kheti kisani उन्नत खेती

मक्का की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मक्का
Written by Vijay Gaderi

उन्नत किस्में एवं उनकी विशेषताएँ

संकर मक्का गंगा सफेद – 2 (1978):-

यह मक्का की सफेद दानों वाली किस्म है. इसमें दस प्रतिशत प्रोटीन होता है और इसके पौधों की ऊँचाई 200 सें.मी. होती है। यह 115 से 120 दिन में पकने वाली किस्म है जो 45 से 55 क्विंटल प्रति हैक्टर तक उपज देती है।

मक्का

के.एच.-510:-

एकल संकरण द्वारा विकसित पीले दानों की यह किस्म 80 से 85 दिन में पककर तैयार हो जाती है 35 से 40 क्विंटल प्रति हैक्टर तक इसकी पैदावार ली जा सकती है।

बायो- 9637 (1997):-

एकल संकरण द्वारा विकसित पीले दानों वाली यह किस्म 80 से 85 दिन में पककर तैयार होती है। इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 155-165 सेमी. होती है। इसकी औसत पैदावार 35-40 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। इस किस्म में कीट एवं बीमारियों के लिये प्रतिरोधक क्षमता है।

बायो-9681 (1997):-

एकल संकरण द्वारा विकसित पीले दानों वाली इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 175-185 सेमी. होती है। 95-100 दिन में पककर यह किस्म 45-50 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज देती है। यह किस्म संभाग के सिंचित क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है।

जी. एम. 6 (2003):-

सफेद दानों वाली मक्का की यह संकुल किस्म है। यह 80 से 85 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उपज क्षमता 25 से 30 क्विंटल प्रति हैक्टर है। इसकी माजर 45 दिनों में आ जाती है एवं पौधे की ऊंचाई 190 से 200 सेमी. तक होती है।

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माधुरी (1990):-

मक्का की यह संकुल किस्म मीठे दानों वाली है। इसकी बुवाई हरे भुट्टे बाजार में बेचने के लिए की जाती है। इसके भुट्टे 55 से 60 दिन में तोड़ें जाते है। इसके दानों का रंग पीला होता है। इस संभाग में इसकी खेती रबी या जायद मौसम में शहर एवं कस्बों के आस-पास के क्षेत्रों में अधिक फायदेमंद सिद्ध हुई है।

नवजोत (जे. 684) (1982 ):-

यह मध्यम समय में पकने वाली पीले दानों की संकुल किस्म है जो कि 85 दिन में पककर 30 से 35 क्विंटल प्रति हैक्टर की पैदावार देती है। वर्षा पोषित क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त पाई गई है।

माही धवल (1996):-

यह सफेद एवं कठोर दाने वाली संकुल किस्म है। यह किस्म 95-100 दिन में पककर 35-44 क्विंटल प्रति हैक्टर तक उपज देती है। इसके पौधों की ऊँचाई 160 से 220 सें.मी. होती है। यह किस्म तुलासिता एवं मेंडिस पत्ती ( झुलसा रोग) व तना छेदक कीट से सामान्यतः प्रतिरोधी है। यह किस्म सामान्य व अधिक वर्षा वाले क्षेत्र जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है व राज्य के सिंचित क्षेत्रों हेतु उपयुक्त है।

माही कंचन (1995):-

यह पीले व ठोस दानों वाली संकुल किस्म है। यह किस्म 75 से 80 दिनों में पककर 25-30 विचं प्रति हैक्टर तक उपज देती है। इसके पौधों की ऊँचाई 150-190 सें. मी. होती है। यह किस्म तुलासिता एवं मेंडिस पत्ती (झुलसा रोग) व तना छेदक कीट से सामान्य प्रतिरोधी है। यह किस्म सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।

हिम 129 (1997):-

यह एक संकर किस्म है जो कि कम समय (80-85 दिन) में पककर 30 से 33 क्विंटल प्रति हैक्टर की उपज देती है। इसके दाने पीले कठोर होते हैं तथा पौधे की ऊँचाई 154 से 160 सें.मी. व भुट्टा 60 से 66 सें.मी. ऊँचाई पर लगता है।

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पी.ई.एच.एम. -2 (पूसा अर्ली हाइब्रीड मेज-2) (1997):-

यह पीले दानों वाली संकर किस्म है। यह 80-85 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। यह 33-40 क्विंटल प्रति हैक्टर की उपज देती है। इसके दाने पीले कठोर होते हैं। पौधों की ऊँचाई 170-190 सें.मी. है तथा भुट्टा जमीन की सतह से 80-85 सें. मी. ऊँचाई पर लगता है। यह शीघ्र पकने वाली संकर किस्म वर्षा पोषित क्षैत्रों के लिए उपयुक्त है। हरे भूट्टे की खेती हेतु भी इस किस्म का प्रयोग करें।

प्रताप संकर मक्का 1 (2003):-

यह एक संकर किस्म है जो कि कम समय (80-82 दिन) में पककर 35-38 क्विंटल प्रति हैक्टर की उपज देती है। इसके दाने सफेद बड़े व चमकदार तथा पौधे की ऊँचाई 170 – 180 सें.मी. होती है। वर्षा पोषित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म है।

प्रताप मक्का– 3 (2004):-

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्व विद्यालय उदयपुर द्वारा विकसित यह एक संकुल किस्म है। इस किस्म का दाना सफेद, कठोर, मोटा एवं चमकीला है। यह किस्म 75 से 78 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। पौधे की ऊँचाई 170–180 से.मी. है और भुट्टे पौधे के मध्य लगते है। इस किस्म की उत्पादन क्षमता 40-45 क्विटल प्रति हैक्टर है। यह मृदुारोमिल तुलासिता, तना विगलन रोग के प्रति रोधक क्षमता तथा तना छेदक कीट के प्रति सहिष्णु किस्म है। यह किस्म राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के असिचिंत क्षेत्रों के लिए विशेष उपयुक्त पाई गयी है।

प्रताप मक्का – 5 (2004):-

यह मध्यम अवधि (85-90 दिन) में पकने वाली संकुल किस्म है। इसका दाना मोटा, कठोर व सफेद रंग का होता है। इसके पौधे की ऊंचाई 195-205 से.मी. होती है तथा भुट्टा तने के लगभग मध्य में लगता है। इसकी उत्पादन क्षमता 45-50 क्विंटल प्रति हैक्टर है। यह तना विगलन व तुलासिता रोग तथा तना छेदक कीट हेतु सामान्य प्रतिरोधी है। यह किस्म सिंचित तथा असिंचित क्षेत्रों हेतु उपयुक्त।

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एच.क्यू.पी.एम.-1 (2005):-

यह उच्च गुणवता मक्का की संकर किस्म है। जो 100 से 110 दिनों में पककर तैयार होती है। इस किस्म का दाना पीला व आकर्षक होता है। इसकी औसत उपज क्षमता 45 से 55 क्विंटल प्रति हैक्टर तक होती है। यह सिंचित क्षेत्रों के लिए उचित संकर किस्म है। यह कीटो, सूत्रकृमि एवं रोगो से प्रतिरोधी है एवं प्रोटीन कुपोषण निवारण के लिये गुणवत्ता मक्का की उचित किस्म

प्रताप मक्का चरी–6 (2009):-

यह मक्का चारे की संकुल किस्म है। इसके पौधे की ऊंचाई 265-275 सेमी. होती है तथा तने की मोटाई कम होती है। इसका हरा चारा 58 से 60 दिन में पशुओं को खिलाने के योग्य हो जाता है। हरे चारे की उपज 350-400 क्विंटल प्रति हैक्टर होती है। यदि हरे चारे के लिए कटाई नहीं की जाय तो 38-40 क्विंटल दाना तथा 70-80 क्विंटल सूखा चारा (कड़बी) प्रति हैक्टर प्राप्त होती है। इसका दाना सफेद, मोटा तथा कठोर होता है। यह किस्म तना छेदक, पत्ती झुलसा व सुत्रकृमी प्रतिरोधी है। यह किस्म राजस्थान, पंजाब, हरियाणा व उत्तरांचल राज्यों हेतु उपयुक्त पाई गई है। इसमें हाइड्रोसायनिक अम्ल नहीं पाया जाता है इस कारण यह पौधों की किसी भी अवस्था पर काटकर पशुओं को खिलाई जा सकती है।

प्रताप एच.क्यू.पी.एम.-1 (2007):-

एकल संकरण द्वारा विकसित पीले दाने वाली यह किस्म 95 105 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 40-50 क्विण्टल प्रति हैक्टर होने के साथ ही 9-10 प्रतिशत प्रोटीन एवं आवश्यक ऐमिनो एसिड की मात्रा सही अनुपात में पाई जाती है।

बायो 9682:-

चमकीले नारंगी पीले दानों वाली संकर मक्का की यह किस्म 90-95 दिनो में पककर 40-50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर की उपज देती है। इसके भुट्टे नुकीले लम्बे जिसमें औसतन 14 दानों की कतार होती है। संभाग के सिंचित क्षेत्रों के लिए यह किस्म उपयुक्त है।

हरे चारे हेतु मक्का की उन्नत किस्म एंव पोषक तत्व प्रबन्धन

प्रातप मक्का चरी -6 (2006):-

मक्का की संकुल किस्म, हरे चारे हेतु कतार कतार की दूरी 30 सेमी एवं पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी रखते हुए बुवाई करे।

हरे चारे हेतू प्रताप मक्का चरी-6 को 150 किग्रा. नत्रजन + 50 किग्रा फॉस्फोरस दें। सम्पूर्ण फॉस्फोरस व 1 / 3 नत्रजन बुवाई पर एवं शेष नत्रजन दो चरणों में घुटनों तक की अवस्था पर एंव मांजरे निकलने से पूर्व दे।

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फूले की मक्का (Pop Corn) की उन्नत किस्म एंव पोषक तत्व प्रबन्धन:-

वी. एल. अम्बर (2004):-

-यह एक संकुल किस्म हैं जो पोप कोर्न हेतु उपयुक्त हैं यह किस्म 80-85 दिनों में पक जाती है एंव इससे औसत 14-15 क्विंटल प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है।

फूले की मक्का की संकुल किस्म वी. एल. अम्बर पोप कोर्न को 130 किग्रा नत्रजन + 50 किग्रा फॉस्फोरस प्रति हेक्टर की दर से दें । सम्पूर्ण फॉस्फोरस बुवाई के समय एंव नत्रजन तीन चरणों में 1 / 3 बुवाई पर, 1/3 घुटनो तक की अवस्था एंव शेष 1/2 मांजरे निकलने पर दें ।

खेत की तैयारी:-

उन्नत मक्का बोने के लिये ऐसे खेत का चुनाव करें जिसमें जल निकास की पूरी व्यवस्था हो । रेतीली दोमट मिट्टी में भी चिकनी मिट्टी की तरह मक्का बोई जा सकती है। भूमि लवणीयता या क्षारीयता से ग्रस्त नहीं होनी चाहिये। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद में देशी हल या त्रिफाली या बक्खर से जुताई करके खेत को अच्छी तरह तैयार कर लीजिये। बीज अंकुरण के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिये। जुताई से 20 दिन पूर्व प्रति हैक्टर 20 से 25 गाड़ी गोबर की खाद डाल कर भली प्रकार से मिला दीजिये।

भूमि उपचार:-

र्बोफ्यूरान 3 जी 25-30 किलो प्रति हैक्टर द्वारा भूमि उपचार से मक्का को कोषयुक्त सूत्रकृमि एवं सफेद लट के प्रकोप से बचाव किया जा सकता है।

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बीजोपचार:-

मक्का के प्रमाणित बीज वैसे तो उपचारित करके ही वितरित होते है। परन्तु यदि बीज उपचारित न हो तो बीज को 4 ग्राम मेटालक्सिल प्रति किलो बीज अथवा मेटालक्सिल तरल 1.2 मिली/ किलो बीज कवकनाशी से प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करें।

कोषयुक्त सुत्रकृमी रोग के प्रबन्धन हेतु एसीफेट 75 एस. पी. 26.67 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें अथवा मक्का के बीजो को 20 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से ट्राइकोडरमा विरिडी नामक जैव कारक से उपचारित करें, साथ ही बुवाई के समय अरण्डी खल 2 क्विंटल प्रति हैक्टर मृदा उपचार के रूप में प्रयोग में लें।

मक्का में धारीदार पर्ण एवं पर्ण आच्छद झुलसा रोग नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. दो ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार एवं रोग प्रकट होते हैं। कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. दो ग्राम प्रति लीटर पानी अथवा नीम का तेल चार मिलीलीटर प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार एवं रोग प्रकट होते ही नीम का तेल दो मिली लीटर प्रति लीटर का घोल बनाकर तने के निचले भाग पर छिडकाव करें।

बीज के उपयोग हेतु संग्रहित मक्का को भण्डारण में धान्य शलभ (साइटोट्रोगा) के प्रकोप से बचाने के लिए बीजों को मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण से 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें तथा उनको फेनवेलरेट 20 ई.सी. एक मि.ली. प्रति लीटर पानी के घोल से उपचारित बोरियों में रखें।
वर्षा पोषित मक्का के बीजों को बुवाई से पूर्व 0.1 प्रतिशत थायोयूरिया के घोल से 6 घण्टे उपचारित करें। बीजों को छाया में सुखा कर बुवाई करें। इस उपचार से अंकुरण जल्दी होता है एवं नवांकुर ज्यादा समय तक सूखा सहन कर सकता है।

बीज दर एवं बुवाई:-

प्रति हैक्टर 20-25 किलो उन्नत मक्का का प्रमाणित बीज बोइये बुवाई जून के अन्त या जुलाई के प्रथम सप्ताह तक कीजिये। जहाँ सिंचाई उपलब्ध है वहाँ सिंचाई कर मक्का की बुवाई 15 से 30 जून तक कर दें। जुलाई प्रथम सप्ताह तक अगर मानसून वर्षा न हो तो पूर्व तैयार खेत में मानसून की संभावना को देखते हुए 2 से 3 दिन पूर्व मक्का की सूखी बुवाई करना लाभप्रद है। बुवाई हल के पीछे कतारों में कीजिए।

कतार से कतार की दूरी 60 सें.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 25 सें.मी. रखिये। बीज 6 सें.मी. से अधिक गहरा न बोयें, इससे अंकुरण में सरलता रहती है और उर्वरक एवं बीजों में सम्पर्क भी नहीं होता है। पौधे की संख्या 66000 प्रति हैक्टर रखिये। अधिक उपज के लिए समय पर बुवाई किया जाना आवश्यक है। जून के अन्तिम सप्ताह के बाद मक्का की बुवाई करने पर उपज में प्रतिदिन की देरी पर औसतन 50 किलो प्रति हैक्टर गिरावट आ सकती है।

मक्का की जल्द पकने वाली किस्मों में पौधों की संख्या 75 से 80 हजार प्रति हैक्टर रखें। कतार से कतार की दूरी 45 सें.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 27 से 30 सें.मी. रखें तथा प्रति हैक्टर 30 से 35 किलोग्राम बीज का प्रयोग करें।

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पौध दर:-

हरे भुट्टे की खेती एवं मीठी मक्का (स्वीट कोन) की किस्म माधुरी हेतु मक्का की पौध दर 83 हजार / हैक्टर (60 से.मी. x 20 से.मी.) रखे।

उर्वरक:-

कारक (वर्षा, सिचित, असिचित, किस्म, उपयोगिता)नाइट्रोजन किग्रा / हेक्टर

 

फास्फोरस किग्रा / हैक्टरपोटाश किग्रा / हैक्टर

 

अन्य

 

सिंचित903030नाइट्रोजन की एक तिहाई फास्फोरस व पोटाश पूरी मात्रा बुवाई के साथ, नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा 30 दिन बाद व शेष एक तिहाई मात्रा मांजरे निकलने से पूर्व
सिंचित903030नाइट्रोजन की 20% फारफोरस व पोटाश पूरी मात्रा बुवाई के साथ, नाइट्रोजन की 30 % मात्रा 8-10 पत्तिया, 30 % मांजरे निकलते समय व शेष 20 % मात्रा दाना पकते समय
देरी से पकने वाली किस्मू
असिंचित
50
30
नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश पूरी मात्रा बुवाई के साथ, नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा माजरे निकलने से पूर्व
यूरिया क्षमता बढ़ाने हेतु 25 ग्राम निमसार (निमिन) / किग्रा से परत चढ़ाने से 12-18 किग्रा है. नत्रजन की बचत होती है.
सामान्य6040सम्पूर्ण फास्फोरस बुवाई के समय एव नत्रजन तीन चरणों-1 / 3 बुवाई पर, 1/3 घुटनों तक की अवस्था पर एव शेष 1/3 मांजरे निकलने पर
 1 सिंचित क्षेत्र में मक्का-गेहूं सोयाबीन फसल चक्र में अधिक उत्पादन के लिए 25 किग्रा. ZnSO प्रयोग करें।
 2 बारानी क्षेत्र मे मक्का-उडद द्विवर्षीय फसल चक्र में अधिक उत्पादन के लिए नाइट्रोजन की आधी मात्रा कार्बनिक खाद से व शेष आधी मात्रा के लिए यूरिया का प्रयोग करें।
 3 बारानी क्षेत्र में मक्का में चारे की उपज बढ़ाने हेतु मांजर निकलने के 7 दिन बाद एक पौधा छोड़ कर एक पौधे से माजरे निकाले इससे दाने की उपज प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
बारानी / कम नाइट्रोजन वाली50+12.5 (25% अधिक)30जिंक की कमी होने पर 25 किग्रा. ZnSO4 का प्रयोग करें।
HQPM-1175 (4 भागो में)303040 किलो सल्फर
HQPM-115(3 भागो में)303010-12 टन FYMया 3-4 टन वर्मी कम्पोस्ट
कारक (वर्षा,सिचिंत, असिचिंत, किस्म, उपयोगिता)नाइट्रोजन किग्रा / हैक्टर

 

फास्फोरस किग्रा / हैक्टरपोटाश किग्रा / हैक्टर

 

अन्य

 

स्वीट कार्न (माधुरी + मूँग)90 (2 भागो में)50 
बेबी कार्न120 (3 भागो में)40 

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समन्वित पोषण प्रबंधनः-

मक्का-उड़द फसलक्रम में 15 किलोग्राम नत्रजन देशी खाद से तथा 10 किलोग्राम नत्रजन सुबबूल की हरि पत्तियों से बुवाई के समय मिट्टी में मिलाना चाहिए तथा शेष नत्रजन की 25 किलोग्राम मात्रा युरिया से बुवाई से के 30 दिन बाद दें।
मक्का की फसल पर लम्बे सूखा अन्तराल में सूखा प्रभाव कम करने हेतु उर्वरकों एव रसायनों के छिड़काव का प्रभावी उपयोग कर उपज बढ़ाने के लिए मजरे आने की पूर्व अवस्था से दाना कठोर होने की अवधि तक लम्बे सूखा अन्तरालों (10 दिन से अधिक के प्रत्येक सूखा काल में) जिंक सल्फेट 0.5 प्रतिशत + एन. पी. के. घुलनशील (19:19:19 ) 2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।

अंतःआश्य:-

असिंचित क्षेत्रों में मक्का तथा अरहर अन्तराशस्य में सिफारिश की गई नत्रजन की आधी मात्रा देशी खाद (गोबर की खाद) द्वारा दी जावे। असिंचित मक्का के साथ अन्तराशस्य देने हेतु उड़द या सोयाबीन भी बो सकते हैं। मक्का की दो कतारों के बाद उड़द (टी-9 किस्म) की दो कतारें बोइये मक्का की एक कतार के बाद सोयाबीन की एक कतार की बुवाई 30 सें.मी. की दूरी पर करें मक्का की एक कतार के बाद मूँग अथवा चैवला की एक कतार की बुवाई 30 सें. मी. की दूरी पर करें। मक्का की संकर किस्मों के साथ सोयाबीन एम.ए.सी.एस. 13 तथा ग्वार (आर.जी.सी. 936) का सफलतापूर्वक अन्तराशस्यावर्तन किया जा सकता है इसके लिए मक्का की दो कतारें 30 सेमी. दूरी पर लगावें फिर संकुल किस्मों के साथ मोनेटा किस्म अन्तराशस्य के लिये उपयुक्त रहती है।

मक्का के साथ ग्वार (आर.जी.सी. 936) का सफलतापूर्वक अन्तराशस्य किया जा सकता है। इसके लिए मक्का की दो कतारें 30 से.मी. दूरी पर लगावें फिर ग्वार की दो कतारों 30 से.मी. दूरी पर लगाने एवं इसी तरह मक्का, ग्वार 2:2 कतारों के क्रम में लगावें।

बारानी क्षेत्रों में निश्चित उपज हेतु मक्का किस्म प्रताप मक्का-3 के साथ उड़द की किस्म आर.बी.यू. 38 (2:2) के साथ अन्तराशस्य करें ।
मीठी मक्का (स्वीट कोर्न) की किस्म माधुरी में दो कतारों के मध्य एक कतार मूंग की बोएं।

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सिंचाई:-

आवश्यकतानुसार फसल में सिंचाई दीजिए। ध्यान रखिये कि पौधों की बढ़वार और मांजरे आते समय पानी की अधिक आवश्यकता होती है। अतः वर्षा न हो तो इस समय सिंचाई अवश्य कर दीजिए।

निराई-गुड़ाई:-

मक्का की फसल को शुरू के 20-30 दिन तक खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिये। खेत की गुड़ाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि पौधों की जड़ें न कट जायें, अतः पौधों के नजदीक गुड़ाई न करें। जहाँ निराई-गुड़ाई संभव न हो वहाँ खरपतवार नष्ट करने के लिए एकल फसल में बुवाई के बाद खरपतवार उगने से पहले प्रति हैक्टर आधा किलो एट्राजीन सक्रिय तत्व को 600 लीटर पानी में घोलकर मक्का की फसल पर छिड़कें। यदि वर्षा हो जाये तो भी दुबारा छिड़काव न करें।

मक्का में खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण हेतु 0.5 कि.ग्रा. एट्राजीन+ 1.5 किलोग्राम एलाक्लोर को मिलाकर 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर अंकुरण से पहले समान रूप से छिड़काव करें तथा 25-30 दिन की फसल अवस्था पर निराई-गुड़ाई करें। एट्राजीन का घोल बनाकर छिड़काव नहीं कर पाने की स्थिति में 0.5 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व को 10-15 किलो रेत में अच्छी तरह मिलाकर अंकुरण से पूर्व नमी होने की स्थिति में समान रूप से भुरकाव करें। उक्त खरपतवारनाशियों को मक्का के पश्चात् रखी में गेहूं की फसल पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

अन्तराशस्य में दो बार निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकालें अथवा बुवाई के दो | दिन के अन्दर प्रति हैक्टर एक कि.ग्रा. नेटलाक्लोर या 0.75 किग्रा पेन्डीमिथेलीन सक्रिय तत्व को 600 लीटर पानी घोलकर खेत में समान रूप से छिड़कें। मक्का आधारित दलहनी फसलों की अन्तराशस्य क्रियाएँ अपनाने पर रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु 20 कि.ग्रा. एलाक्लोर खरपतवारनाशी को 600 लीटर पानी में घोल कर बुवाई के दो दिनों के अन्दर घोल का समान रूप से छिड़काव कर खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। मक्का – ग्वार अन्तर्राशस्यावर्तन में खरपतवार नियंत्रण हेतु 0.75 किग्रा. पेण्डीमिथेलीन को 1600 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण पूर्व छिड़काव करें एवं 30-35 दिन पश्चात् एक खुदाई करें।

खरीफ मक्का में बुवाई के 20-25 दिन पश्चात् टेम्बोट्रिऑन 90-120 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करने से खरपतवार नियंत्रण एवं फसल उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है।

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फसल सरक्षण:-

तना छेदक:-

इसकी रोकथाम के लिए मक्का की बुवाई के 15-30 दिन में फोरेट 10 जी अथवा कार्बोफ्यूरान 3 जी 7.5 किलोग्राम प्रति हैक्टर के हिसाब से पौधों के पोटों में डालें या कार्बेरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 1.8 किलोग्राम 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। कणों को सही ढंग व मात्रा में डालने के लिए कण विसरित करने वाले उपकरणों का प्रयोग करें।

जैविक कीट प्रबन्ध हेतु ट्राइकोग्रामा अण्ड परजीवी 1.5 लाख प्रति हैक्टर की दर से फसल की 10, 20 एवं 30 दिन की अवस्था पर छोड़ना प्रभावी रहता है।

मोयला या चैपा (एफिड):-

मांजरे निकलते समय मोयला का भारी प्रकोप होने पर | इसकी रोकथाम हेतु एक लीटर मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. को 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर छिड़कें।

फड़का एवं सैन्य कीट:-

फड़का एवं सैन्य कीट का प्रकोप होने पर फसल पर मिथाईल पैराथियॉन 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टर भुरक दें। फड़का के प्रभावी नियंत्रण हेतु पडत भूमि पर ग्रीष्मकालीन जुताई करें। फड़के के नियंत्रण हेतु क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. 1.25 ली. या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. 1.25 ली. या डाईक्लोरोवॉस 76 ई.सी. 1.0 ली. प्रति हैक्टर की दर से सावधानीपूर्वक गैर-फसल क्षेत्रों / मेडो पर सीट्टे / भुट्टे आने से पूर्व प्रारम्भिक अवस्था में छिड़के।

तुलासिता (डाउनी मिल्ड्यू):-
  1. बुवाई जून माह में मानसून की पहली वर्षा आते ही कर देनी चाहिए अथवा सिंचाई की सुविधा होने पर इसकी बुवाई 15 से 20 जून के मध्य अवश्य कर दें।
  2. बीज 10-15 प्रतिशत अधिक बोइये ताकि बाद में रोगी पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर सकें।
  3. जहाँ इस रोग का भारी प्रकोप होता है वहाँ रोग ग्राही किस्मों के स्थान पर मक्का की अन्य रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे प्रतापसंकर मक्का-1, प्रतापसंकर मक्का बोई जानी चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देते ही रोगग्रस्त पौधे उखाड़ देने चाहिए। रोग नियन्त्रण हेतु मेटालक्सिल – 35 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचार प्रभावी है।
  4. मक्का के खेत और उसके आसपास लापलिया घास (हेटेरोपोगोन कोनटोरटस हेटेरोपोगोन मेलेनोकारपस) को नहीं पनपने दें अथवा निराई-गुड़ाई करके नष्ट कर क्योंकि मक्का का तुलासिता (डाउनी मिल्ड्यू) रोग लापलिया घास पर विभिन्न अवस्थाओं में जीवित रह कर मक्का की फसल पर प्रतिवर्ष तुलासिता रोग फैलात है।

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मेडिस पत्ती झुलसा रोग:-

ऐसे क्षेत्रों में जहाँ रोग सामान्य रूप से उग्रता करता है ए जहाँ फसल अच्छी होने की सम्भावना है (विशेषकर सिंचित एवं बीज उत्पादन के क्षेत्र में) वहाँ रोग नियंत्रण हेतु मैन्कोजेब + कार्बेन्डाजिम दवा के 0.2 प्रतिशत घोल क छिड़काव फसल की एक माह की अवस्था पर करें। आवश्यकतानुसार छिड़काव 10-1 दिन बाद दोहरावें। समय पर बोई हुई देरी से पकने वाली किस्मों में (मालन क छोड़कर) एवं जहाँ नत्रजन पूरा दिया हो वहाँ रोग का प्रभाव नगण्य होता है।

धारीदार पर्ण एवं पर्ण आच्छद झुलसा रोग:-

रोग प्रकट होते ही नीम का तेल चा मिली लीटर प्रति लीटर का घोल बनाकर तने निचले भाग पर छिडकाव करें।

सूत्र कृमि नियंत्रण:-

मक्का में कोष युक्त सूत्रकृमि हेटेरोडेरा जी के प्रबन्धन हेत प्रथम निराई-गुड़ाई के समय मृदा उपचार के रूप में फोरेट 10 जी कण 20 किलोग्रा प्रति हैक्टर की मात्रा से प्रयोग में लें।
मक्का में सूत्रकृमी प्रबंधन के लिए अन्तराशस्य के रूप में मक्का की दो कतारों व बाद सोयाबीन या तिल की दो कतारें 30 से.मी. की दूरी पर लगायें।

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Vijay Gaderi

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