पशुपालन

बकरी पालन : एक प्रभावी आर्थिक व्यवसाय

बकरी पालन
Written by Vijay Gaderi

भारत जनसंख्या एवं जैव विविधता की दृष्टि से एक संपन्न राष्ट्र है। यहां जीवन की विभिन्न प्रजातियों का आर्थिक दृष्टि से पालन किया जाता है। भारत में 512.57 मिलियन पशुधन है, विश्व के कुल पशुधन का 11.39% है। दूध उत्पादन की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान पर स्थित भारत अन्य पशु प्रजातियों में भी जैव विविधता से परिपूर्ण है। (बकरी पालन)
बकरी पालन

ज्यादातर पालतू बकरियां जो जंगली बकरी केपेरा एगेगरस से पैदा हुई है। इनका जन्म स्थान बलूचिस्तान की नंगी पहाड़ियां तथा पश्चिमी सिंध व तुर्किस्तान प्रान्त माना जाता है तथा फिर उत्पादन के लिए बहुत ही उपयोगी माना जाता है। बकरी का जन्म स्थान एशिया के सिंध प्रांत को माना जाता है। बकरी सबसे पुराना रोमंथी पशु है, जो मनुष्य के द्वारा 6700ईसा पूर्व से फिलिस्तीन में पालतू बनाकर रखा जाता रहा है। (Goat Farming)

जंगली बकरियों की चार प्रजातियां पाई जाती है:-

  • केपरा इबेक्स
  • सपोनिश इडेक्स
  • मरखोर
  • जंगली बकरी

बकरियों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से हैं:-

श्रेणी या कक्ष= स्तनपायी जो अपने बच्चों को दूध पिलाते हैं।

वर्ग = आर्टीडेक्टाइला

परिवार = बोविडी

उपकुल = केपरिनी

वंश = केपरा

प्रजाति = हिरकस

बकरी का वैज्ञानिक नाम:- केपरिस हिरकस ऐगागेरस

खाद्य एवं कृषि संगठन की 2014 की सांख्यिकी गणना अनुसार इस समय विश्व में कुल बकरियों की संख्या लगभग 876 मिलियन है। विश्व में एशिया महाद्वीप में सबसे अधिक बकरियां पाई जाती है। जो कुल बकरियों का 18% है भारत में विश्व की 1541 प्रतिशत बकरियां पाई जाती हैं, बकरियों की संख्या के हिसाब से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। भारत में बकरियों की संख्या 135.17 मिलियन है। देश में बकरियों की वृद्धि दर 1951 से 2012 के बीच 30.5% रही है, जो अन्य सभी पशुओं की अपेक्षा अधिक है। बकरियों के द्वारा विश्व में 17.84 मिलियन टन दूध, 5.30 मिलियन टन मीट , तथा 1.25 मिलियन टन चमड़े  का उत्पादन होता है।

भारत में बकरियों के द्वारा में 5180.18 हजार टन दूध, 914.13 हजार टन मीट , तथा 163 हजार टन चमड़े का उत्पादन होता है, जो विश्व के कुल दूध उत्पादन का 27.18% उत्पादन का 11.34% तथा 13.2% है। भारत में प्राप्त कुल सकल घरेलू उत्पाद में बकरियों का योगदान 8.5% है। बकरियों के द्वारा 40 मिलियन लोगों को रोजगार की प्राप्ति होती है ज्यादातर (95%) छोटे मध्यम वर्ग के किसान तथा भूमिहीन मजदूर वर्ग से हैं। बकरी पालन सभी जलवायु में कम लागत, साधारण आवास, सामान्य रख-रखाव तथा पालन पोषण के साथ संभव है। इस के उत्पाद की बिक्री हेतु बाजार सर्वत्र उपलब्ध है।

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बकरी पालन क्यों?:-

  • बकरी एक बहुउद्देशीय पशु है। जो भूमिहीनों लघु एवं सीमांत किसानों की अर्थव्यवस्था तथा पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
  • बकरी हर प्रकार के वातावरण में आसानी से पाली जा सकती है।
  • यह प्राकृतिक आपदा के समय बीमा का काम करती है, जब सारी फसल नष्ट हो जाती है तब बकरी ही सहारा बनती है।
  • बकरी पालन के व्यवसाय में शुरुआती खर्च बहुत कम होता है, जिसे गरीब किसान भी आसानी से वहन कर सकता है तथा मात्र 1 वर्ष बाद ही अपना ऋण चूका सकता है।
  • बकरी द्वारा एक साल में 2 बच्चे देना सामान्य बात है। कभी कभी तीन चार बच्चे भी दे देती हैं।
  • बकरी झाड़ियां, खरपतवार तथा कृषि उत्पाद जो मनुष्य के लिए उपयोगी नहीं रहते, पर अच्छी तरह भरण पोषण कर सकती है।
  • बकरी का दूध गाय-भैंस के दूध की अपेक्षा आसानी से पच सकता है, क्योंकि इसमें वसा के कारण छोटे होते हैं।
  • बकरी के दूध में वसा 4.17 प्रतिशत, वसा रहित ठोस पदार्थ 8.17 प्रतिशत, प्रोटीन 3.75%, शर्करा (लेक्टोस) 4.54%, राख 0.8 प्रतिशत, ठोस पदार्थ 13.19% तथा पानी की मात्रा 86.81 प्रतिशत होती है एवं उचित मात्रा में विटामिन पाए जाते हैं।
  • भारत में कुल दूध उत्पादन में बकरियों का योगदान 3.84 प्रतिशत है।
  • बकरी के दूध से प्राप्त पनीर सबसे उत्तम किस्म का माना जाता है। जिसके कारण पूरे विश्व में इसकी मांग अधिक होने के कारण यह बहुत महंगा बिकता है।
  • बकरी से उच्च कोटि वाले प्रोटीन से परिपूर्ण मांस प्राप्त होता है, जो कुपोषण की समस्या का समाधान करता है। बकरी के मांस में लगभग 21 प्रतिशत प्रोटीन एवं 3.6% वसा तथा पर्याप्त मात्रा में खनिज एवं विटामिन पाए जाते हैं।
  • बकरियों से सालाना 914.13 मेट्रिक टन मांस प्राप्त होता है।
  • बकरी का दूध प्राकृतिक रूप से संभागीकृत होने के कारण यह भूख को बढ़ाता है और पाचन शक्ति को सुधारता है बकरी का दूध गाय-भैंस के दूध की तरह एलर्जी नहीं करता है।
  • बकरी के दूध में जीवाणु नाशक तथा फफूंदनाशक गुण पाए जाते हैं।
  • बकरियों से उत्तम गुणों वाले मुहरे तथा पश्मीना (फर) लगभग 18 टन प्राप्त होती है। जिसे बहुत उपयोगी वस्त्र जैसे साल, जैकेट, कंबल आदि बनाए जाते हैं।
  • उत्तम कोटि वाला चमड़ा (लगभग 163 हजार मेट्रिक टन) प्राप्त होता है।
  • बकरी से उच्च कोटि वाले खाद (मींगणिया) प्राप्त होती है, जिसमें फसलों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा अन्य पशुओं से प्राप्त होने वाली खाद गोबर से 2.5 गुना अधिक होती है।
  • बकरी का आकार छोटा एवं शांत प्रकृति का होने के कारण इस के आवास एवं प्रबंधन की समस्या कम होती है।
  • बीमारियां भी अन्य पशुओं से कम होती हैं, जिनका निवारण टिकाकरण करके आसानी से किया जा सकता है। टिकाकरण का खर्चा भी बहुत कम होता है।

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बकरियों का भारत की सकल घरेलू उत्पाद में बहुत बड़ा योगदान है। भारत की सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग 15 50% है। इसमें से पशुपालन का योगदान लगभग 26% है, जिसमें से बकरियों द्वारा प्राप्त आय का हिस्सा 10:00 10% है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बकरी पालन हमारे देश के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि इसके द्वारा किसान आर्थिक रूप से सक्षम होने के साथ-साथ उसके शारीरिक पोषण की आवश्यकता भी पूर्ण हो जाती है। देश में बकरियों के द्वारा दूध एवं मांस का उत्पादन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के आधार पर अनुसार विवरण तालिका में दिया गया है।

कृषि जलवायु क्षेत्रों के आधार पर बकरियों की नस्लों का वर्गीकरण:-

क्र. मंडल/ क्षेत्र बकरी की नस्ल

  1. उत्तरी ठंडा क्षेत्र चौगू, चाँगथांगी, गड्डी, पतंजा
  2. उत्तरी पश्चिमी शुष्क क्षेत्र बीटल, जमनापारी, बारबरी, सिरोही, मारवाड़ी, झखराना, गोहिलवाड़ी, सुरती, कच्छी, झालावाड़ी, मेहसाना
  3. दक्षिणी क्षेत्र सांगमनेरी, ओसमानावादी, कनाईअडू, मालाबारी, कोकनकनियाल, बेरारी
  4. पूर्वी क्षेत्र ब्लैक बंगाल, गंजम, आसाम हिल

मुख्य उत्पादक कार्य के आधार पर बकरियों का वर्गीकरण:-

दूध उत्पादन के लिए    मांस उत्पादन के लिए

बीटल    सुरती, बारबरी, सिरोही, मारवाड़ी, गोहिलवाड़ी, चौगू, चाँगथांगी, ब्लैक बंगाल, कच्छी

जमनापारी झालावाड़ी, मेहसाना, सांगमनेरी, ओसमानावादी, मालाबारी, गंजम

झखराना  गड्डी, आसाम हिल, पतंजा, बेरारी,कोकन, कनियाल

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बकरी पालन को अधिक लाभकारी बनाने के लिए बकरी पालकों को निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान रखना आवश्यक है:-

  • बकरियों की उन्नत नस्ल एवं प्रबंधन
  • बकरियों के लिए आवास प्रबंधन
  • इनके लिए सामान्य प्रबंधन
  • बकरियों के लिए आहार प्रबंधन के
  • बकरियों के लिए स्वास्थ्य प्रबंधन

बकरियों की उन्नत नस्ल एवं प्रजनन प्रबंधन:-

विश्व में लगभग 576 बकरियों की नस्लें पाई जाती है। सबसे अधिक बकरी की नस्लें यूरोप में 215 पाई जाती है। इसके बाद क्रमशः एशिया 184, अफ्रीका में 95, मध्य पूर्व में 34, लैटिन अमेरिका में 28, दक्षिण-पश्चिम पेसिफ़िन में 11 तथा उत्तरी अमेरिका में 8 नस्लें पाई जाती है। इनमें ज्यादातर बकरी की नस्लें मांस उत्पादन हेतु पाली जाती है। दूध उत्पादन हेतु पाली जाने वाली बकरियों की नस्लें कम है।

भारत में सभी बकरियों क्षेत्रों में बकरियां पाली जाती है। क्षेत्र के हिसाब से अधिक बकरियों की संख्या पूर्व क्षेत्र में पाई जाती है, जो कुल बकरियों का 35.85% भाग है। इसके बाद उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में 34.73%, दक्षिण क्षेत्रों में 3.46%, तथा उत्तर पूर्व की पहाड़ियों में 1.10% बकरिया पाई जाती है। बकरियों की संख्या के हिसाब से पश्चिम बंगाल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा बिहार राज्य में अधिक बकरियां पाई जाती है। भारत में पाई जाने वाली लगभग सभी नस्ल की बकरियां स्थानीय कठिन वातावरण, लंबी दूरी की चराई, तीव्र बीमारियों, कम पानी तथा असंतुलित तथा निम्न पोषण के प्रति अधिक सहनशील होती है। भारत में बकरी की 24 नस्ले पाई जाती हैं, जिनको उत्पादन कार्य तथा कृषि जलवायु क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है।

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अधिक जानकारी के लिए वीडियो देखें:-

बकरी पालकों को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:-

  • देशी बकरी का प्रजनन शुद्ध नस्ल के बकरों से करवाएं जिससे उपग्रेडिंग कहते हैं।
  • मादा बकरी का शारीरिक विकास पूर्ण होने पर 12 से 14 महीनों की उम्र में ही प्रथम बार ग्याभिन करवाना चाहिए।
  • बकरा और बकरी के बीच नजदीकी संबंध नहीं होने चाहिए।
  • बकरा और बकरी को अलग-अलग रखना चाहिए।
  • बकरियों को गर्भ होने के समय प्रतिदिन कम से कम 200 से 250 ग्राम दाना मिश्रण अवश्य देवें। जिससे बकरियों में दो बच्चे होने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
  • गर्भावस्था के अंतिम महीने में कम से कम 200 ग्राम दाना मिश्रण अवश्य दें।
  • दूध देने वाली बकरी को प्रत्येक 2.5 से 3.0 लीटर दूध उत्पादन पर 1.0 किलोग्राम दाना का मिश्रण देना चाहिए।
  • बकरियों के आवास में प्रति बकरी 10 से 12 वर्गफीट जगह दें तथा एक घर में एक साथ 50 से 60 बकरियों से ज्यादा नहीं रखे।
  • बच्चे के जन्म के समय बकरियों को साफ सुथरी जगह पर पुआल आदि रखे।
  • बच्चाआने जन्म क समय अगर मदद की आवश्यकता हो, तो साबुन से हाथ धोकर मदद करनी चाहिए।
  • जन्म के उपरांत भी की नाल को 3 इंच छोड़कर नीचे से नए ब्लेड से काट दे तथा टिंचर आयोडीन या प्रोवीडीन लगा देवे। यह दवा 2 से 3 दिन तक लगावे।

  • मेमने को जन्म के 1 घंटे बाद ही खींच पिलाना चाहिए।
  • बकरिया खासकर बच्चों को ठंड से बचाये।
  • बच्चों को मां के साथ रखें तथा रात में मां से अलग कमरे में रखे।
  • नर बच्चों को बंध्याकरण दो माह की उम्र से पहले ही करा देना चाहिए।
  • मेमने को मीट के लिए 9 माह की उम्र के बाद ही बेचे।
  • बकरी के आवास को साफ-सुथरा एवं हवादार रखें।
  • सर्दी के मौसम में बकरी के बच्चों को समय-समय पर टेट्रासाइक्लिन दवा पानी में मिलाकर पिलावे, जिससे न्यूमोनिया का प्रकोप कम होगा।
  • बकरी के बच्चों को कोकसीडीओसीस के प्रकोप से बचाने की दवा डॉक्टर की सलाह से देवे।
  • 3 माह से अधिक उम्र के प्रत्येक मेमने एवं बकरियों को इन्टेरोटॉक्सीमिया तथा पि.पि.आर. का टीका अवश्य लगाएं।
  • बकरियों को नियमित रूप से खुजली से बचाने के लिए जहर (साइपरमेथ्रिन) स्नान करावे तथा बकरियों के आवास में छिड़काव करें।
  • बीमार बकरी का उपचार डॉक्टर की सलाह पर करें।

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बकरियों के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान:-

  • इसके पेट की धरण क्षमता 1474 लेटर होती है.
  • इसमें लाखों करोड़ों की संख्या में जीवाणु होते हैं जो एंजाइम की क्रिया द्वारा घास चारे की सेलुलोस तथा हेमिस सामान्य शर्करा (हेक्टोस) में बदल देते हैं।
  • सामान्यतः नर बकरे 15 से 18 महीने की उम्र में प्रजनन कार्य के लिए तैयार हो जाता है।
  • परंतु पूर्ण रूप से प्रजनन कार्य के लिए 20 से 25 वर्ष उम्र में तैयार होता है।
  • सामान्यत नर बकरे सर्दी तथा बसंत ऋतु में लैंगिक रूप से ज्यादा सक्रिय रहते हैं।
  • एक नर बकरे पर सामान्यतः 2530 बकरिया होनी चाहिए।
  • बकरी के मांस को चीवन कहते हैं।
  • केंद्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र मथुरा (यु.पी.) में स्थित हैं।
  • बकरियों का गर्मी में रहने का समय 18 से 36 घंटे होता है।
  • बकरियों का गर्भकाल 150 (145- 155) दिन होता है।
  • दुग्ध काल सामान्यतः 200 से 250 दिन होता है।
  • बकरियों की उत्पादक जीवन 5 से 8 वर्ष होती हैं।
  • बकरियों का जीवन काल लगभग 12 वर्ष होता है।
  • सामान्यतः बकरियां 2 वर्ष में 3 बच्चे पैदा करती है।
  • सामान्यतया बकरियों का सर्विस काल (ब्यात के बाद ग्याभिन होना) 160 से 220 दिन होता है। सामान्यतः बकरियों का शुष्क काल (दूध ना देना) 110 से 115 दिन होता है।
  • सामान्यतया बकरियों का दो ब्यात के मध्य का समय 210 से 350 दिन होता है।
  • सामान्यतया ज्यादातर बकरिया गर्मी से मार्च माह सितंबर में ब्याती है।
  • बकरियों में दांतों की संख्या 32 होती है।

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