kheti kisani सब्जियों की खेती

मिर्च की उन्नत खेती किसानों एवं उत्पादन तकनीक

मिर्च की उन्नत खेती किसानों एवं उत्पादन तकनीक
Written by Bheru Lal Gaderi

मिर्च भारत के अनेक राज्यों में पहाड़ी व मैदानी क्षेत्रों में सफलता पूर्वक उगाई जाती हैं। उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हैं मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जाता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेतों में प्रतिरोपित कर दी जाती हैं। इसके अलावा दूसरी फसल के लिए बुवाई नवंबर दिसंबर में की जाती है और फसल मार्च से मई तक ले जाती है।

मिर्च कैप्सिकम वंश का एक फल माना जाता है तथा यह सोलेनेसी कुल का एक सदस्य है। मिर्च प्राप्त करने के लिए इसकी खेती की जाती हैं। मिर्च भारतीय व्यंजन में डाला जाने वाला महत्वपूर्ण साला है। देश में मिर्च का उपयोग हरी मिर्च के रूप में एवं मसाले के रुप में किया जाता है। इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है। इस की खेती जायद एवं खरीफ दोनों फसलों में की जाती हैं। मिर्च की खेती की शुरुआत दक्षिणी अमेरिका से हुई थी और अब पूरे विश्व में इसकी खेती की जाती है। मिर्च खाने को चटपटा बना देती हैं विशेषकर सब्जियों को। लोग इसका इस्तेमाल ताजा हरी मिर्च और सूखी लाल मिर्च के तौर पर भी करते हैं।

मिर्च की उन्नत खेती किसानों एवं उत्पादन तकनीक

जलवायु:-

मिर्च गर्म और आद्र जलवायु में भली-भांति उगती हैं। लेकिन फलों के पकते  समय शुष्क मौसम का होना आवश्यक है। गर्म मौसम की फसल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता जब तक मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का प्रकोप चला न गया हो बीजों का अंकुरण 18 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर होता है। यदि फूलते समय और फल बनते समय भूमि में नमी की कमी हो जाती है तो फलिया, फल, छोटे फल गिरने लगते है। मिर्च के फूल व फल आने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड है। तेज मिर्च अपेक्षाकृत अधिक गर्मी सह लेती हैं। फूलते समय ओस गिरना या तेज वर्षा होना फसल के लिए नुकसानदायक होता है। क्योंकि इसके कारण फूल फल टूटकर गिर जाते है।

Read Also:- गुग्गल की उन्नत खेती कैसे करें ?

मिर्च की उन्नतशील प्रजातियां:-

मिर्च की फसल में दो तरह की प्रजातियां हैं :-

पहली:-

पूसा ज्वाला, पंत सी-1, पूसा सदाबहार, जी-4, आजाद मिर्च-1, चंचल, कल्याणपुर चमन आदि  है।

दूसरी:-

संकर प्रजातियां तेजस्विनी, अग्नि, चैंपियन, ज्योति एवं सूर्या आदि।

पूसा ज्वाला:-

इसके पौधे छोटे आकार के और पत्तियां चौड़ी होती हैं। फल ९-10 सेंटीमीटर लंबे, पतले, हल्के हरे रंग के होते हैं जो पकने पर हल्के लाल हो जाते हैं। इसकी औसत उपज 75 से 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, हरी मिर्च के लिए तथा 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर सूखी मिर्च के लिए होती हैं।

पूसा सदाबहार:-

इस किस्म के पौधे सीधे व लंबे 60-80 सेंटीमीटर होते हैं। फल 6- 8 सेंटीमीटर लम्बे, गुच्छों में, 6-14 फल प्रति गुच्छा में आते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर लगते हैं। पके हुए फल चमकदार लाल रंग ले लेते हैं। औसत पैदावार 90 से 100 क्विंटल हरी मिर्च के लिए तथा 20 क्विंटल प्रति हेक्टर सूखी मिर्च के लिए होती हैं। ये किस्म में मरोडिया, लीफ कर्ल और मोजेक रोगों के लिए प्रतिरोधी है।

निजी कंपनियों द्वारा विकसित किस्में:-

 सिजेंटा इंडिया :-

रोशनी हॉटलाइन, पिकाडोर, अभिरेखा, एच.पी.एच-2424।

 नामधारी सीड्स:-

एन. एस.- 686, 222, 1701, 408 407 250 208 प्रगति।

मिर्च की बीज दर:-

एक से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज लगभग एक हेक्टर में रोपने लायक पर्याप्त पौधे बनाने के लिए काफी होता है।

Read Also:- ग्लेडियोलस की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मिर्च की पौधशाला नर्सरी:-

पौधशाला के लिए उपजाऊ अच्छी जल धारण क्षमता व जल निकास वाली, जहां पेड़ की छाया रहित खरपतवार मुक्त भूमि का चयन करना चाहिए। गौशाला में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना भी जरुरी है। पौधशाला को पाले से बचाने के लिए नवंबर दिसंबर में पानी का अच्छा प्रबंध होना चाहिए।

पौधशाला की लंबाई 10-15  फुट तक चौड़ाई 2.33-3 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि निराई व अन्य कार्यों में कठिनाई आती है। पौधशाला की ऊंचाई 6 इंच से ज्यादा नहीं रखनी चाहिए। 5-10 सेंटीमीटर के अन्तर 2-2.5 सेंटीमीटर गहरी नाली बनाकर उसमें बीज बोए। बीज की बुवाई कतारों में करें। कतारों  का फासला 5-7 सेंटीमीटर रखा जाता है।

नर्सरी की देखभाल:-

  1. पौधशाला में आवश्यकतानुसार फव्वारें से पानी देते रहे।
  2. गर्मियों में एग्रो नेट का प्रयोग करने से भी भूमि में नमी जल्दी उठ जाती हैं। जिससे कभी-कभी दोपहर के बाद एक दिन के अंतर पर पानी छिड़के।
  3. बारिश के मौसम में पानी के निकास की व्यवस्था करें।
  4. बीज के अंकुरण के 4 से 5 दिन बाद घास आवरण हटाए। क्यारियों में से घास कचरा साफ करें।

Read Also:- अंगूर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

मिर्च में पौध संरक्षण:-

आद्र गलन रोग:-

यह लोग ज्यादातर नर्सरी के पौधे में आता है। इस रोग में सतह जमीन के पास से हुआ तना गलने लगता है तथा पौधा मर जाता है। इस रोग से बचाने के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार फफूंदनाशी कैप्टान नामक दवा के  2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए। इसके अलावा कैप्टान 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर सप्ताह में एक बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज रोग:-

इस रोग में पत्तियों और फलों में विशेष आकार के गहरे भूरे और काले रंग के धब्बे पड़ते हैं। इसके बचाव के लिए मैंकोजेब या कार्बेंडाजिम नामक दवा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

मरोडिया लीफ कर्ल रोग:-

यह मिर्च की एक भयंकर बीमारी है। यह रोग बरसात की फसल में ज्यादातर आता है। शुरू में पत्ते मुरझा जाते हैं एवं वृद्धि रुक जाती है। अगर इसे समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह पैदावार को भारी नुकसान पहुंचाता है। यह एक विषाणु रोग हैं जिसका कोई दवा द्वारा नियंत्रण नहीं किया जा सकता है।

यह रोग विषाणु सफेद मक्की से फैलता है अतः  इसका नियंत्रण भी सफेद मक्खी से ही किया जा सकता है। इसके नियंत्रण के लिए रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर  देना चाहिए। 15 दिन के अंतराल में कीटनाशक रोगर या में मैटासिस्टाक्स 2 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें। इस रोग की प्रतिरोधी किस्म जैसे – पूसा ज्वाला, पूसा सदाबहार और पंत सी -1 को लगाना चाहिए।

मोजेक रोग:-

इस रोग में हलके पीले रंग के धब्बे पत्तों पर पड़ जाते हैं। बाद में पत्तियां पूरी तरह से पीली पड़ जाती है तथा वृद्धि रुक जाती है।

थ्रिप्स एवं एफिड:-

यह किट पत्तियों से रस चूसते हैं और उपज के लिए हानिकारक होते हैं। रोगर या मैटासिस्टाक्स 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इसका नियंत्रण किया जा सकता है।

Read Also:- अजोला बारानी क्षेत्र में हरे चारे की उपयोगिता एवं उत्पादन

मृदा एवं खेत की तैयारी:-

मिर्च यधपि अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाई जा सकती हैं, तो भी अच्छी जल निकासी व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्वो युक्त दोमट मिट्टीया इसके लिए सर्वोत्तम होती हैं। जहां फसल काल छोटा है वहां बुई तथा बलुई दोमट मिट्टी को प्राथमिकता दी जाती हैं। बरसात फसल भारी तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जाने चाहिए। जमीन 5-6 बार जोतकर व पाटा फेरकर समतल कर ली जाती हैं।  गोबर की अच्छी पकी हुई खाद 300 से 400 क्विंटल, जुताई के समय मिला देनी चाहिए। खेत की मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए तथा उचित आकार के क्यारियाँ बना लेते हैं।

खाद एवं उर्वरक:-

गोबर की खाद लगभग 300- 400 क्विंटल जुताई के समय मृदा में मिला देना चाहिए। रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया, 175 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 2 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश तथा 150 किलोग्राम यूरिया बाद में लगाने की सिफारिश की जाती है। यूरिया उर्वरक फूल आने से पहले अवश्य दे देना चाहिए।

मिर्च की रोपाई:-

मैदानी और पहाड़ी, दोनों ही लायक इलाकों में मिर्च की रोपाई के लिए सर्वोत्तम समय अप्रैल-जून तक का होता है। बड़े फलों वाली किस्में मैदानी में अगस्त से सितंबर तक या इससे पूर्व जून-जुलाई में बोई जाती है। उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध है, मिर्च का बीज मानसून आने से लगभग 6 सप्ताह पूर्व बोया जाता है और मानसून आने के साथ-साथ इसकी पौध खेत में प्रत्यारोपित कर दी जाती है। इसके अलावा दूसरी फसल के लिए नवंबर-दिसंबर में की जाती है और फसल मार्च में ली जाती है। खरीफ फसल की रोपाई जून महीने में करें।

एक एकड़ के लिए 300 ग्राम बीज की जरूरत होती है। एक एकड़ में 60000 पौधे और हर जगह दो पौधे के हिसाब से होनी चाहिए। 60x  60 सेंटीमीटर का अंतर रखें, नर्सरी में बीज की मात्रा अनुमोदित रखें। अगर बीज दर ज्यादा हो तो अंकुरण देर से होता है। पौधे का विकास कम होता है और पोधसडन ज्यादा। बुवाई से पहले क्यारियों में हल्की सिंचाई दे। फिर खुदाई कर अनुमोदित मात्रा में खाद डालें। पौधे को लाल कीड़े, दीमक, केंचुए कृमिva रसचूसक किट से बचाने हेतु खाद के साथ 300 ग्राम कार्बोफ्यूरान डालकर जमीन में मिला दे।

Read Also:- जिप्सम का उपयोग- खेती में अधिक पैदावार के लिए

सिंचाई:-

पहली सिंचाई पौध प्रतिरोपण के तुरंत बाद की जाती है। बाद में गर्म मौसम में हर 5- 7 दिन तथा सर्दी में 10-12 दिनों के अंतर में फसल को सींचा जाता है।

निराई-गुड़ाई:-

पौधों की वृद्धि की आरंभिक अवस्था में खरपतवारों पर नियंत्रण पाने के लिए दो-तीन बार निराई करना आवश्यक होता है। पौध रोपण के दो या 3 सप्ताह बाद मिट्टी चढ़ाई जा सकती है।

अन्य देखभाल:-

अगर जिंक लोह या बोरॉन की कमी दिखे तो निवारण हेतु 40 ग्राम फेरस सल्फेट, 20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम बोरिक एसिड 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

सूक्ष्म तत्व का घोल बनाने का तरीका:-

10 लीटर पानी में 250 ग्राम चुना रात में भिगोकर रख दें। दूसरे दिन इस गोल में से 1 लीटर चूने का पानी तैयार करें। फिर 1 लीटर पानी में 40 ग्राम फेरस सल्फेट, 20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम बोरिक एसिड को मिक्स कर छान लें। इसमें 1 लीटर चूने का पानी 8 लीटर सादा पानी में मिलाकर 10 लीटर का गोल बनाएं। सुबह जल्दी या शाम को 7 दिन के अंतर पर दो बार छिड़के।

रोपाई का आदर्श समय 15 अगस्त से 15 सितंबर के बीच का है। हल्की बारिश गिरते समय रोपाई करने से वह अच्छी तरह से लग जाते हैं। अच्छे विकास हेतु बुवाई के 5से 6 हफ्ते बाद 15-20 सेमी के स्वस्थ पौधे 60 * 60 सेमी के अंतर पर रोपाई करें। एक जगह पर 5 सेमी के अंतर पर 2 पौधे लगाए। पौधे की पर्याप्त संख्या हेतु रोपाई के 10-15 दिन बाद खाली स्थान में नए पौधे लगाए। शुरुआत में विकास धीरे होने के कारण यह क्रिया दो- तीन बार कर सकते हैं।

Read Also:- अरण्डी की उन्नत खेती कैसे करें?

मिर्च की उपज:-

सिंचित क्षेत्र में हरी मिर्च की औसत पैदावार लगभग 85-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और सूखे फल की उपज 16-20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर प्राप्त हो जाती है।

प्रस्तुति:-

मुकेश कुमार जाट, (एस. आ.र एफ. राजस्थान कृषि अनुसंधान दुर्गापुरा, जयपुर)

डॉ. बालाजी विक्रम, अध्यापन सहायक, उद्यान विभाग एवं

ज्योति राय (परास्तनातक छात्रा, उद्यान विभाग, शियाट्स इलाहाबाद)

About the author

Bheru Lal Gaderi

Leave a Reply

%d bloggers like this: