ्यूरान 3 जी 8 से 10 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से नर्सरी में देवें तथा पौध लगाते समय 3 ग्राम कार्बोफ्यूरान 3 जी प्रति पौधे के हिसाब से प्रयोग करें।

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व्याधि प्रबंध:-

तना या पद विगलन रोग (स्टेम या फुट रॉट) :-

इस रोग के प्रभाव से भूमि की सतह से तनों में सड़न आरम्भ होती है जो धीरे धीरे बढ़कर पूरे तने को घेर लेती है रोगग्रस्तभाग गहरा भूरा व काला हो जाता है। रोगी पेड़ों के पत्ते व फल पीले पड़कर गिरने लगते है। रोग के प्रभाव से पेड़ों की छाल फट जाती है व शहद के छत्तेनुमा दिखाई देते है। ऐसे पेड़ गिर जाते है। तना सड़न उत्पन्न करने वाले कवक से ही नर्सरी में पपीते की पौध में आर्द्र गलन रोग होता है।

नियंत्रण हेतु:-
  1. बाग में पानी का निकास अच्छा होना चाहिये। पेड़ लगाते समय व उसके बाद में भी तने पर किसी प्रकार की चोट नहीं लगनी चाहिये ।
  2. रोग दिखाई देते ही रोगग्रस्त भाग को पूरी तरह हटाकर कॉपरआक्सीक्लोराइड3 प्रतिशत का लेप या छिड़काव कर देवें। बोर्डो मिश्रण ( 5:5:50) तने के आधार के चारों ओर भूमि में डालने व तने पर छिड़काव करने से रोग का प्रसार घट जाता है। वर्षा ऋतु में इन क्रियाओं को कम से कम तीन बार प्रयोग में लाया जाना चाहिए।
  3. पौधों पर रोग का प्रभाव अधिक हो जाने की अवस्था में पेड़ को जड़ सहित निकाल कर नष्ट कर देना आवश्यक है। उसी गड्डे में फिर से दूसरा पेड़ कुछ समय तक नहीं लगाना चाहिये।
  4. नर्सरी में पौध को रोग से बचाने के लिये मिट्टी को 3 ग्राम ताम्रयुक्त कवकनाशी प्रति लीटर पानी की दर के घोल से तर कर देवें और बीजों को थाइरम 3 ग्राम प्रति किलों बीज की दर से उपचारित कर बोयें।

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पर्णकुंचन व मोजेक (लीफ कर्ल व मोजेक) :-

यह विषाणु जनित रोग है। पर्णकुंचन रोग से पत्तियां आकार में छोटी, कुचित, विकृत व सिकुड़न लिये मोटी शिराओं वाली हो जाती है। वे स्पष्ट रूप से उल्टे प्याले के रूप में नीचे की तरफ एवं भीतर की ओर मुड जाती है। पर्णवृन्त टेढ़े मेढ़े हो जाते है। इन पौधों पर फल और फूल नहीं लगते है। पौधे की वृद्धि रूक जाती है और पत्तियां गिर जाती है।

मोजेक रोग से नई पत्तिय चितकबरापन व सिकुड़न सबसे पहले दिखाई पड़ता है। ऐसी पत्तियां आकार में छोटी, विकृत और लता तन्तु जैसी हो जाती है। डंठल छोटे रह जाते है और पौधे की वृद्धि रूक जाती है। पौधे के सिरे पर नई पत्तियों के मुट्ठीनुमा गुच्छे के अतिरिक्त पुरानी पत्तियां गिर जाती है। फल छोटे विकृत व मोजेक जैसे धब्बे वाले होते है।

नियंत्रण:-

पर्णकुचन रोगग्रस्त पेड़ कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकते है और मोजेक संक्रमित पौधे भी आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं होते है तथा साथ ही उनमें रोग प्रति वर्ष बढ़ता जाता है। अतः रोगी पेड़ों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिये जिससे रोग का फैलाव रूक सके।

पपीता की कोई भी किस्म रोगरोधी नहीं होती है। रोग का फैलाव कीटों से होता है अतः कीटनाशी डाइमिथोएट 30 ई सी या मिथाइल डिमेटोन 25 ई सी एक मिलीलीटर प्रति लीटर या इमिडाक्लोरोपिड 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी के हिसाब से घोलकर 15 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें इन दवाओं का प्रयोग फल लगने से पहले ही करना चाहिये। फल लगने के बाद मैलाथियान 50 ई सी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़कना चाहिये। पपीते के बाग के आसपास कददू लोकी, ककड़ी, बैंगन, मिर्च, टमाटर व आलू नहीं उगायें।

अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें:-

तुडाई एवं उपज:-

जब पपीता का फल हल्का या पीलापन लेने लगे और उसमें सफेद दूध आना बन्द हो जाये तो समझना चाहिये कि फल पक गया है अतः इनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिये। फलों को पक्षियों से बचाने के लिये इनके चारों ओर पुराना टाट बांधा जा सकता है। पपीते से प्रति पौधा 40 से 50 किलोग्राम उपज प्राप्त होती है। प्रति पौधा औसतन 200 ग्राम पपेन प्राप्त किया जा सकता है।

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